BreakingFeatured

List of IPS officers : खाकी की सावन साधना, ‘मौन व्रत’ और,नेताजी का तराना: “अपनों में मैं बेगाना..चना की नाच और प्रशासनिक बीन,इनकी फरियाद कौन सुनेगा साबेह…

खाकी की सावन साधना, ‘मौन व्रत’ और 

 

Chhattisgarh IPS Officers ऊर्जाधानी कोरबा की पुलिस की सावन साधना की शहर में जोरदार चर्चा है। वैसे भी जिले की पुलिस के लिए हर मौसम सावन ही होता है… पुलिस को केवल हरियाली से ही मतलब रह गया है। शहर में कौन आ रहा है, कौन जा रहा है और कौन ठहर रहा है, इन सवालों से खाकी ने ‘मौन व्रत’ धारण कर लिया है।

 

आखिर पुलिस का काम हर आने-जाने वाले पर नजर रखना थोड़े ही है! अतिथि का सम्मान करना हमारी पुरानी परंपरा है और खाकी तो वैसे भी परंपराओं की सबसे बड़ी संरक्षक मानी जाती है। जिले की पुलिस भी ‘अतिथि देवो भवः’ वाली भावना पर काम करती है।

 

इसका फायदा बिहारी गैंग ने उठाया। डेढ़ करोड़ की डकैती करने के बाद ‘सेफ हाउस’ में आए और कुछ दिन यहां आराम फरमाया। चाय-समोसे का आनंद लिया, लूटी गई रकम का हिसाब-किताब बैठाया और जब बिहार पुलिस पहुंची तो उसके साथ ऐसे चलते बने, जैसे मेहमान की विदाई का वक्त हो गया हो।

 

मजे की बात यह कि स्थानीय पुलिस को इसकी भनक तक नहीं लगी। बिहार पुलिस ने पहुंचकर कहा ‘साहब, हमें थोड़ा बल चाहिए।’ तब जाकर पता चला कि मेहमान कौन थे और क्यों आए थे।

ऐसे में आम जनता का सवाल जायज है, कानून-व्यवस्था आखिर चल किसके भरोसे रही है? अफसरों के भरोसे? थानों के भरोसे? या फिर उस अदृश्य शक्ति के भरोसे, जिसे आम बोलचाल में लोग कहते हैं ‘भगवान भरोसे’? यानी, ‘आइए, लूटिए, आराम कीजिए और जब मन भर जाए तो अपने राज्य की पुलिस के साथ वापस जाइए।’

 

आईपीएस की जंबो सूची

 

 

पिछले सप्ताह खबर आई थी कि स्वतंत्रता दिवस पर बिलासपुर या दुर्ग जिले में पुलिस कमिश्नरी सिस्टम लागू करने का ऐलान हो सकता है। मगर ऐसा नहीं हुआ। खबरीलाल की मानें तो पुलिस कमिश्नरी सिस्टम के विस्तार में सरकार जल्दीबाजी करने के मूड में नहीं है।

पुलिस कमिश्नरी सिस्टम में अनुभवी अफसरों की पोस्टिंग होनी है, जिनके पास प्रशासनिक व्यवस्था के साथ संकट प्रबंधन, नीति-निर्माण और जमीनी स्तर पर काम करने का लंबा अनुभव हो। मंत्रालय में जल्द ही आईपीएस अफसरों की नई पदस्थापना सूची जारी होने की चर्चा है।

पहले माना जा रहा था कि दुर्ग और बिलासपुर में पुलिस कमिश्नरी प्रणाली लागू करने के बाद अफसरों के फेरबदल किए जाएंगे। फिलहाल दुर्ग और बिलासपुर में पुलिस कमिश्नरी का फैसला आगामी बजट सत्र के लिए पेंडिंग लिस्ट में है। लेकिन आईपीएस अफसरों की ट्रांसफर सूची कभी भी जारी हो सकती है। इस सूची में कई जिलों के एसपी प्रभावित हो सकते हैं।

 

नेताजी का तराना: “अपनों में मैं बेगाना…

 

 

