रायपुर/कोरबा, 27 अगस्त।Electricity Privatization : छत्तीसगढ़ में विद्युत वितरण व्यवस्था के निजीकरण को लेकर सियासी और कर्मचारी संगठनों के बीच बहस तेज होती दिख रही है। रायपुर, धरसींवा, मंदिर हसौद और अभनपुर तहसीलों में बिजली वितरण का जिम्मा निजी कंपनी को सौंपने के प्रस्ताव का छत्तीसगढ़ राज्य विद्युत कर्मचारी जनता यूनियन ने विरोध किया है। यूनियन ने छत्तीसगढ़ राज्य विद्युत नियामक आयोग के अध्यक्ष को आपत्ति पत्र सौंपते हुए प्रस्तावित विद्युत वितरण लाइसेंस की प्रक्रिया निरस्त करने की मांग की है।
यूनियन के प्रांतीय अध्यक्ष अनिल द्विवेदी ने सवाल उठाया कि बिजली जैसी आवश्यक सार्वजनिक सेवा को निजी हाथों में सौंपने से आम उपभोक्ताओं, किसानों, मजदूरों और छोटे कारोबारियों पर इसका क्या असर पड़ेगा। संगठन ने निजीकरण के बजाय मौजूदा सार्वजनिक विद्युत व्यवस्था को मजबूत करने की मांग की है।
टाटा पावर को बिजली वितरण देने की तैयारी? यूनियन ने उठाए सवाल
जनता यूनियन का दावा है कि समाचार पत्रों और सार्वजनिक माध्यमों से उसे जानकारी मिली है कि टाटा पावर ने संबंधित क्षेत्रों में विद्युत वितरण का कार्य करने के लिए लाइसेंस हासिल करने हेतु आयोग के समक्ष आवेदन किया है।
यूनियन के मुताबिक इस मामले में 1 अक्टूबर को जनसुनवाई प्रस्तावित है। संगठन ने मांग की है कि उसे जनसुनवाई में अपना पक्ष रखने के लिए पर्याप्त और प्रभावी अवसर दिया जाए।
हालांकि, टाटा पावर को वितरण का जिम्मा दिए जाने को लेकर अंतिम निर्णय या प्रक्रिया की आधिकारिक स्थिति संबंधित नियामक प्राधिकरण से स्पष्ट होना बाकी है।
निजीकरण हुआ तो बढ़ेगा बिजली बिल? यूनियन की आशंका
अनिल द्विवेदी ने आशंका जताई कि निजी कंपनी के आने के बाद भविष्य में उपभोक्ताओं पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ सकता है। यूनियन ने कर्मचारियों और अधिकारियों की नौकरी, सेवा शर्तों, पदोन्नति, स्थानांतरण और सामाजिक सुरक्षा को लेकर भी सवाल उठाए हैं।
संगठन का तर्क है कि निजी कंपनियां आम तौर पर आर्थिक रूप से अधिक लाभकारी क्षेत्रों को प्राथमिकता देती हैं। ऐसे में ग्रामीण, गरीब और कम राजस्व वाले क्षेत्रों में बिजली आपूर्ति तथा उपभोक्ता सेवाओं पर संभावित असर को लेकर सरकार को पहले से स्पष्ट नीति बनानी चाहिए।
‘व्यवस्था में खामी है तो सुधारिए, निजीकरण क्यों?’
जनता यूनियन ने कहा कि यदि मौजूदा बिजली वितरण व्यवस्था में खामियां हैं तो उसका समाधान निजीकरण नहीं, बल्कि सार्वजनिक व्यवस्था को मजबूत करके किया जाना चाहिए।
यूनियन ने बिजली वितरण व्यवस्था में सुधार के लिए कई सुझाव दिए हैं। इनमें लाइन लॉस कम करना, आधुनिक तकनीक अपनाना, पुराने विद्युत ढांचे का उन्नयन, पर्याप्त कर्मचारियों की भर्ती, वित्तीय संसाधन बढ़ाना और अधिकारियों की जवाबदेही तय करना शामिल है।
कर्मचारियों के हितों को लेकर भी चिंता
संगठन ने कहा कि वितरण व्यवस्था के निजीकरण का असर केवल उपभोक्ताओं तक सीमित नहीं रहेगा। बिजली विभाग में कार्यरत कर्मचारियों और अधिकारियों के रोजगार तथा सेवा शर्तों पर भी इसका प्रभाव पड़ सकता है। यूनियन ने मांग की है कि किसी भी फैसले से पहले कर्मचारियों और अधिकारियों पर पड़ने वाले संभावित प्रभाव का विस्तृत अध्ययन कराया जाए।
सरकार के फैसले के खिलाफ आंदोलन की चेतावनी
अनिल द्विवेदी ने कहा कि संगठन का विरोध किसी व्यक्ति या निजी कंपनी विशेष के खिलाफ नहीं है, बल्कि विद्युत वितरण के निजीकरण की नीति के खिलाफ है। उन्होंने कहा कि जनता यूनियन उपभोक्ताओं और बिजली कर्मचारियों के हितों की रक्षा के लिए लोकतांत्रिक और संवैधानिक तरीके से अपना विरोध जारी रखेगी।












