
खाकी का ‘दोस्ताना’ और व्यवस्था का चित्रगुप्त
khaki-ka-dostana-vyavastha-ka-chitragupt “बड़े लोगों के दिल में सिर्फ़ नफ़रत की दास्तानें हैं,खता सिपाही की है और कप्तानों के थाने हैं।” कभी-कभी कुछ लाइने व्यवस्था के आईने में बदल जाती है। इन दिनों पुलिस विभाग के गलियारों में ये पंक्तियां कुछ ऐसा ही आईना बनकर खड़ी दिखाई दे रही हैं। कारण है बहुचर्चित रिश्वत कांड जिसमें कार्रवाई की तलवार तो चली, लेकिन उसकी धार फिलहाल वहीं तक पहुँची है जहां आमतौर पर पहुँचती है,प्यादों तक।
कटघोरा का वसूली कांड इसका सटीक प्रमाण है। बाइक सवार से बीस हजार की कथित वसूली पर दो आरक्षक निलंबित हुए, तो लगा न्याय हो गया। लेकिन असली कहानी तो इस कार्रवाई के पीछे छिपा है निलंबन के बाद भी चेहरे पर शिकन नहीं, बल्कि होंठों पर वही पुराना तराना है: “बने चाहे दुश्मन जमाना हमारा…”
सवाल सिपाही की हिम्मत का नहीं, उस ‘मेहरबानी’ का है जिसने उन्हें चौकी का ‘चित्रगुप्त’ बना दिया था। कागज़ पर प्रभारी कोई और, लेकिन खाते का हिसाब-किताब इनके पास! कोई भी प्यादा बिना शहंशाह की मूक सहमति के वज़ीर जैसी चालें नहीं चल सकता। कार्रवाई तो निचले पायदान पर हो गई, पर असली सवाल उस ‘माहौल’ का है जो इन प्यादों को बेखौफ बनाता है। मतलब साफ है जब तक व्यवस्था में छोटी मछलियों को बलि का बकरा बनाकर मगरमच्छों की ‘मेहरबानी’ बरकरार रहेगी, तब तक खाकी का यह ‘दोस्ताना’ इसी तरह गुनगुनाता रहेगा।
चाय पर चर्चा तो यही है कि, ” खाकी की प्रतिष्ठा किसी एक आरक्षक की वर्दी से नहीं बनती और न किसी एक निलंबन से बचती है। उसकी प्रतिष्ठा तब बचती है, जब छोटे से छोटे हाथ और बड़े से बड़े संरक्षण, दोनों के लिए एक ही तराजू हो..”
एक तीर से दो शिकार, पेड़ भी लगाए और…
कहते हैं, असली खिलाड़ी वही होता है, जो लाठी भी सलामत रखे और सांप का काम भी तमाम कर दे। नगर निगम कोरबा में इन दिनों एक शांत स्वभाव के अफसर ने इस कहावत को कुछ इस अंदाज में सच साबित किया कि एक तीर से दो शिकार भी हुए और संदेश भी साफ चला गया… झुकती है दुनिया, झुकाने वाला चाहिए!
असल में पॉवर सिटी में व्यापारी नेताओं के संरक्षण में बेतरतीब वाहन पार्किंग और दुकानों को सड़क तक सजाने की कवायद ने कई जगहों पर मानव निर्मित ट्रैफिक जाम की स्थिति पैदा कर दी थी। हालात ऐसे कि व्यवस्था पर सवाल उठने लगे थे। जब अतिक्रमण हटाने की कोशिश होती, तो किसी न किसी नेता का फोन कार्रवाई की राह में कांटे बनकर खड़ा हो जाता था।
अब हरित पट्टी विकास और वृक्षारोपण के नाम पर सड़क किनारे लगाए जा रहे पौधे पहली नजर में पर्यावरण प्रेम की खूबसूरत तस्वीर नजर आते हैं। राहगीरों को आने वाले दिनों में धूप से राहत मिलेगी, सड़कें हरी-भरी दिखेंगी और शहर का सौंदर्य भी निखरेगा। यानी एक फायदा तो पक्का!लेकिन कहानी का दूसरा पहलू भी कम दिलचस्प नहीं है।
जिन व्यापारियों ने सड़क किनारे अपनी दुकानों का विस्तार करते-करते फुटपाथ और सड़क तक को अपनी जागीर समझ लिया था, उनके लिए यही पौधे अब हरी लक्ष्मण रेखा बनने जा रहे हैं। अब ये पौधे बड़े होंगे तो छांव भी देंगे और अपनी जड़ों के साथ सड़क की सीमा भी मजबूत कर देंगे।
सबसे खास बात यह कि अफसर ने न किसी से सीधी बहस की, न किसी की दुकान पर डंडा चलाया और न ही कोई बड़ा विवाद खड़ा किया। बस, सड़क किनारे पौधे लगा दिए। अब ये पौधे बड़े होंगे तो छांव भी देंगे और अपनी जगह के साथ-साथ सड़क की सीमा भी तय करेंगे। यानी निगम का डंडा भी नहीं चला और अतिक्रमण की सीमा भी तय हो गई।इसे ही तो कहते हैं प्रशासनिक बुद्धिमत्ता का कमाल.. एक तीर से दो शिकार..!
