थानेदार का प्यार और गिरफ्तार
Weekly Articles kataksha : थानेदारों का प्यार और गिरफ्तारियों का किस्सा कोई नया नहीं है। कभी अपराधी को पकड़ने का प्यार, कभी फरियादी को समझाने का प्यार और कभी बड़े अफसरों के जी हुजूरी के आदेश का प्यार… लेकिन इस बार मामला थोड़ा अलग है। इस बार थानेदारों के सामने ‘बहन वाला प्यार’ आ खड़ा हुआ है।
रक्षा बंधन पर सत्ता पक्ष की बहनें और विपक्ष की नेत्रियां, सभी अपने-अपने रक्षा सूत्र लेकर थानेदारों की कलाई मजबूत करने पहुंचीं। थानेदारों ने भी मुस्कुराते हुए राखी बंधवाई, मिठाई खिलाई और भाई होने का फर्ज निभाने का भरोसा दिया।लेकिन कहानी में असली ट्विस्ट तब आया, जब थाना क्षेत्र की कुछ ऐसी ‘प्यारी बहनें’ भी रक्षा सूत्र लेकर पहुंच गईं, जिनका इलाके के कुछ उल्टे-सीधे कारनामों से पुराना नाता बताया जाता है।
अब बेचारे थानेदारों करें तो क्या करें ..एक तरफ कलाई पर राखी बंधी है और बहन ने रक्षा का वचन मांग लिया है। दूसरी तरफ उन्हीं बहनों के कारनामों की फाइलें शायद टेबल पर मुंह चिढ़ा रही हैं।थानेदार सोच में पड़ गए हैं कि राखी का गिफ्ट क्या दिया जाए? आखिर राखी का रिश्ता ही ऐसा है, जहां कुछ क्षणों के लिए पद, राजनीति और वर्दी सब पीछे छूट जाते हैं।
भाई वाला प्यार देकर कहें, “बहन, चिंता मत करना, तुम्हारी रक्षा हमारी जिम्मेदारी है…”या फिर सरकारी अंदाज में कहें, “बहन, रक्षा तो करेंगे ही… लेकिन पहले जरा हथकड़ी में हाथ आगे करना!”
वैसे तो राखी बांधने वाली बहन सत्ता पक्ष की हो तो राजनीतिक शिष्टाचार आड़े आता है, विपक्ष की हो तो लोकतांत्रिक भाईचारा निभाना पड़ता है और थाना क्षेत्र वाली ‘खास बहन’ हो तो कानून की किताब बीच में आ जाती है। अब थानेदारों की असली परीक्षा यही है कि रक्षा सूत्र की लाज बचाएं या कानून की धार तेज रखें। क्योंकि राखी की डोर कितनी भी मजबूत क्यों न हो, कानून की हथकड़ी उससे कहीं ज्यादा मजबूत होती है। फिलहाल थानेदारों के सामने सवाल सिर्फ इतना है…“बहन की कलाई पर राखी बांधकर रक्षा का वचन दें… या उसी कलाई में कानून की हथकड़ी?”
रक्षा बंधन तो हर साल आता है, लेकिन इस बार कुछ थानेदारों के लिए यह त्योहार सचमुच ‘रक्षा या गिरफ्तारी’ का धर्मसंकट बन गया है!
मोदी के भरोसे भाजपा
Weekly Articles kataksha : सितंबर का महीना छत्तीसगढ़ के लिए सियासी पारा गरमाने वाला होगा। विपक्षी कांग्रेस बिजली व्यवस्था के निजीकरण, यूसीसी, खनिज ब्लॉक्स की नीलामी और आदिवासियों के विकास के मुद्दे पर सरकार को घेर रही है। कांग्रेस जिन मुद्दों को उठा रही है, उस पर सरकार के मंत्री और बीजेपी नपा-तुला जवाब दे रहे हैं।
हालांकि, बीजेपी कांग्रेस के उठाए मुद्दों को काउंटर करने के लिए तैयार दिख रही है। मगर बीजेपी ये मानकर चल रही है कि नक्सलमुक्त बस्तर और मोदी के नाम के भरोसे वो डैमेज कंट्रोल कर लेगी।
बीजेपी 17 सितंबर से 17 अक्टूबर तक एक महीने तक चलने वाला ‘सेवा संकल्प अभियान’ शुरू करेगी, जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सार्वजनिक पद और शासन में लगातार 25 वर्ष पूरे होने पर ‘विकसित भारत 2047’ के विज़न को लेकर हर घर तक पहुँचेगी।
स्कूल, कॉलेज और जनता के बीच संवाद और चर्चा होगी। सरकारी और निजी स्कूलों में चित्रकला, पेंटिंग और भाषण प्रतियोगिताएँ होंगी। कुल मिलाकर, सरकार अभी भी मोदी के भरोसे बैठी है। अब देखने वाली बात ये होगी कि जनता में अभी मोदी का मैजिक बरकरार है या कांग्रेस के आरोपों में दम है।
9 करोड़ का काम, कलेक्टर साहब देंगे ध्यान…!
