
कोरबा।Korba Power Plant Security जांजगीर-चांपा जिले के अकलतरा स्थित पावर प्लांट में ठेका श्रमिक के रूप में काम कर रहे पाकिस्तान से जुड़े कथित स्लीपर सेल सदस्य की गिरफ्तारी ने सुरक्षा एजेंसियों के साथ-साथ ऊर्जा राजधानी कोरबा की औद्योगिक सुरक्षा व्यवस्था को भी कटघरे में खड़ा कर दिया है। जांच में सामने आया है कि आरोपी लंबे समय से पहचान छिपाकर रह रहा था और स्थानीय लोगों से बेहद सीमित संपर्क रखता था।
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि एक संवेदनशील औद्योगिक क्षेत्र में कोई व्यक्ति महीनों तक अपनी वास्तविक पहचान छिपाकर रह सकता है, तो कोरबा जैसे देश के सबसे बड़े ऊर्जा केंद्र में सुरक्षा और सत्यापन की व्यवस्था कितनी मजबूत है?
कोरबा में हजारों बाहरी श्रमिक, लेकिन निगरानी किसकी जिम्मेदारी?
कोरबा जिले में एनटीपीसी, सीएसपीजीसीएल, बालको, निजी ताप विद्युत संयंत्रों, कोयला खदानों और विभिन्न औद्योगिक इकाइयों में हजारों ठेका श्रमिक कार्यरत हैं। इनमें बड़ी संख्या उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल, ओडिशा और अन्य राज्यों से आने वाले श्रमिकों की है। सूत्रों के अनुसार केवल दर्री कॉलोनी और आसपास के औद्योगिक क्षेत्रों में ही एक हजार से अधिक बाहरी श्रमिक निवास कर रहे हैं। इनमें से कितनों का पुलिस सत्यापन हुआ है, कितनों की जानकारी स्थानीय थानों में दर्ज है और कितनों का रिकॉर्ड अद्यतन है, यह बड़ा सवाल बनकर उभर रहा है।
कागजों में सत्यापन, जमीन पर हकीकत क्या?
नियमों के अनुसार किरायेदारों और बाहरी श्रमिकों की जानकारी स्थानीय पुलिस को देना आवश्यक है। ठेका कंपनियों को भी कर्मचारियों का दस्तावेजी सत्यापन सुनिश्चित करना होता है। लेकिन पड़ताल में सामने आ रहा है कि कई मामलों में श्रमिकों का रिकॉर्ड केवल फाइलों तक सीमित रहता है। ठेका बदलते ही श्रमिक बदल जाते हैं और उनकी वास्तविक जानकारी अपडेट नहीं हो पाती। कई श्रमिक ऐसे भी हैं जो अस्थायी कमरों, झुग्गियों और निजी मकानों में रहते हैं, जहां नियमित सत्यापन की व्यवस्था कमजोर दिखाई देती है।
देश की ऊर्जा राजधानी, लेकिन सुरक्षा व्यवस्था कितनी अभेद्य?
कोरबा सिर्फ एक जिला नहीं, बल्कि देश के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा उत्पादन केंद्रों में से एक है। यहां के ताप विद्युत संयंत्र राष्ट्रीय ग्रिड को बिजली उपलब्ध कराते हैं। कोयला खदानों, रेलवे नेटवर्क और औद्योगिक प्रतिष्ठानों का विशाल तंत्र यहां संचालित होता है।
सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे प्रतिष्ठान किसी भी देश के लिए रणनीतिक महत्व रखते हैं। इसलिए यहां काम करने वाले प्रत्येक व्यक्ति की पहचान, पृष्ठभूमि और गतिविधियों का रिकॉर्ड अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।
ठेका कंपनियों पर भी उठ रहे सवाल
अकलतरा की घटना के बाद अब निगाहें उन ठेका कंपनियों पर भी टिक गई हैं जो बड़ी संख्या में श्रमिकों की भर्ती करती हैं। सवाल यह है कि नियुक्ति के समय दस्तावेजों की जांच कितनी गहराई से की जाती है? क्या आधार, निवास, पुलिस सत्यापन और पूर्व रिकॉर्ड की वास्तविक जांच होती है या केवल औपचारिकता पूरी की जाती है?
यदि एक संदिग्ध व्यक्ति औद्योगिक क्षेत्र में श्रमिक बनकर लंबे समय तक सक्रिय रह सकता है, तो यह व्यवस्था में मौजूद खामियों की ओर संकेत करता है।
दर्री कॉलोनी क्यों बनी चर्चा का केंद्र?
दर्री क्षेत्र लंबे समय से औद्योगिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र रहा है। यहां विभिन्न परियोजनाओं में काम करने वाले बाहरी श्रमिक बड़ी संख्या में निवास करते हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि कई बार नए लोगों के आने-जाने की जानकारी आसपास के निवासियों तक भी नहीं पहुंचती।
ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या यहां रहने वाले सभी बाहरी व्यक्तियों का पुलिस रिकॉर्ड उपलब्ध है? क्या समय-समय पर सत्यापन अभियान चलाए जाते हैं? और यदि चलाए जाते हैं तो उनके परिणाम क्या हैं?
सबसे बड़ा सवाल
अकलतरा में कथित स्लीपर सेल की गिरफ्तारी ने एक बार फिर यह चेतावनी दी है कि संवेदनशील औद्योगिक क्षेत्रों में सुरक्षा केवल गेट पास और आईडी कार्ड तक सीमित नहीं रह सकती।क्या कोरबा के पावर प्लांटों, कोयला खदानों और औद्योगिक कॉलोनियों में कार्यरत हजारों बाहरी श्रमिकों का सत्यापन पूरी तरह अपडेट है?क्या ठेका कंपनियां अपनी जिम्मेदारी पूरी कर रही हैं?और क्या सुरक्षा एजेंसियों के पास हर बाहरी व्यक्ति का अद्यतन रिकॉर्ड मौजूद है?इन सवालों के जवाब केवल प्रशासन ही नहीं, बल्कि पूरे औद्योगिक तंत्र को देने होंगे। क्योंकि ऊर्जा राजधानी की सुरक्षा में एक छोटी सी चूक भी बड़े खतरे का कारण बन सकती है।
( अनिल द्विवेदी की विशेष रिपोर्ट)






