IIM classes and : संघम शरणम् गच्छामि और थानेदार,कॉफी विद 28 का आठ..और रेंजर साहब के ठाठ! अब तक 67… कमाल का नगर निगम! नकटी बात कहां अटकी!

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संघम शरणम् गच्छामि और थानेदार की छुट्टी!

 

 

​IIM Classes संघ की शरण में जाने के बाद एक थानेदार की स्थिति ‘चौबे गए थे छब्बे बनने, दुबे बनकर लौटे’ वाली हो गई है। महज एक दिन के लिए कोतवाल बने साहब को लेकर अब जनमानस तंज कसते हुए कह रहा है“संघम शरणम् गच्छामि और थानेदार की छुट्टी!”

​कहानी तब शुरू हुई, जब तबादला सूची जारी हुई और साहब की मनपसंद कुर्सी हाथ से फिसलती दिखी। खबरीलाल की मानें तो साहब को अपनी वर्दी और काम पर भरोसा कम, ‘जुगाड़’ पर ज्यादा था। लिहाजा, ट्रांसफर रुकवाने या बदलवाने की उम्मीद में संगठन की शरण ली गई। गणित लगाया गया था कि ऊपर से थोड़ा दबाव बनेगा, कप्तान का फैसला बदलेगा और पसंदीदा थाना फिर से झोली में आ गिरेगा। लेकिन नीयति और खाकी का गणित कुछ और ही था।

​साहब का यह दांव पूरी तरह उल्टा पड़ गया। रसूख के दम पर थाना बचाना तो दूर, उन्हें सीधे पुलिस लाइन हाजिर होने का फरमान सुना दिया गया। अब महकमे के गलियारों में दबी मुस्कुराहट के साथ यही तंज गूंज रहा है “संघम शरणम् गच्छामि… लेकिन मंजिल पुलिस लाइन!”इस घटनाक्रम ने एक पुरानी और बुनियादी सीख फिर ताजा कर दी है। खाकी में सबसे बड़ा संरक्षण किसी संगठन, सिफारिश या रसूख का नहीं, बल्कि अनुशासन और बेदाग सेवा रिकॉर्ड का होता है। वर्दी जब अपने दम पर सम्मान कमाती है, तब उसे किसी बैसाखी की जरूरत नहीं पड़ती। लेकिन जब पोस्टिंग को प्रतिष्ठा का प्रश्न और पैरवी को हथियार बना लिया जाए, तो अक्सर कुर्सी भी जाती है और साख भी।

 

​महकमे में चर्चा तो यह भी है कि आजकल कुछ पुलिसकर्मियों की ऊर्जा अपराधियों को पकड़ने से ज्यादा, पोस्टिंग के गणित पर खर्च हो रही है। जब थाने की जिम्मेदारी निभाने से ज्यादा फोकस कुर्सी बचाने की कवायद पर होने लगे, तो ऐसे परिणाम चौंकाते नहीं, बल्कि एक कड़ा संदेश देते हैं।

 

 

कॉफी विद 28 का आठ… और रेंजर साहब के ठाठ!

 

 

​टीवी पर आपने करण जौहर का चर्चित शो ‘कॉफी विद करण’ जरूर देखा होगा, जहां फिल्मी सितारे कॉफी की चुस्कियों के साथ अपने राज खोलते हैं। लेकिन इन दिनों बालको के जंगलों में इससे भी ज्यादा चर्चित एक शो चल रहा है, जिसका नाम है “कॉफी विद 28 का 8… और रेंजर साहब के ठाठ!” फर्क सिर्फ इतना है कि यहां कॉफी के कप के साथ राज नहीं, बल्कि सरकारी खजाने का ‘जादुई’ गणित खुल रहा है।

 

​कहानी शुरू होती है डीएमएफ (DMF – डिस्ट्रिक्ट मिनरल फाउंडेशन) के करीब 90 लाख रुपयों से। इस भारी-भरकम राशि से जंगलों के बीच एक आकर्षक कॉफी पॉइंट और वन चेतना केंद्र तैयार किया गया। मकसद बिल्कुल साफ और नेक था जंगल की सैर पर आने वाले लोग प्रकृति के बीच कॉफी का आनंद लें, पर्यटन को बढ़ावा मिले और इससे होने वाली आमदनी से दूधीटांगर वन प्रबंधन समिति के स्थानीय ग्रामीणों की आजीविका मजबूत हो लेकिन, असली खेल तो इसके बाद शुरू हुआ।

