Hasdeo Bango Dam : मत्स्य नीति 2022 की ठेका व्यवस्था के विरोध में विस्थापित आदिवासी-मछुआरों की रैली…! कलेक्टर-एसपी को सौंपा ज्ञापन

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Hasdeo Bango Dam

कोरबा, 09 फरवरी। Hasdeo Bango Dam : छत्तीसगढ़ मत्स्य नीति 2022 के तहत मिनीमाता हसदेव (बांगो) जलाशय में लागू ठेका व्यवस्था के विरोध में आज बांगो बांध से विस्थापित आदिवासी समुदायों और हसदेव जलाशय क्षेत्र की 22 पंजीकृत मछुआरा सहकारी समितियों ने संयुक्त रूप से जोरदार प्रदर्शन किया। विस्थापित आदिवासी (हसदेव जलाशय) मछुआरा संघर्ष समिति के नेतृत्व में तानसेन चौक से कलेक्टर कार्यालय, कोरबा तक शांतिपूर्ण रैली निकाली गई। रैली के बाद प्रतिनिधिमंडल ने कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक को ज्ञापन सौंपा।

रैली में बड़ी संख्या में बांगो बांध से प्रभावित आदिवासी मछुआरा महिला और पुरुष शामिल हुए। छत्तीसगढ़ किसान सभा ने भी आंदोलन का समर्थन करते हुए बांगो डेम से प्रभावित विस्थापितों को मत्स्य पालन और मछली पकड़ने का अधिकार देने की मांग की।

मछुआरा संघर्ष समिति के संयोजक फिरतू बिझवार और कृष्णा कुमार ने बताया कि ठेका प्रणाली के कारण विस्थापित आदिवासी और पारंपरिक मछुआरा समुदायों का शोषण हो रहा है। जिन समुदायों की जमीन, जंगल और गांव बांगो बांध के निर्माण से डूब गए, आज उन्हीं लोगों को अपने ही जलाशय में ठेकेदारों के अधीन काम करने के लिए मजबूर किया जा रहा है।

समिति के संयोजक सरबोध, दीपक मंझवार, धनसाय और रविन्द्र सिदार ने कहा कि मिनीमाता हसदेव जलाशय का जल क्षेत्र वर्ष 2005 से पहले की पारंपरिक ग्राम सीमाओं के अंतर्गत आता है और इस पर वन अधिकार अधिनियम 2006 के तहत सामुदायिक वन संसाधन अधिकार (CFR) का वैध दावा बनता है। इसके बावजूद ग्राम सभाओं द्वारा पारित प्रस्तावों की अनदेखी कर ठेका दिया गया है।

ज्ञापन में मछुआरा समुदाय के साथ हाल के दिनों में हुई धमकी, अवैध वसूली और मछली जाल की जब्ती जैसी घटनाओं का उल्लेख करते हुए जान–माल की सुरक्षा की मांग की गई। संगठनों ने साफ किया कि वे ठेका व्यवस्था को स्वीकार नहीं करते और किसी भी परिस्थिति में ठेकेदारों के लिए काम नहीं करेंगे।

छत्तीसगढ़ अनुसूचित जनजाति आयोग के पूर्व अध्यक्ष और सूरजपुर के पूर्व विधायक भानु प्रताप सिंह ने रैली में शामिल होकर आंदोलन का समर्थन किया। उन्होंने प्रशासन से ठेका व्यवस्था पर तत्काल रोक लगाने, ग्राम सभाओं के अधिकारों को मान्यता देने, रॉयल्टी आधारित सामुदायिक मत्स्य व्यवस्था लागू करने और मछुआरा समुदाय की सुरक्षा सुनिश्चित करने की मांग की।

छत्तीसगढ़ किसान सभा के प्रदेश संयुक्त सचिव प्रशांत झा ने कहा कि 1980 के दशक में हसदेव नदी पर बांगो बांध के निर्माण से 58 आदिवासी बहुल गांव पूरी तरह डूब गए थे। विस्थापितों को मुआवजा और पुनर्वास देने में गंभीर विसंगतियां रही हैं। प्रारंभ में विस्थापित परिवारों को रॉयल्टी के आधार पर मत्स्य पालन का अधिकार मिला था, लेकिन बाद में ठेका व्यवस्था लागू कर दी गई, जिससे जलाशय पर निजी ठेकेदारों का नियंत्रण हो गया और स्थानीय आदिवासी अपने ही जल-जंगल-जमीन पर मजदूर बनकर रह गए।

उन्होंने चेतावनी दी कि यदि सरकार ने विस्थापित आदिवासी मछुआरों की मांगें नहीं मानीं, तो किसान सभा सड़कों पर उतरकर आंदोलन को और तेज करेगी। इस आंदोलन को सीटू के प्रदेश महासचिव एस.एन. बैनर्जी, किसान सभा के दीपक साहू और दामोदर श्याम ने भी समर्थन दिया और आगे सहयोग का भरोसा जताया।

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