किशोर कुमार का वह सदाबहार दर्दीला गीत”मतलबी हैं लोग यहाँ पर, मतलबी ज़माना…सोचा था साया साथ देगा, निकला वो बेगाना!” इन दिनों भाजपा के एक ‘खास’ नेताजी के सियासी सफर पर हुबहू फिट बैठ रहा है। नेताजी के राजनीतिक गुलशन की महक विरोधियों को भले ही रास न आ रही हो, लेकिन यहाँ तो खुद उनके ‘अपनों’ का ही हाजमा बिगड़ा हुआ है।

चुनावी चाणक्यों की मानें तो, हाल ही में ‘तिरंगा यात्रा’ के दौरान नेताजी के हाथ में उल्टे झंडे वाली जो तस्वीर सोशल मीडिया पर वायरल हुई, वह किसी विपक्षी दल की कारस्तानी नहीं थी। चुनावी गलियारों में दबी ज़ुबान से चर्चा है कि इस ‘तस्वीर’ को कैमरे में कैद कर वायरल करने वाले कोई और नहीं, बल्कि नेताजी के अपने ही खास ‘जयचंद’ थे।

यदि यह चर्चा सच है, तो इससे ज्यादा विडंबनापूर्ण स्थिति और क्या होगी कि राजनीतिक रण में दुश्मन सामने से वार करे तो आदमी संभल भी जाए, मगर जब तीर अपने ही तरकश से चले तो दर्द कुछ ज्यादा गहरा होता है।

यह दर्द भरा गीत नेताजी के सभापति चुनाव के उस पुराने ज़ख्म को हरा करने के लिए काफी है, जो अभी पूरी तरह भरा भी नहीं था।सियासी हकीकत तो यह है कि पार्टी हाईकमान के कड़े फरमान के बाद बड़े-बड़े सूरमा नेताजी के कंधे से कंधा मिलाकर चलते तो दिखे, लेकिन जब बात सभापति पद की वैतरणी पार कराने की आई, तो सबने अपने हाथ खींच लिए थे। यानी जिस्म तो नेताजी के साथ कदमताल कर रहा था, पर आत्मा कहीं और ही ‘अंतरात्मा की आवाज़’ सुनने में मगन थी।खैर, समय के साथ “जो बीत गई सो बात गई” का मंत्र जपते हुए नेताजी जैसे ही हौले-हौले आगे बढ़ने की कोशिश करते हैं, उनके अपने ही लोग उन्हें बदनाम करने का कोई नया पैंतरा खेल देते हैं। यह अलग बात है कि नेताजी के वफादार समर्थक अब उस ‘उल्टे झंडे’ वाली फोटो को ‘एआई जनरेटेड’ (AI Generated) बताकर तरह-तरह के तकनीकी तर्क दे रहे हैं और डैमेज कंट्रोल में जुटे हैं। मगर खुद नेताजी इस कड़वी हकीकत को भांप चुके हैं। वे अब बस अकेले में किशोर दा का वही तराना गुनगुनाकर अपना मन बहला रहे हैं “अपनों में मैं बेगाना…”

 

 

चना की नाच और प्रशासनिक बीन

 

 

कहावतें भी समय के साथ अपग्रेड हो जाती हैं। “नाकों चने चबाना” अब आदिमकाल का मुहावरा हो चुका है। हमारे आधुनिक, संवेदनशील और डिजिटल तंत्र ने इस मुहावरे का राष्ट्रीयकरण करके एक नया शास्त्रीय नृत्य ईजाद किया है ‘चना नाच’।

 

असल में यह देश का इकलौता ऐसा नृत्य है, जिसमें नर्तक अदृश्य होता है, घुंघरू फाइलों में बंधे होते हैं और दर्शक (यानी गरीब जनता) भूखे पेट ताली बजाती है। इस अद्भुत ‘चना-पुराण’ को समझने के लिए आपको व्यवस्था को तीन चश्मों से देखना होगा। पहला चश्मा कागजों का है, जहाँ चना केवल एक अनाज नहीं, बल्कि कुपोषण के खिलाफ सरकार का ‘परमाणु हथियार’ है। लेकिन जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल उलट है। यहाँ चना वह जादुई कलाकृति बन चुका है, जिसे देखकर पी. सी. सरकार और हैरी हुडिनी जैसे महान जादूगर भी राशन दुकान के सामने आत्मसमर्पण कर दें। वर्तमान में चना आबंटन एक ऐसे पवित्र चक्रव्यूह में फंसा है, जिसके निर्माता और धृतराष्ट्र दोनों हमारे बाबू ही हैं; और इसकी चाबी सिर्फ ‘फाइलों के उदर’ में मिलती है।

