
कोरबा।Korba Politics पॉवर हब कहे जाने वाले कोरबा में इन दिनों राख सिर्फ चिमनियों से नहीं उड़ रही, बल्कि सिफारिशों और दबाव की हवा में भी तैर रही है। शहर में चर्चा तेज है कि फ्लाई एश के आवंटन को लेकर पर्दे के पीछे बड़ा खेल चल रहा है। ट्रांसपोर्टर और स्थानीय ठेकेदार खुले तौर पर कहने लगे हैं कि राख के कारोबार में अब नियम से ज्यादा “पहचान” काम कर रही है।

सलिहाभांठा खदान और 10 लाख घन मीटर की कहानी
मामला दिलीप बिल्डकॉन की सलिहाभांठा गिट्टी खदान में फ्लाई एश भराई से जुड़ा बताया जा रहा है। करीब 10 लाख घन मीटर कंजम्पशन वाली इस खदान को भरने के लिए बालको की फ्लाई एश पर नजरें टिकी हुई हैं। पर्यावरणीय नियमों और अनुमति प्रक्रियाओं के कारण रास्ता सीधा नहीं है, इसलिए कथित तौर पर दबाव और हाई लेवल संपर्कों का सहारा लिया जा रहा है।
स्थानीय सूत्रों का दावा है कि कई बड़े कारोबारी इस फ्लाई एश को हासिल करने के लिए सक्रिय हैं। इसे “सफेद सोना” कहा जा रहा है, क्योंकि निर्माण और भराई कार्यों में इसकी भारी मांग है। “ऊपर से बात हो चुकी है” एक लाइन में पूरा सिस्टम जब भी नियमों या प्रक्रिया की बात उठती है, जवाब एक ही मिलता है “ऊपर से बात हो चुकी है।”यही वाक्य इस पूरे मामले का केंद्र बन गया है। आरोप हैं कि फाइलों की गति नियमों से नहीं, बल्कि फोन कॉल से तय हो रही है।
कोरबा में यह चर्चा नई नहीं है कि फ्लाई एश के आवंटन में सिफारिश चलती है। लेकिन इस बार कहा जा रहा है कि मामला सामान्य दबाव से आगे बढ़ चुका है। सिस्टम के भीतर सब कुछ “संकेत” का इंतजार करता दिख रहा है।
नियम बनाम पहुंच
पर्यावरणीय मानकों के तहत फ्लाई एश के उपयोग और परिवहन को लेकर स्पष्ट दिशानिर्देश हैं। पर सवाल उठ रहा है कि क्या इन नियमों का पालन समान रूप से हो रहा है, या फिर कुछ लोगों के लिए रास्ते अलग बनाए जा रहे हैं। स्थानीय जानकारों का कहना है कि लोकतंत्र में सरकारें बदलती हैं, लेकिन कोरबा में राख का खेल शायद ही बदलता है। सत्ता किसी की भी हो, प्राथमिकता उसी को मिलती है जिसके पास “हाई लेवल सिफारिश” हो।
असली सवाल
कोरबा में अब चर्चा यह नहीं कि फ्लाई एश कहां जाएगी।चर्चा यह है कि किसके इशारे पर जाएगी।
जब तक प्रक्रिया पारदर्शी नहीं होगी और आवंटन सार्वजनिक मानकों पर आधारित नहीं होगा, तब तक “ऊपर से बात हो चुकी है” जैसे वाक्य ही यहां की अनौपचारिक नीति बने रहेंगे।