 

जैसे-जैसे कॉफी पॉइंट पर सैलानियों की भीड़ बढ़ी, वैसे-वैसे वहां नोटों की खुशबू भी महकने लगी। बस फिर क्या था… रेंजर साहब की नजर कॉफी मशीन से ज्यादा कैश काउंटर पर जाकर टिक गई। शायद साहब के मन में विचार आया कि जब कॉफी का पूरा सेटअप सरकारी है, तो इसकी मलाई का स्वाद जनता या ग्रामीण क्यों चखें? सूत्रधार की माने तो कॉफी पॉइंट की कुल आय का हिसाब-किताब कागजों पर उतरा, तो 28 लाख रुपये का आंकड़ा किसी तिलिस्म से सिकुड़कर सिर्फ 8 लाख रुपये रह गया। यानी पूरे 20 लाख रुपये ऐसे गायब हुए, मानो गर्म कॉफी की भाप बनकर हवा में उड़ गए हों! वो तो भला हो डीएफओ मैडम का जिनकी नजर रजिस्टर पर पड़ी और 20 लाख की गड़बड़ी का खुलासा कर दिया। बालको रेंज में हुए इस रहस्यमयी घटना पर जनमानस चुटकी लेते हुए कहने लगे है कॉफी विद 28 का आठ… और रेंजर साहब के ठाठ है भाई..!

 

 

अब तक 67… कमाल का नगर निगम!

 

 

​कोरबा नगर निगम वाकई अनूठा और कमाल का है। यहाँ जब भी शहर की कोई बुनियादी समस्या विकराल रूप लेती है, तो निगम प्रशासन समस्या की जड़ को दूर करने के बजाय ‘अफसरों’ की संख्या का पेड़ बड़ा कर देता है। शहर की बदहाल सड़कों और महीनों से बंद पड़ी स्ट्रीट लाइटों को सुधारने के लिए इस बार पूरे 67 नोडल अधिकारियों की पलटन मैदान में उतार दी गई है। इन साहबों को बकायदा शह दी गई है कि”आप ही वार्ड के असली भाग्यविधाता हैं, आपकी इजाजत के बिना यहाँ पत्ता भी नहीं हिलना चाहिए।”

 

​अफसरों की यह भारी-भरकम फौज अब शहर की गलियों में गश्त कर रही है। लेकिन इस प्रशासनिक कवायद का सबसे मजेदार पहलू यह है कि इन नवनियुक्त प्रभारियों को वार्ड की टूटी सड़कें, बजबजाती नालियाँ और अंधेरे में डूबे चौक-चौराहे तो नजर नहीं आते। हाँ, अलबत्ता अगर किसी गरीब ने अपने आशियाने के बाहर मरम्मत के लिए दो ईंटें भी ज्यादा रख दीं, तो साहबों की सोई हुई ‘अफसरी’ तुरंत जाग जाती है हमारी मर्जी के बिना पत्ता कैसे हिला?”

​स्थानीय लोगों का कहना है कि इनमें से अधिकांश “वार्ड प्रभारी” सिर्फ कागजी शेर और नाम के प्रभारी बनकर रह गए हैं। अब तो खुद निगम के निचले स्तर के कर्मचारी भी चटखारे लेकर मजे ले रहे हैं कि साहब, मोर्चे पर फौज तो पूरी मुस्तैद है, बस काम होना बाकी है।’ ​कागजों पर विकास की रफ्तार इतनी तेज है कि फाइलें पन्ने पलटते ही उड़ने लगती हैं, मगर जमीनी हकीकत यह है कि जनता आज भी हाथ में टॉर्च (या मोबाइल की फ्लैशलाइट) लेकर ढूंढ रही है किसाहब, इस 67 की भारी भीड़ में मेरा वाला नोडल अधिकारी आखिर है कौन सा?”

 

 

 

नकटी बात कहां अटकी!

