कोरबा। देश की एकता के शिल्पकार सरदार वल्लभभाई पटेल की पुण्यतिथि पर इस बार एक अलग ही तस्वीर सामने आई। दर्री स्थित सरदार पटेल नगर में स्थापित उनकी मूर्ति पर न तो कांग्रेस और न ही भाजपा के नेता माल्यार्पण करने पहुंचे। यह पहला मौका माना जा रहा है जब दोनों प्रमुख दलों की ओर से कोई औपचारिक कार्यक्रम या सक्रियता नजर नहीं आई।
अकेली, उपेक्षित और राजनीतिक भीड़ से कोसों दूर। कांग्रेस हो या भाजपा, दोनों के लिए यह दिन शायद “नॉन-वोटिंग डे” साबित हुआ। न माला, न भाषण, न श्रद्धा… सिर्फ हवा थी, धूल थी और प्रश्नों के अंबार थे।
हर साल बड़े आयोजन, भाषण और श्रद्धांजलि कार्यक्रमों के बीच याद किए जाने वाले सरदार पटेल की पुण्यतिथि इस बार पूरी तरह फीकी रही। न तो किसी दल की ओर से कार्यक्रम हुआ और न ही नेताओं के बयान सामने आए। प्रतिमा स्थल पर पसरा सन्नाटा अपने आप में बयान था कि श्रद्धांजलि अब भावना नहीं, आयोजन बन चुकी है।
मौके पर मौजूद जनमानस में नाराजगी साफ दिखी। लोगों ने कहा कि सरदार पटेल अब नेताओं के लिए प्रेरणा नहीं, इवेंट मैनेजमेंट आइटम बन चुके हैं। कभी उनकी एकता की बातें होती हैं, तो कभी उनके नाम पर राजनीतिक ठेकेदारी। नेता सरदार पटेल को केवल अपने राजनीतिक फायदे के लिए याद करते हैं। आम दिनों में उनके आदर्शों और योगदान को भुला दिया जाता है।
इस मुद्दे को लेकर राजनीतिक हलकों में भी चर्चा शुरू हो गई है। राजनीतिक दलों की चुप्पी ने यह प्रश्न खड़ा कर दिया है कि क्या महापुरुषों का सम्मान भी अब लाभ-हानि के गणित पर टिका है.? इससे नेताओं की कथनी और करनी पर प्रश्नों की झड़ी लगाती उंगलियां उठ रही हैं।



