कोरबा। Korba News SECL Displaced Villagers कोयला खदानों की काली माटी से निकलने वाला ‘विकास’ अब किस दिशा में जा रहा है, यह सवाल कोरबा के भूविस्थापितों के सामने खड़ा है। किसानों की जमीन ली गई, गांव उजाड़े गए और अब आशियाना ऐसी जगह बसाने की कवायद बताई जा रही है, जहां आसपास डंपिंग और लैंडस्लाइडिंग का खतरा मंडरा रहा है।
भादो के पहले दिन हुई बारिश ने इस पूरे मामले की तस्वीर पर एक और सवालिया निशान लगा दिया है। बारिश के बाद लैंडस्लाइडिंग की स्थिति ने भूविस्थापितों की चिंता बढ़ा दी है। उनका कहना है कि जिस जगह उन्हें बसाने की बात हो रही है, वहां बरसात में जमीन ही खिसकने लगे तो गांव बसेगा कैसे और लोग रहेंगे कैसे?
गांव उजाड़कर डंपिंग यार्ड में ‘आशियाना’?
भूविस्थापितों का आरोप है कि SECL ने कोयला खनन और विस्तार के लिए उनकी जमीनें लीं। बदले में पुनर्वास और बेहतर जीवन की उम्मीद दिखाई गई, लेकिन अब जिस स्थान पर बसाने की बात हो रही है, उसकी स्थिति देखकर उनके माथे पर चिंता की लकीरें खिंच गई हैं।
भूविस्थापित तंज कस रहे हैं, “धन्य हो SECL के अधिकारी! किसानों की जमीन लेकर गांव उजाड़ा और अब माटी पुत्रों को डंपिंग यार्ड में बसाने का इंतजाम किया जा रहा है।”
सवाल सीधा है, क्या पुनर्वास का मतलब सिर्फ जमीन से हटाकर कहीं भी बसा देना है? अगर प्रस्तावित बसाहट के आसपास डंपिंग और लैंडस्लाइडिंग का खतरा है, तो फिर सुरक्षा के मानकों का क्या होगा?
बारिश ने खोल दी ‘विकास’ की पोल?
भादो की पहली बारिश ने उस इलाके की स्थिति को लेकर नई चर्चा छेड़ दी है। लैंडस्लाइडिंग के बाद अब जानकार भी सवाल उठा रहे हैं कि जिस भू-भाग की स्थिरता को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं, वहां भविष्य का गांव बसाने का फैसला कितना सुरक्षित है?
लोगों का कहना है कि गांव बसाना कोई फिल्मी सेट तैयार करना नहीं है, जहां नक्शे पर घर बना दिए और कहानी खत्म। यहां परिवार रहेंगे, बच्चे स्कूल जाएंगे और बुजुर्ग अपनी जिंदगी बिताएंगे। ऐसे में जमीन की स्थिरता, जल निकासी, डंपिंग की स्थिति और पर्यावरणीय सुरक्षा जैसे सवालों का स्पष्ट जवाब जरूरी है।
‘साउथ मूवी’ जैसी स्क्रिप्ट, लेकिन किरदार असली!
इलाके में चर्चा है कि डंपिंग के बीच गांव बसाने की पटकथा किसी साउथ की एक्शन फिल्म जैसी लगती है। फर्क सिर्फ इतना है कि फिल्म में खतरा पर्दे पर होता है, जबकि यहां भूविस्थापितों को आशंका है कि खतरा उनके घरों के आसपास होगा।
अब सवाल SECL के जिम्मेदार अधिकारियों से है कि क्या प्रस्तावित बसाहट स्थल का तकनीकी और सुरक्षा परीक्षण कराया गया है? क्या लैंडस्लाइडिंग की स्थिति का आकलन किया गया? क्या बरसात के दौरान यहां रहने वाले परिवारों की सुरक्षा की कोई ठोस योजना है?भूविस्थापित अब सिर्फ आश्वासन नहीं, मौके की जांच और स्पष्ट जवाब चाहते हैं।क्योंकि सवाल सिर्फ जमीन का नहीं है…सवाल उस आशियाने का है, जिसे उजाड़कर नया घर देने का वादा किया गया था। और अगर नया आशियाना ही डंपिंग और लैंडस्लाइडिंग के साए में होगा, तो फिर भूविस्थापित पूछ रहे हैं…“साहब, गांव बसाना है या खतरे को घर-घर पहुंचाना है?”












