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Sharad Purnima Kheer: ये कैसी थानेदारी, आरोपी फरार और टीआई,शहर के “सुरमा भोपाली” अब SECL में कर रहे पहरेदारी..राम को 14 साल का वनवास, डीएसपी लौटे 28 साल बाद,घर की लड़ाई में पड़ोसी के मजे…

 ये कैसी थानेदारी, आरोपी फरार और टीआई की पहरेदारी!

राजा विक्रमादित्य का नगर कहलाने वाले थाने में  इन दिनों “विक्रम-बेताल” चर्चा में है। साहब खुद को कड़कदार बताते हैं, पर जैसे ही बात रसूखदार फरार एजीएम तक पहुँचती है, उनकी सारी कड़क हरियाली के सामने कड़ाई अंगड़ाई लेने लगती है। पहरेदारी तो खूब है, मगर गिरफ्तारी का नाम नहीं। एसआई से थानेदार बने थानेदार की थानेदारी देख जनमानस कहने लगे है ये कैसी थानेदारी एजीएम फरार और साहब कहते है कड़क है थानेदारी..!

थानेदार की थानेदारी पर लोग सवाल उठाते हुए कहने लगे है जब आम आदमी फाइल में फँस जाए तो पुलिस धरती-आसमान एक कर देती है, पर जब आरोपी मालवान हो तो पुलिस का जीपीएस सिग्नल ही गायब हो जाता है!। ”सर, जांच जारी है” का राग शुरू हो जाता है। आखिर क्यों?

 

इसी जिले में एक थानेदार ने प्रतापगढ़ के शूटर को फिल्मी अंदाज में पकड़ लिया। तब लोगों ने कहा साहब भी प्रतापगढ़ी हैं, शूटर पकड़ना उनके बाएं हाथ का खेल है। मगर वही लोग अब पूछ रहे हैं कि एजीएम को पकड़ने में मुश्किल क्या है? शायद इसलिए कि अगर सोने का अंडा देने वाला मुर्गा जेल चला गया तो अंडा कौन देगा..!

सच तो यह है कि पुलिस चाहे तो पाताल से भी आरोपी निकाल ले, पर जब बात रसूखदारों की आती है तो नीति बदल जाती है। ताकि सांप भी मर जाए और डंडे भी न टूटे और डंडे के डर से अंडे मिलने का दौर जारी रहे। बस यही फर्क है थानेदारी और पहरेदारी में।

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 शहर के “सुरमा भोपाली” अब SECL में कर रहे पहरेदारी

मशहूर कॉमेडियन जगदीप उर्फ सुरमा भोपाली अब नहीं रहे, लेकिन शहर के “सुरमा भोपाली” इन दिनों कोयला खदानों के अधिग्रहित इलाकों में सक्रिय हैं। अंतर बस इतना है कि ये फिल्मी नहीं, फील्डी सुरमा हैं। ये नेतानुमा व्यापारी रात-दिन उन जमीनों की पहरेदारी में जुटे हैं जहाँ जल्द मुआवजे की बारिश होने की उम्मीद है।

असल में कोल माइंस के विस्तार की भनक इन्हें सबसे पहले लग जाती है। फिर शुरू होता है खेल सरकारी या निजी, जो भी जमीन हाथ लगे, उसे सस्ते दाम में खरीदकर पक्के मकान या गगनचुंबी इमारत खड़ी की जा रही है। ताकि मुआवजे की रकम कई गुना बढ़ जाए। कोयला तो ज़मीन के नीचे है, लेकिन मुनाफा ऊपर ही ऊपर निकल आता है।

पहले यह धंधा केवल कुछ चुनिंदा “राजनीति के राजदारों” तक सीमित था, लेकिन अब शहर के कई बड़े नेता भी इस रेस में शामिल हो गए हैं। बेजा कब्जे की जमीन पर आलीशान बंगले उठ रहे हैं और सरकार से उस पर खर्च की चार गुनी राशि वसूलने की तैयारी है। कहीं कोई दीवार उठ रही है तो समझ लीजिए, बिल्डिंग नहीं, बिलिंग की तैयारी चल रही है।

कहा जा रहा है कि फर्जी मुआवजा मामलों के लिए नेताओं और भूमाफियाओं का गठजोड़ सक्रिय है। राजस्व अधिकारियों से मिलीभगत कर ये लोग मुआवजा घोटाले की स्क्रिप्ट लिख रहे हैं। हालांकि, सूत्र बताते हैं कि सरकारी एजेंसियां भी ऐसे घोटालेबाजों पर कड़ी नजर रखे हुए हैं।जो भी हो शहर में चाय पर चर्चा तो यही है – “पहले “भोपाली” हंसाते थे, अब “सुरमा भोपाली” कमाते हैं।

राम को 14 साल का वनवास, डीएसपी लौटे 28 साल बाद

पुलिस महकमे में इन दिनों रामायण सीरियल जैसी चर्चा जोरों पर है। वजह भी दिलचस्प है मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम की तरह यहां भी एक सिंघम स्टाइल वाले साहब वापसी की कहानी है। फर्क बस इतना कि जहां राम ने 14 साल बाद अयोध्या लौटने का सफर पूरा किया, वहीं को चर्चित टीआई से डीएसपी बने साहब 28 साल बाद अपने गृह जिले लौटे हैं।