कौन सुनेगा किसको सुनाए…
कहते हैं उधारी का पटाखा फूटता नहीं, जल जीवन मिशन के ठेकेदारों का हाल भी कुछ ऐसा ही है। सरकार ने मिशन मोड में काम कराया, ठेकेदारों ने धूप-बारिश में पसीना बहाकर काम पूरा किया, लेकिन भुगतान की बारी आई तो फाइलें जांच, प्रमाण पत्र और हस्ताक्षरों की भूलभुलैया में फंस गईं।
ठेकेदार एसोसिएशन ने आवाज उठाई तो आश्वासन मिले। सोलर कार्यों के भुगतान का भरोसा भी मिला, लेकिन अब पूर्णता प्रमाण पत्र और सीईओ के हस्ताक्षर का नया अध्याय शुरू हो गया है। नतीजा यह कि ठेकेदार विभागों के चक्कर काट रहे हैं। फाइलें आगे बढ़ती नहीं और आशाओं पर लगातार तुषारापात हो रहा है।
जल घर-घर पहुंचा या नहीं, यह अलग प्रश्न है, मगर भुगतान के इंतजार में ठेकेदारों की आंखों का पानी जरूर सूख रहा है। अब दफ्तरों की चौखट पर खड़े श्रमवीरों की जुबां पर बस यही है..“कौन सुनेगा, किसको सुनाएं.. इसीलिए चुप रहते हैं..”
महानदी भवन में सावन का वेलकम
छत्तीसगढ़ के मंत्रालय महानदी भवन में सावन का जोरदार वेलकम हुआ। तबादलों और पोस्टिंग की फुहार के साथ। इसी महीने सरकार ने एक झटके में कई जिलों के डीएफओ बदल डाले। शिक्षा विभाग में हुए गुरुजी के तबादलों ने सभी को चौंका दिया। थोक भाव में टीचर्स के ट्रांसफर आदेश जारी हुए।
खबरीलाल की मानें तो आईएफएस के बाद मंत्रालय में आईएएस अफसरों की एक ट्रांसफर सूची कभी भी जारी हो सकती है। कुछ जिलों के कलेक्टर बदल सकते हैं। इस फेरबदल में मंत्रालय के सचिव स्तर के अधिकारी भी प्रभावित होंगे।
सरकार चुनावी तैयारी कर रही है। बस्तर, सरगुजा और बिलासपुर संभाग के अफसरों का रिव्यू तैयार किया गया है, जिसमें इन जिलों में मैदानी कार्यों, फाइलों के निपटारे और विकास योजनाओं की प्रगति का पूरा हिसाब-किताब तैयार किया गया है।
सूत्रों की मानें तो जांजगीर-चांपा, सारंगढ़ जैसे नए जिलों में सरकार फोकस कर रही है। आने वाली सूची में इन जिलों में नए अफसरों को कलेक्टरी संभालने का मौका सकता है। फिलहाल 15 अगस्त के आसपास नई सूची जारी हो सकती है।
बधाई हो बिलासपुर पुलिस
1 जुलाई 2024 से लागू नवीन आपराधिक कानूनों के प्रभावी क्रियान्वयन में बिलासपुर पुलिस राज्य में दूसरे स्थान पर है। डिजिटल तकनीक के व्यापक उपयोग की वजह से ऐसा हो पाया। यह खबर केवल बिलासपुर के लिए नहीं, बल्कि उन जिलों के लिए भी एक नजीर है, जो अब तक स्मार्ट पुलिसिंग में पिछड़े हुए हैं।
बस्तर, सरगुजा जैसे संभागों में त्वरित न्याय व्यवस्था के लिए जिले की पुलिस को भी ऐसी ही डिजिटल तकनीक की जरूरत है। इसे हासिल करने के लिए जिले के सभी थानों एवं चौकियों में विवेचना प्रणाली को डिजिटल और पारदर्शी बनाना जरूरी है।
इस उपलब्धि के पीछे जिले के पुलिस कप्तान रजनेश सिंह और उनकी टीम को बधाई जरूर दी जानी चाहिए। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट और पुलिस मुख्यालय की ओर से नवीन आपराधिक कानूनों के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए समय-समय पर निर्देश दिए जाते रहे हैं। मगर कुछ जिले अभी भी अपना पुराना ढर्रा बदलने में पीछे हैं।
उम्मीद है कि डिजिटल पुलिसिंग में बिलासपुर पुलिस को मिली यह सफलता दूसरे जिलों के लिए उदाहरण बनेगी। लेकिन इसके लिए लगातार मॉनिटरिंग, मजबूत टीम और जनता के बीच पुलिस का चेहरा बदलने की ईमानदार कोशिश भी जरूरी है।





