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कोरबा : अद्भुत है सरकारी ‘फाइलोद्यान मिशन’, जहां फाइलों में लहलहाते हैं बाग और जमीन पर उगती है खामोशी…

Korba News Power Zone एक पुरानी कहावत है, “बोया पेड़ बबूल का तो आम कहां से होय…” लेकिन हमारे सरकारी तंत्र ने इस कहावत को भी आधुनिक बना दिया है। अब न बबूल बोने की जरूरत है, न आम उगाने की। बस फाइलों में योजना का बीज बोइए, नोटशीटों से उसकी सिंचाई कीजिए, कैमरों के सामने पौधारोपण का फोटो खिंचवाइए, बजट की खाद डालिए और फिर देखिए… कागजों पर रातोंरात हरे-भरे बाग तैयार हो जाते हैं। ऐसे बाग, जिनमें फल केवल सरकारी रिपोर्टों में लगते हैं।

कोरबा जिले के पाताढ़ी और कटघोरा के डिंडोलभांठा इसका ताजा उदाहरण हैं। दावा किया गया कि यहां ढाई लाख आम के पौधे लगाए गए। इस महत्वाकांक्षी योजना पर डेढ़ करोड़ रुपये खर्च होने का रिकॉर्ड भी मौजूद है। विभागीय दस्तावेजों में ऐसा चित्र खींचा गया, मानो पूरा इलाका आम की अमराइयों से भर गया हो। लेकिन जब हकीकत की जमीन पर कदम पड़ते हैं तो तस्वीर बिल्कुल उलट दिखाई देती है। वहां आम का एक भी पेड़ तलाशना उतना ही कठिन है, जितना किसी सरकारी दफ्तर में बिना सिफारिश या ‘सुविधा शुल्क’ के अपनी फाइल ढूंढना।

लगता है इन सरकारी पौधों की उम्र कैमरे की फ्लैश तक ही सीमित होती है। फोटो खिंचा, प्रेस विज्ञप्ति जारी हुई, तालियां बजीं और उसके बाद पौधे भी गायब, जिम्मेदार भी गायब। फर्क सिर्फ इतना है कि जमीन से पेड़ लापता हैं, लेकिन सरकारी फाइलों में वे आज भी हरे-भरे खड़े हैं और विभागीय उपलब्धियों का सीना चौड़ा कर रहे हैं।

असल सवाल यह नहीं कि ढाई लाख पौधे सूख कैसे गए। बड़ा सवाल यह है कि डेढ़ करोड़ रुपये आखिर कहां चले गए? यदि पौधे नहीं बचे, बाग नहीं बचा, हरियाली नहीं बची, तो फिर बजट किसकी जमीन को उपजाऊ बना गया? क्या इस पूरी कवायद का उद्देश्य पर्यावरण संरक्षण था या फिर बजट की फसल काटना?

ऐसे में इस योजना का नाम बदलकर “राष्ट्रीय फाइलोद्यान मिशन” रख देना चाहिए। यह शायद दुनिया की पहली ऐसी योजना होगी, जिसमें पेड़ मिट्टी में नहीं, फाइलों में उगते हैं। आम जनता को आम नसीब हो या न हो, लेकिन विभाग को हर साल उपलब्धियों की मीठी फसल जरूर मिल जाती है।

विडंबना देखिए… किसान आज भी उस बाग की तलाश में है, जिसे सरकारी रिपोर्टें वर्षों से “सफल” और “सदाबहार” बताती आ रही हैं। शायद यही हमारे प्रशासन की नई कृषि तकनीक है, जहां पेड़ धरती पर नहीं, प्रतिवेदनों में फलते हैं और बजट की हरियाली कभी नहीं सूखती।

इस पूरे प्रकरण की सबसे बड़ी उपलब्धि यही है कि पौधे तो समय से पहले दम तोड़ गए, लेकिन दावे आज भी पूरी शान से जीवित हैं। कागजों में बाग अब भी लहलहा रहे हैं, आंकड़ों में हरियाली अब भी चमक रही है और जवाबदेही… वह आज भी किसी सूखे पौधे की तरह कहीं गुम है।

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