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Korba: नगर निगम या “रियल एस्टेट डेवलपर लिमिटेड”.. भजन नहीं महाभोज का निगमिय आमंत्रण..!!

कोरबा। सभी उंगलियां बराबर नहीं होती लेकिन राजनीतिक कहावत है कि खाते समय सभी उंगलियां एक हो जाती है। यही स्थिति इन दिनों शहर के पक्ष विपक्ष के नेताओं और निगम अफसरों की काली करतूत पर यह कहावत आजकल शहर में उतनी ही फिट बैठ रही है, जितनी किसी नेता के आश्वासनों पर जनता की आस।

कहावत है “निकले थे हरि भजन को, ओटन लगे कपास।” ये कहावत इन दिनों शहर व नगर निगम के नेता और अफसरों पर सटीक बैठ रही है। निगम के सत्ता पक्ष और के नेताओं ने मिलकर सरकार से पार्किंग का पैसा मांगा और बिल्डिंग कंप्लीट हुआ तो उसे निजी हाथों को बेच दिया। निगम की नीति को देखकर जनमानस में चर्चा आम है – “अफसर निकले तो थे हरि भजन को और लोटन लगे कपास..!”

 

दरअसल शहर की ट्रैफिक समस्या दूर करने के पवित्र संकल्प के साथ जो मल्टी लेवल पार्किंग बनाई गई थी, वह अब दिनों सवालों के घेरे में है। जिसे शहर की बिगड़ती, लचर होती अव्यवस्थित यताय पर लगाम कसने के लिए तैयार किया गया था, वह धीरे-धीरे बातचीत और ऊपर तक की मंजूरी से व्यावसायिक कॉम्प्लेक्स में बदलती दिख रही है।

 

टेंडर की गति हो या शर्तों का बदलाव, सब कुछ इतनी तेज़ी से हुआ कि शहरभर में चर्चाएं तेज हैं। लोगों का मानना है कि ट्रैफिक सुधार से ज्यादा यह पूरी व्यवस्था कुछ चुनिंदा लोगों की कमाई का आसान साधन बन गई है। अब दुकानों को नोटिस, गार्डन की योजना और कारोबारियों की बेदखली सबकुछ इतनी सफाई से हो रहा है कि मामला विकास से ज्यादा व्यापार का लगता है।

अब कहानी का असली मोड़ यहीं से शुरू होता है। टेंडर की गति ऐसी हुई कि चीता भी शरमा जाए, शर्तों का बदलाव ऐसा जैसे हॉस्टल के मेस में मेन्यू जब जिसका मन आए बदल दो। शहर में चर्चा गर्म है कि ट्रैफिक सुधार तो बहाना था, असली खेल तो शहर के कुछ रसूखदार लोगों को कॉम्प्लेक्स का पूरा फ्लोर देने तीर निशाने पर लगाना था।

स्क्रिप्ट राइटरों के निर्देश पर पार्किंग के आसपास पत्थर और ग्रेनाइट की दुकानों को नोटिस देकर जगह खाली करने का निर्देश दिया गया है। मतलब यह कि बाहर जाओ, जगह खाली करो.. बाकी कहानी हम लिखेंगे।

सूत्र बताते हैं कि सड़क किनारे गार्डन बनाने की योजना आगे बढ़ाई जा रही है। ऐसा होने पर ग्रेनाइट कारोबारियों को दुकानें छोड़कर दूसरी जगह जाना पड़ेगा। वैसे लोगों को समझ आ रहा है कि यह गार्डन किसी ‘सुंदर शहर’ की योजना नहीं बल्कि ‘’खाली कराओ अभियान’’ का “हरा-भरा संस्करण” है।

इसके बाद जमीन मालिक अपनी निजी जमीन को पीछे की कॉलोनी वालों को कम कीमत में बेचकर बुझे मन से सरकार को कोसते रहेंगे।

कुल जमा यह है कि सारी तैयारी ऐसे हुई है जैसे नगर निगम नहीं, कोई प्राइवेट डेवलपर ‘लॉन्च ऑफर’ निकाल रहा हो।

इस फिल्मी कहानी का “प्लाट” ऐसा है कि देखकर बॉलीवुड के बड़े-बड़े डायरेक्टर भी कहें “वाह! ऐसी प्लॉटिंग तो हमने भी कभी नहीं सोची!”

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