कोरबा NPZ 11 फरवरी ।गरीब हटे तो जनहित,गरीब उजड़े तो व्यवस्था,और उसी जगह किसी खास को सीधा लाभ मिले तो उसे प्लानिंग कहा जाता है। एक गार्डन जो बना है सिस्टम की प्राथमिकताओं का स्मारक..जाने क्या है बात..!

1991 की फिल्म भाभी का वह मशहूर गीत आज भी कानों में बजता है “चांदी की साइकिल और सोने का सीट…”अपने दौर में सुपरहिट रहा यह गीत अब कोरबा में नए बोलों के साथ रीमेक बन चुका है“सोने की दुकान और चांदी का गार्डन।”और इस नए संस्करण के नायक कोई फिल्मी हीरो नहीं, बल्कि नगर निगम के अफसर हैं।
कहानी शुरू होती है पुराने कोरबा से, जहां सड़क किनारे बरसों से बैठे फुटकर व्यापारी रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करते रहे। अचानक एक सुबह खबर आई ठेले हटेंगे, अतिक्रमण साफ होगा, शहर सुंदर बनेगा। लोगों को लगा कि शायद इंदौर मॉडल उतर रहा है। सोचा गया कि सड़कें खुलेंगी, व्यवस्था सुधरेगी और शहर सांस ले पाएगा।मगर यह सपना ज्यादा देर टिक नहीं पाया।हटा दिए गए ठेले, छिन गई रोजी-रोटी और उसी खाली जगह पर उग आया एक गार्डन। नाम तो गार्डन है, पर हरियाली से ज्यादा वहां हितों की चमक दिखाई देती है। पास की सोने की दुकान की शोभा इस “चांदी के गार्डन” से ऐसी बढ़ी, मानो विकास ने सीधे ज्वेलरी काउंटर तक एंट्री ले ली हो।
शहर में अब लोग मुस्कराकर कहते हैं यह गार्डन चांदी का है, क्योंकि यहां पेड़ों से ज्यादा फायदे चमकते हैं। तर्क दिया जाता है कि शहर सुंदर बनाने के लिए यह सब जरूरी था। सवाल बस इतना है कि सुंदरता की कीमत हर बार गरीब ही क्यों चुकाए? और विकास का फायदा हमेशा गिने-चुने लोगों की दुकान तक ही क्यों सिमट जाए?आज कोरबा में विकास की नई परिभाषा लिखी जा रही है।ठेला हटे तो जनहित में,गार्डन बने तो खास हित में।और बाकी जनता?वह पुराने गानों के नए बोल गुनगुनाकर बस इतना कह देती है“चांदी की साइकिल तो गई, अब सोने की दुकान का गार्डन देख लो।”



