
कोरबा । नगर निगम का ये “एक टिकट में दो पिक्चर” अब साधारण शो नहीं रहा, ये तो पूरी तरह पॉलिटिकल थ्रिलर बन चुका है, जिसमें स्क्रिप्ट भी अंदर की, डायरेक्शन भी अंदर का… और क्लाइमैक्स?
municipal double role controversy हालत ये है कि इंटरवल का इंतजार किए बिना ही कहीं तालियां बज रही हैं तो कहीं कुर्सियां खिसकने की आवाज आ रही है। निगम के कामकाज की समीक्षा करते हुए जनमानस भी कहने लगे है, ये तो सच में “एक टिकट में दो पिक्चर” वाली सरकार है।
असल में मेयर मैडम के निज सचिव की एंट्री अभिनेता गोविंदा के डबल रोल जैसे हुई है… पहले रोल में मेयर के साथ कदम से कदम, और अगले ही फ्रेम में निगम की संपत्ति के इर्द-गिर्द की भूमिका का निर्वहन कर रहे है। यानी एक ही टिकट में “सत्ता” और “संपत्ति” का डबल रोल। अब दर्शक कन्फ्यूज हैं कि सीटी किस सीन पर बजाएं और पॉपकॉर्न किस मोड़ पर खत्म करें।निगम के गलियारों में इस “मल्टीप्लेक्स मॉडल” की खूब चर्चा है। एक कलाकार, दो किरदार… और दोनों में दबदबा बरकरार..!
दीवारों पर “जीरो टॉलरेंस” के पोस्टर ऐसे चमक रहे हैं जैसे किसी फ्लॉप फिल्म के बड़े-बड़े कटआउट दूर से दमदार, पास जाओ तो कहानी गायब। नियम-कायदे अब सिर्फ बैकग्राउंड स्कोर हैं..चलते रहते हैं, सुनाई देते हैं, पर कहानी में कोई बदलाव नहीं आता। असली सस्पेंस यही है कि ये फिल्म आखिर कितने दिन चलेगी। क्योंकि दर्शक अब सिर्फ तमाशा नहीं देख रहे… कहानी समझने लगे हैं। और जब दर्शक समझदार हो जाएं, तो क्लाइमैक्स खुद ही रास्ता बना लेता है।



