
रायपुर। Chhattisgarh VIP Plot Allocation रायपुर से लगे ग्राम नकटी में सरकारी जमीन से कब्जाधारियों को बेदखल करने की कार्रवाई और उसी क्षेत्र में सांसदों-विधायकों के लिए भूखंड आवंटन की प्रस्तावित योजना ने बड़ा संवैधानिक सवाल खड़ा कर दिया है। जिस सरकारी जमीन से वर्षों से बसे गरीब और कब्जाधारी परिवारों को हटाया जा रहा है, क्या उसी जमीन को प्रभावशाली वर्ग के लिए सुरक्षित किया जा सकता है? इस सवाल का जवाब हाल ही में सुप्रीम कोर्ट के एक महत्वपूर्ण फैसले में दिखाई देता है।
सुप्रीम कोर्ट ने आंध्र प्रदेश (वर्तमान तेलंगाना) सरकार की उस नीति की सुनवाई के दौरान महत्वपूर्ण संवैधानिक सिद्धांत स्थापित किए, जिसमें वर्ष 2005 से 2008 के बीच सांसदों, विधायकों, आईएएस, आईपीएस अधिकारियों, न्यायाधीशों, पत्रकारों और अन्य विशेष वर्गों को सहकारी समितियों के माध्यम से रियायती दर पर सरकारी जमीन आवंटित की गई थी।
जनहित याचिकाओं में इस नीति को चुनौती देते हुए कहा गया था कि सरकारी जमीन जनता की संपत्ति है, इसे चुनिंदा प्रभावशाली वर्ग को बाजार मूल्य से कम दर पर देना संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है। याचिकाकर्ताओं ने यह भी तर्क दिया कि यदि सरकारी भूमि का आवंटन किया जाना है तो प्रक्रिया पारदर्शी होनी चाहिए और सार्वजनिक हित सर्वोपरि होना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट कहा कि सरकार सार्वजनिक संपत्ति की मालिक नहीं, बल्कि उसकी ट्रस्टी है। इसलिए सरकारी भूमि का वितरण निष्पक्ष, पारदर्शी और गैर-मनमाने तरीके से होना चाहिए। केवल किसी प्रभावशाली वर्ग को लाभ पहुंचाना अपने आप में वैध संवैधानिक आधार नहीं हो सकता।
अब यही सिद्धांत ग्राम नकटी के विवाद पर भी लागू होते दिखाई दे रहे हैं। एक ओर वर्षों से बसे परिवारों को सरकारी जमीन से बेदखल किया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर उसी क्षेत्र में सांसदों और विधायकों के लिए भूखंड आवंटित करने की योजना पर सवाल उठ रहे हैं। यदि ऐसा होता है तो यह स्वाभाविक रूप से इस प्रश्न को जन्म देता है कि क्या सार्वजनिक संपत्ति का उपयोग वास्तव में जनहित के लिए हो रहा है, या फिर विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग को लाभ पहुंचाने के लिए?
सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय में यह भी कहा कि समानता का अर्थ सभी के साथ एक जैसा व्यवहार करना नहीं है, लेकिन किसी भी वर्गीकरण का सीधा संबंध सार्वजनिक उद्देश्य से होना चाहिए। यदि किसी विशेष वर्ग को बिना पर्याप्त और तर्कसंगत आधार के लाभ दिया जाता है, तो ऐसी नीति न्यायिक समीक्षा के दायरे में आएगी।
कानूनी जानकारों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला केवल तेलंगाना तक सीमित नहीं है। देश के किसी भी राज्य में यदि सरकारी जमीन को विशेष वर्ग के लिए रियायती दर पर आवंटित किया जाता है, तो उसकी वैधता इसी संवैधानिक कसौटी पर परखी जा सकती है।
ऐसे में रायपुर के ग्राम नकटी का मामला अब केवल बेदखली या भूखंड आवंटन का नहीं रह गया है। यह उस मूल प्रश्न का विषय बन गया है कि सरकारी जमीन पर पहला अधिकार किसका है, भूमिहीन और जरूरतमंद नागरिकों का या सत्ता और प्रभाव वाले वर्ग का? सुप्रीम कोर्ट का संदेश स्पष्ट है कि जनता की संपत्ति का उपयोग जनता के हित में होना चाहिए, न कि किसी विशेष वर्ग को विशेष लाभ पहुंचाने के लिए।