Weekly Articles kataksha : ‘जंगल में मोर नाचा, किसने देखा’ वाली कहावत अब शायद वन विभाग के लिए आउटडेटेड हो गई है। नई कहावत कुछ यूं बनती दिख रही है… ‘जंगल में 9 करोड़ का काम हुआ, किसने देखा?’ इसी पर ग्रामीण तंज कसते हुए कह रहे हैं, “9 करोड़ का है काम… कलेक्टर साहब, थोड़ा माली कछार सड़क का भी दीजिए ध्यान!”
दरअसल, कोरबा में डीएमएफ पुराण भी समय और परिवेश के अनुसार अपने नए अध्याय लिखता रहा है। कभी सतरेंगा और सप्लाई की चर्चा, तो कभी स्कूलों में बांटे जाने वाले अंडे और केले के ‘खेला’ की गूंज। अब वन विभाग के कामों को लेकर भी यक्ष प्रश्न खड़े होने लगे हैं।
पूर्ववर्ती डीएफओ के कार्यकाल में भी ऐसे कई काम चर्चा में रहे, जिनमें कॉफी पॉइंट से लेकर डब्ल्यूबीएम रोड तक का ‘मेला’ सजने की बातें सामने आती रही हैं। साहब के ट्रांसफर के बाद उनके कार्यकाल में हुए कामों की समीक्षा शुरू हुई तो कुछ ऐसे मामले चर्चा में आने लगे, जिन पर सवाल उठना लाजिमी है।
इन्हीं में से एक मामला माली कछार से बलसेंघा मार्ग की सड़क का है। 9 करोड़ रुपये की स्वीकृति वाली इस सड़क में मौके पर न गिट्टी नजर आ रही है, न मुरूम। दूसरी ओर, चर्चा यह भी है कि मटेरियल सप्लायर को पूरा भुगतान किया जा चुका है।
अब सवाल यही है कि जब मटेरियल का भुगतान पूरा हो गया तो सड़क निर्माण में वह मटेरियल गया कहां?
जानकारों का कहना है कि करोड़ों की राशि से स्वीकृत कोई काम अगर कागजों पर पूरा दिखाई दे और जमीन पर उसका अता-पता न मिले, तो जवाबदेही तय होना जरूरी है। यही वजह है कि सड़क निर्माण को लेकर ग्रामीण अब कलेक्टर की ओर उम्मीद भरी नजरों से देख रहे हैं।
ग्रामीणों की उम्मीद है कि कोई जिम्मेदार अधिकारी मौके पर जाकर काम की वास्तविक स्थिति देखे और सड़क निर्माण में स्वीकृत राशि से लेकर भुगतान तक की पूरी तस्वीर सामने आए। फिलहाल ग्रामीण तंज कसते हुए कह रहे हैं, “9 करोड़ का है काम… कलेक्टर साहब, थोड़ा वन विभाग में भी दीजिए ध्यान! कहीं ऐसा न हो कि सड़क कागजों में बनकर जंगल में ही खो जाए!”
