Korba News: “देखन में छोटे लगे, घाव करे गंभीर”... पुलिस महकमे में इन दिनों यही कहावत सबसे ज्यादा प्रासंगिक दिखाई दे रही है। साहब को कोयलांचल में पदस्थ करने के लिए सरहद की जिम्मेदारी एक सहायक उप निरीक्षक (एएसआई) के हवाले कर दी गई। उधर, सरहदी थानेदार की कबाड़ जंक्शन में एंट्री होते ही कोयलांचल के कई थानों की कुर्सियां हिलने लगी हैं।
सरहद हमेशा से केवल भौगोलिक रेखा नहीं रही, वह अनुभव, धैर्य और निर्णय क्षमता की परीक्षा भी मानी जाती है। इसलिए वहां तैनाती अक्सर उन कंधों को मिलती थी, जिन्होंने समय की धूप और जिम्मेदारियों की धूल साथ-साथ झेली हो। मगर समय का स्वभाव है कि वह परंपराओं से ऊब जाता है। इस बार उसने नया अध्याय लिख दिया।
इस बार सरहद की जिम्मेदारी एएसआई के भरोसे छोड़ने का फैसला महकमे में चर्चा का सबसे बड़ा विषय बन गया है। सवाल फैसले से ज्यादा उसके संदेश पर उठ रहे हैं, क्योंकि एक आदेश ने यह एहसास करा दिया कि अब महकमे में कुछ भी “असंभव” नहीं रहा लेकिन व्यवस्था का अपना दर्शन है, वह हर निर्णय को प्रशासनिक आवश्यकता कहती है
चर्चा तो इस बात की है कि अब पोस्टिंग फाइलों से कम और “सिस्टम के मूड” से ज्यादा तय होती है। वर्षों तक धूप, धूल और जोखिम के बीच सेवा देने वाले अधिकारी अब अपनी सीआर से ज्यादा तबादला सूची का अध्ययन कर रहे हैं। उन्हें अपनी उपलब्धियों से अधिक अगली सूची में अपने नाम का इंतजार है।
सबसे दिलचस्प बात यह है कि हर नई पोस्टिंग कुछ चेहरों पर मुस्कान और कई चेहरों पर बेचैनी छोड़ जाती है। किसी की पदस्थापना दूसरे की चिंता बन जाती है। महकमे की सबसे असुरक्षित चीज अगर कोई है, तो वह कुर्सी है, क्योंकि उसे भी नहीं पता कि उसका अगला मालिक कौन होगा।
फिलहाल पुलिस महकमे का संदेश साफ नजर आता है। योग्यता, अनुभव और वरिष्ठता आज भी सम्मानित शब्द हैं, लेकिन पोस्टिंग की शब्दावली में उनका महत्व हर नई सूची के साथ बदलता दिखाई देता है। काबिल अफसर अब भी कतार में खड़े हैं और इंतजार सिर्फ एक आदेश का नहीं, बल्कि उस तर्क का भी कर रहे हैं जो कभी इन आदेशों की पहचान हुआ करता था। महकमे में चल रहे प्रयोग को देख जनमानस कहने लगे है पुलिसिंग में कम होते की धार की असली वजह पोस्टिंग है।