कहा तो यह भी जा रहा है कि हर महीने लाखों रुपये का चना गरीब की थाली की तरफ पूरी रफ्तार से बढ़ता है, लेकिन रास्ते में ही किसी ‘वरिष्ठ अदृश्य फाइल’ की बीन बज उठती है। चना उस धुन पर ऐसा सम्मोहित होता है कि बहानों के गोलचक्कर से घूमता हुआ सीधे किसी रसूखदार के गोदाम में विलीन हो जाता है।नतीजतन, गरीब राशन दुकान की चौखट पर उम्मीद का कटोरा और हताशा का कार्ड लेकर खड़ा रहता है, और अंदर से कोटेदार का एक ही घिसा-पिटा टेप-रिकॉर्डर बजता है “ऊपर से माल कम आया है!”

हर महीना लाखो रुपये के चने का हिसाब बहानों के ब्लैक होल में समा जाए तो सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर यह चना किस दिव्य पेट में जाकर पच रहा है? क्या उस पेट का हाजमा सरकारी नियमों से भी ज्यादा मजबूत है? अब जनमानस के बीच बस यही एक यक्ष प्रश्न चर्चा में है कि “जनाब, आखिर यह सरकारी चना चबाया किसने, और राशन की लाइन में गरीब को नाच नचाया किसने?”

 

 

इनकी फरियाद कौन सुनेगा साबेह

 

 

पिछले सप्ताह अंबिकापुर के कलेक्टोरेट में अजीब नजारा दिखा। कलेक्टोरेट के कैंपस में गाय, बैल और बछड़ों का झुंड जमा था… फरियादी थे गांव के किसान, जो इस झुंड को गांव से हांककर कलेक्टोरेट पहुंचे थे। ग्रामीणों का आरोप था कि नगर निगम आवारा पशुओं को काऊ कैचर में रखने की जगह गांव की सरहद में छोड़ जाते हैं और ये पशु उनकी फसल बर्बाद कर रहे हैं।

पहले जो समस्या शहर में दिखती थी, वो गांव तक पहुंच गई। शहर की सड़कों पर खुले छोड़े गए इन आवारा पशुओं की वजह से हादसे तो हो ही रहे हैं, इन पशुओं की जानें भी गंवानी पड़ रही हैं। समय-बेसमय ये खबरें आती रही हैं कि अज्ञात वाहन चालक ने आवारा पशुओं को कुचल दिया। मगर क्या इसे खबर मानकर चला जाए? ये खबर नहीं, बल्कि व्यवस्था का सवाल है।

सड़क पर खुले घूमने वाले आवारा पशुओं की वजह से हो रही परेशानी को लेकर हाईकोर्ट ने भी सरकार से सवाल पूछा है… गोधाम के बावजूद सड़कों पर आवारा पशु क्यों? अब तो पिछली सरकार की ‘गोठान योजना’ को लेकर कांग्रेस भी सिस्टम पर सवाल उठा रही है। कांग्रेस का आरोप है कि पौने ढाई वर्षों में 850 से अधिक गायें सड़कों पर हादसों में कुचलकर मारी गईं। इसके अलावा 1200 से अधिक गायों की मौत चारे-पानी के अभाव व भूख से हुई, जबकि 200 से ज्यादा गायें जहरीला पदार्थ खाने से मर गईं।

छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में पिछले सप्ताह ही हरेली त्योहार मना। गौधन की पूजा-अर्चना हुई। मगर क्या केवल हरेली त्योहार मनाने से सरकारी सिस्टम अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो जाएगा… क्या गौधन को यूं ही सड़क पर खुले घूमने के लिए छोड़ दिया जाएगा? अंबिकापुर के कलेक्टोरेट में जो कुछ हुआ, वो केवल ग्रामीणों की फरियाद नहीं थी, बल्कि उन गाय, बैल और बछड़ों की मूक फरियाद थी, जो सिस्टम से ये पूछने आए थे कि साहेब गौठान कहां हैं..गौचर बचे नहीं.. हम कहां जाएं..!

 

 

   ✍️अनिल द्विवेदी, ईश्वर चंद्रा

Related Articles

Back to top button