 

धरसींवा के नकटी गांव में विधायक कॉलोनी बनाने के लिए 66 परिवारों की बेदखली का मामला सरकार और विपक्ष के लिए नाक का सवाल बन गया है। पिछले सप्ताह भर से कलेक्टर, मंत्री और सीएम हाउस के सामने बेदखल हुए परिवार प्रदर्शन कर रहे हैं। इन प्रदर्शनकारियों को कांग्रेस का भी साथ मिल रहा है।

 

पूर्व आवास मंत्री और वर्तमान आवास मंत्री विधायक कॉलोनी बनाने के लिए जमीन अधिग्रहण की प्रक्रिया को लेकर आमने-सामने हैं। अब इस मामले में हाउसिंग बोर्ड की एंट्री हुई है। बोर्ड के अध्यक्ष अनुराग सिंहदेव का कहना है कि नकटी में विधायक कॉलोनी बनाने का ऐसा कोई प्रस्ताव ही नहीं है।

 

विधायकों की कमेटी को पहले ही बता दिया गया है कि हाउसिंग बोर्ड के पास ऐसी कोई जमीन उपलब्ध नहीं है। जब जमीन अभी भी राजस्व विभाग के पास है, तो इस विवाद में हाउसिंग बोर्ड को घसीटा जाना कहां तक सही है? यह पूरा विवाद कोरी अफवाह और झूठी राजनीति से प्रेरित है, जिसका मकसद केवल प्रदेश में अराजकता फैलाना है।

 

फिलहाल नकटी का मामला सुर्खियों में बना हुआ है। अब देखना यह है कि विपक्ष इस मामले में आगे क्या कदम उठाता है। आगामी मानसून सत्र में इस मुद्दे पर हंगामा मचना तय माना जा रहा है। सत्र के दौरान विपक्ष के तीखे सवालों और सरकार के जवाबों से ही यह साफ हो पाएगा कि आखिर ‘नकटी बात कहां अटकी है’। तब तक विस्थापित परिवार को खुले आसमान के नीचे इंतजार करना होगा।

 

 

आईआईएम की क्लास और सीएम हाउस का सिलेबस

 

 

छत्तीसगढ़ सरकार के मंत्री आज आईआईएम की क्लास में सुशासन का पाठ पढ़कर बाहर निकले, जिसके बाद सरकार की ओर से बताया गया कि इसके सकारात्मक परिणाम आने वाले समय में देखने को मिलेंगे। लेकिन, पिछले महीने सीएम हाउस में देर रात तक चली बैठक में मंत्रियों को अपना परफॉर्मेंस सुधारने के लिए दो महीने का सिलेबस पहले ही बता दिया गया था।

 

वैसे भी सरकार निगम-मंडलों और स्थानीय निकायों में एल्डरमैन की नियुक्ति कर चुकी है। अब सरकार के सामने 2028 की चुनौती है। 13 जुलाई से शुरू होने वाले विधानसभा के मानसून सत्र के बाद, संगठन की राय पर कैबिनेट में फेरबदल की तैयारी हो चुकी है।

 

सूत्रों की मानें तो आईआईएम की क्लास में सुशासन का पाठ इसीलिए पढ़ाया जा रहा है क्योंकि सरकार पूरी तरह चुनावी मोड में है। अंदर के सूत्र बता रहे हैं कि इस बार 15 अगस्त को कुछ मंत्रियों को तिरंगा फहराने का मौका नहीं मिलने वाला है।

 

दिल्ली में बीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी का विस्तार होना है। इसमें छत्तीसगढ़ के कुछ बड़े नेताओं को संगठन में शिफ्ट किया जाना है, जिससे कुछ मंत्री भी प्रभावित होंगे। जिन मंत्रियों से उनके जिले में पार्टी संगठन नाराज है, वे अभी से कार्यकर्ताओं को मनाने में लग गए हैं। यही वजह है कि मंत्रियों के बंगले पर आने वाले कार्यकर्ताओं का सम्मान अचानक बढ़ गया है।

 

सोशल मीडिया पर तस्वीरें पोस्ट कर यह संदेश देने की कोशिश की जा रही है कि सत्ता और संगठन में ‘ऑल इज वेल’ है। मगर अंदर की बात यह है कि जिन मंत्रियों को हटाया जाना है, उनकी लिस्ट तैयार है। सीएम हाउस में बिना एजेंडे के अचानक बुलाई गई बैठक में इन मंत्रियों को भी चेता दिया गया है कि ‘दो महीने में सुधर जाएं, नहीं तो…’।

 

 

✍️अनिल द्विवेदी , ईश्वर चंद्रा

 

 

 

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