युकां चुनाव में बड़ों की साख
Weekly Articles kataksha: सूबे में पीसीसी अध्यक्ष का टेन्योर पूरा होने के बाद भले ही दीपक बैज पद पर बने हुए हैं, मगर पार्टी निचले स्तर से संगठन में बदलाव की शुरुआत कर चुकी है। 30 अगस्त से युवक कांग्रेस के चुनाव शुरू हो गए। करीब सालभर से युवक कांग्रेस में चुनाव की तैयारी दिल्ली से हो रही थी। दिल्ली में इंटरव्यू हुए, अब 17 प्रत्याशी मैदान में हैं। लेकिन इन चेहरों के पीछे कांग्रेस के बड़े नेताओं ने करीबी होने का तमगा लगा है।
पार्टी के सीनियर नेताओं के बीच रस्साकशी चल रही है। खबरीलाल की मानें तो चुनाव प्रक्रिया में गड़बड़ियों और नियमों को लेकर कार्यकर्ताओं ने दिल्ली तक शिकायतें पहुंचाई थीं। जिसके बाद गुटों में बंटी कांग्रेस के नेताओं को चुनाव को लेकर सफाई देनी पड़ रही है।
असल में इस बार युकां चुनाव के जो नियम दिल्ली में तय किए गए हैं, वो सीनियर नेताओं को असहज कर रहे हैं। युवक कांग्रेस में प्रदेश अध्यक्ष और 12 उपाध्यक्षों का चुनाव होगा।
यानी दूसरे नंबर पर रहने वाले प्रत्याशी उपाध्यक्ष बनेंगे। चुनाव में अलग-अलग पदों के लिए अनुसूचित जाति, जनजाति, पिछड़ा वर्ग, अल्पसंख्यक, महिला और ट्रांसजेंडर के लिए उपाध्यक्ष और महामंत्री के पद आरक्षित किए गए हैं। दो साल बाद विधानसभा चुनाव होना है। इसलिए युकां चुनाव में सीनियर नेता अपने पसंद के उम्मीदवार बैठाना चाहते हैं।
हालांकि, एआईसीसी की ओर से गुटबाजी पर नजर रखी जा रही है। मगर चुनाव ऊंट किस करवट बैठेगा, इस पर कुछ कहना जल्दबाजी होगी। मगर इतना तय है कि अपने पसंद के चेहरों को जिताने में बड़ों की साख दांव पर लगी है। अभी शुरुआत है, इस बार क्या होता है, आगे पता चलेगा।
साहू ब्रदर्स का ‘एकछत्र राज’…
Weekly Articles kataksha :ऊर्जाधानी में इन दिनों कबाड़ सिर्फ लोहे-लंगड़ का खेल नहीं रहा, बल्कि किसका दबदबा कितना है, इसकी चर्चा भी खूब हो रही है। चौक-चौराहों से लेकर कानून के रखवालों तक कानाफूसी है कि कबाड़ के कारोबार में साहू ब्रदर्स का प्रभाव लगातार बढ़ता जा रहा है। लोग चटखारे लेकर पूछ रहे हैं, “भाई, कबाड़ उठा रहे हो या साम्राज्य बना रहे हो?”
कहते हैं, इंसान वही चीज ज्यादा जल्दी सीखता है, जिसे वह अपनी आंखों के सामने होते देखता है। अब इसे संयोग कहें या कारोबार की समझ, शहर के कबाड़ कारोबार में साहू ब्रदर्स के बढ़ते प्रभाव को देखकर लोग पुरानी कहावतों के नए अर्थ निकालने लगे हैं।
कबाड़ कारोबार की कहानी भी कम दिलचस्प नहीं है। एक दौर था, जब छोटे-बड़े कबाड़ कारोबारियों को जोड़कर एक मजबूत नेटवर्क की चर्चा होती थी और उसकी कमान खान ब्रदर्स के हाथों में मानी जाती थी। तब कारोबार कबाड़ का था, लेकिन अंदाज किसी कॉरपोरेट साम्राज्य से कम नहीं था। छोटे कारोबारी जुड़ते गए और बाजार में एक खास तरह की व्यवस्था बनती गई। समय बदला, पुराने किरदार “साजिश” के शिकार हुए तो नए खिलाड़ी मैदान में उतर आए। अब बदलते समीकरणों के बीच कबाड़ बाजार में फिर से हलचल तेज है।
शहर की गलियों में होने वाली चर्चाओं पर भरोसा करें तो मुकेश, राजेश, प्रहलाद और रवि साहू शहर से लेकर आउटर तक कबाड़ कारोबार में अपनी नई पटकथा लिखते नजर आ रहे हैं। कहा जा रहा है कि कारोबार का दायरा बढ़ रहा है और नेटवर्क भी लगातार मजबूत होता जा रहा है।
कहा तो यह भी जा रहा है कि छुरी के एक कबाड़ कारोबारी ने ऐसा चक्रव्यूह रचा कि थानेदार को थाना छोड़ना पड़ा।
ऊर्जाधानी में कबाड़ कारोबार का इतिहास बताता है कि यहां ताज कभी स्थायी नहीं रहता। वक्त के साथ कारोबारी बदलते हैं। कबाड़ बाजार की दुनिया में लोहे की तरह जंग लगते हैं, समीकरण भी गलते हैं, ढलते हैं और फिर किसी नए आकार में प्रकट होती हैं। कभी खान ब्रदर्स की चर्चा थी, अब साहू ब्रदर्स के नाम की चर्चा है।