शर्मा जी ने नौकरी की शुरुआत के बाद छत्तीसगढ़ के कई जिलों में सेवाएं दीं। प्रमोशन के बाद अब उनकी पोस्टिंग बिलासपुर में हुई है। मजेदार बात यह कि परिवार बिलासपुर में रहते हुए भी उन्हें कभी वहां पदस्थ होने का मौका नहीं मिला।

महकमे में चर्चा है कि दशहरा का यह संयोग खास है जहां एक ओर राम अयोध्या लौटे, वहीं दूसरी ओर ‘सिंघम स्टाइल’ वाले डीएसपी शर्मा भी अपने शहर लौट आए। पुलिस गलियारों में मजाकिया लहजे में कहा जा रहा है कि जब अच्छे किरदार लौटते हैं, तो राम राज्य आने में देर नहीं लगती।

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घर की लड़ाई में पड़ोसी के मजे

 

बीजेपी के पूर्व मंत्री और सीनियर नेता ननकीराम कंवर के तेवर से सरकार असहज हो रही है। वे कोरबा कलेक्टर हो हटाने की मांग पर अड़े हुए है, जाहिर है जब पार्टी की सीनियर लीडरशिप को जिले के आला अफसर भाव नहीं देंगे तो उनकी नाराजगी स्वाभाविक है। हालांकि अभी ननकी राम पार्टी अध्यक्ष किरणदेव ने भरोसा दिलाया है कि उनकी मांग पूरी होगी, तब तक वे शांत रहे।

सभी जानते हैं ननकीराम कंवर को मनाना पार्टी के लिए उतना आसान नहीं है जितना कि सोचा जा रहा है। यदि कलेक्टर नहीं हटे, तो फिर क्या कदम उठाएंगे इस पर सभी की नजर है। कहावत है कि घर की लड़ाई में पड़ोसी के मजे..कुछ ऐसे ही हालात इस वक्त बने हैं। रही सही कसर बीजेपी की फायरब्रांड नेता और पूर्व केंद्रीय राज्य मंत्री रेणुका सिंह ने पूरी कर दी। विजय दशमी के दिन रेणुका ने ‘घर में भी रावण है, मन में भी रावण है, सरकार में भी रावण है और समाज में भी रावण रहते हैं, बात कर अपनी ही सरकार के खिलाफ गोल कर दिया।

ऐसे में अगर पड़ोसी मजा लेने लगे तो सरकार को भी सोचना चाहिए कि पार्टी की अंदरूनी लड़ाई सड़क पर न आ पाए…खास कर आदिवासी नेताओं के नाराजगी बीजेपी को भारी न पड़ जाए। अब कांग्रेसी मजे मजे लेकर पूछ रहे हैं कि रेणुका जी यह नहीं बता रहीं कि सरकार में रावण कौन है? हालांकि विवाद होने पर रेणुका सिंह ने अपने उस बयान पर सफाई भी दी और उसे एक सामान्य भाव से कहा गया था। मगर घर की बात घर में ही रहे तो अच्छा है।

 

शरद पूर्णिमा की खीर

 

आज शरद पूर्णिमा है और चंद्रमा अपनी सोलह कलाओं के साथ प्रकाशवान होगा, साथ ही खुले आसमान के नीचे रखे एक प्याले की खीर में अमृत बरसने वाला है। अब भला अमृत बरसेगा तो कौन नहीं चहेगा कि यह उसकी प्याली में बरसे। खबर है कि इस बार ब्यूरोक्रेसी में शरद पूर्णिमा की खीर की जबरदस्त चर्चा है। कई आईएएस अफसरों के यहां से मलाई वाले दूध के आर्डर दिए गए हैं। सभी चाहते हैं शरद पूर्णिमा की खीर में मलाई की कोई कमी न हो…।

ऐसा इ​सलिए क्योंकि विष्णुदेव साय की सरकार ने रविवार 12 अक्टूबर को कलेक्टर कांफ्रेंस रखा है। चर्चा है कि कांफ्रेंस के बाद कई जिलों के कलेक्टर इधर से उधर होंगे। कुछ जिलों के कलेक्टर फील्ड से मंत्रालय या एचओडी में आएंगे। कुछ आईएएस मंत्रालय से जिलों में जाएंगे। इस बार की शरद पूर्णिमा कई मायने में प्रदेश की ब्यूरोक्रेसी के लिए खास होने वाली है। इस बार खीर आज नहीं 12 अक्टूबर को बंटेगी तो कलेक्टरी करने वालों को 12 अक्टूबर तक के सूतक काल का इंतजार करना होगा।

वैसे तो शरद पूर्णिमा भगवान विष्णु को समर्पित होती है, और इस समय छत्तीसगढ़ में विष्णु की भक्ति करने के लिए अफसरों में होड मची है। मान्यता है कि इस दिन देवी लक्ष्मी पृथ्वी पर भ्रमण करती हैं और जो भक्त जागकर उनकी पूजा करते हैं, उन्हें समृद्धि और सुख-शांति का आशीर्वाद मिलता है। और अफसरों के बंगले पर साक्षात लक्ष्मी विराजती है… तो इंतजार करें इस बार की शरद पूर्णिमा पर बरसने वाला अमृत किस अफसर के प्याले पर बरसता है।

✍️ अनिल द्विवेदी, ईश्वर चन्द्रा

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