CSEB 840 MW Power Plant Coal Crisis : CSEB के दर्री 840 MW पावर प्लांट में सिर्फ 10 दिन का कोयला स्टॉक बचा है। 18 हजार टन दैनिक खपत के मुकाबले 12 हजार टन सप्लाई से बिजली संकट की आशंका बढ़ी।
कोरबा।CSEB 840 MW Power Plant Coal Crisis : छत्तीसगढ़ की बिजली व्यवस्था को लेकर एक बार फिर चिंता बढ़ाने वाली खबर सामने आई है। दर्री के 840 मेगावाट क्षमता वाले पावर प्लांट में महज 10 दिन का कोयला स्टॉक बचा होने की बात सामने आई है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब प्लांट की रोजाना खपत करीब 18 हजार टन है, तब इसके मुकाबले लगभग 12 हजार टन ही कोयले की आपूर्ति क्यों हो रही है?
यानी रोजाना करीब 6 हजार टन का अंतर। अगर यही स्थिति कुछ और दिन बनी रही तो प्लांट के कोयला स्टॉक पर सीधा असर पड़ना तय माना जा रहा है। ऐसे में प्रदेश की बिजली जरूरतों को पूरा करने के लिए उत्पादन प्रभावित होने और बाहर से महंगी बिजली खरीदने की नौबत आने की आशंका जताई जा रही है।
18 हजार टन खपत, 12 हजार टन सप्लाई… आखिर गैप क्यों?
सूत्रों के मुताबिक दर्री स्थित 840 मेगावाट पावर प्लांट में रोजाना लगभग 18 हजार टन कोयले की जरूरत होती है, लेकिन फिलहाल एसईसीएल से करीब 12 हजार टन प्रतिदिन ही आपूर्ति हो पा रही है। बारिश के कारण खदानों से कोयला परिवहन और सप्लाई चेन प्रभावित होने की बात कही जा रही है।
लेकिन सवाल सिर्फ बारिश का नहीं है। यदि पहले से बारिश के मौसम की जानकारी थी तो पर्याप्त कोयला स्टॉक बनाए रखने की तैयारी क्यों नहीं की गई? क्या प्रदेश की बिजली व्यवस्था को महज मौसम के भरोसे छोड़ दिया गया है?
10 दिन का स्टॉक… फिर क्या होगा?
प्लांट में करीब 10 दिन का कोयला स्टॉक बचा होना बिजली व्यवस्था के लिए गंभीर संकेत माना जा रहा है। यदि आने वाले दिनों में कोयले की आवक नहीं बढ़ी तो उत्पादन पर दबाव बन सकता है।
ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या प्रदेश को बिजली संकट की ओर धकेला जा रहा है?
अगर उत्पादन घटा तो बिजली की मांग पूरी करने के लिए बाहर से बिजली खरीदने की जरूरत पड़ सकती है। बाहर से बिजली खरीदने का मतलब कंपनी पर अतिरिक्त वित्तीय बोझ और अंततः उसका असर प्रदेश के खजाने पर पड़ना है।
कमीशन का खेल या सप्लाई चेन की नाकामी?
इधर, अंदरखाने की चर्चाओं ने मामले को और गंभीर बना दिया है। सूत्रों का दावा है कि कोयला सप्लाई की व्यवस्था और कथित कमीशन के फेर में कंपनी की उत्पादन क्षमता प्रभावित हो रही है। हालांकि इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।
सवाल यह भी उठ रहा है कि यदि पर्याप्त कोयला उपलब्ध नहीं कराया गया और उत्पादन प्रभावित हुआ, तो बाद में बाहर से बिजली खरीदने की स्थिति किसके हित में होगी?
कंपनी को घाटे में दिखाकर निजीकरण की तैयारी तो नहीं?
बिजली कंपनी की मौजूदा परिस्थितियों को लेकर एक और बड़ा सवाल उठ रहा है। क्या सरकारी बिजली कंपनी को पहले घाटे और अव्यवस्था में धकेलने, फिर निजीकरण की जमीन तैयार करने की कोई रणनीति तो नहीं चल रही?
यह सवाल इसलिए भी अहम है क्योंकि बिजली उत्पादन, कोयला आपूर्ति और बाहर से बिजली खरीद, तीनों का सीधा संबंध कंपनी की वित्तीय स्थिति से है। हालांकि निजीकरण की किसी तैयारी की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।
अधिकारी बोले, बारिश से प्रभावित हुई सप्लाई
इस पूरे मामले में छत्तीसगढ़ राज्य विद्युत कंपनी के अतिरिक्त मुख्य अभियंता एवं ईंधन प्रभारी एन. भुनेश्वर राव ने कहा कि दर्री के 840 मेगावाट पावर प्लांट में करीब 10 दिन का कोयला स्टॉक बचा है। बारिश के कारण खपत के अनुपात में एसईसीएल से कम कोयला आपूर्ति हो रही है। मौसम साफ होने के बाद सप्लाई चेन में सुधार की उम्मीद है।
अब देखना होगा कि मौसम साफ होने का इंतजार कर रही बिजली कंपनी कोयले का स्टॉक खत्म होने से पहले सप्लाई चेन सुधार पाती है या फिर प्रदेश को बिजली संकट और महंगी बिजली खरीद की नई चुनौती का सामना करना पड़ता है।












