प्रेम कहानी बन गई खाकी की ड्यूटी
Good Governance “लागी छूटे न अब तो सनम…” फिल्म काली टोपी लाल रुमाल का लता मंगेशकर द्वारा गाया यह गीत यूं तो इश्क की मजबूरी बयां करता है, लेकिन जिले की खाकी में इन दिनों यह “पोस्टिंग प्रेम” का एंथम बन चुका है।
कहते हैं मोह बड़ी चीज होती है और जब यह मोह थाने-चौकी से हो जाए, तो ट्रांसफर ऑर्डर भी हाथ जोड़कर खड़ा नजर आता है। करीब महीने भर पहले बड़े साहब ने 153 जवानों की तबादला सूची जारी कर सिस्टम में ‘कसावट’ लाने की कोशिश की थी। कागजों में तो कसावट ऐसी आई कि फाइलें भी सीधी होकर चलने लगीं, लेकिन जमीन पर खाकी ने ‘योगा’ करते हुए ऐसा लचीलापन दिखाया कि आदेश खुद ही स्ट्रेच होकर ढीला पड़ गया।
हालत कुछ यूं है कि रिकॉर्ड में जवान थाने में तैनात है, लेकिन हाजिरी चौकी में बजा रहा है। जिनका ट्रांसफर चौकी में हुआ, वे थाने की कुर्सी छोड़ने को तैयार नहीं। यानी पोस्टिंग का गणित ऐसा उलझा है कि खुद विभाग भी अब कैलकुलेटर ढूंढ रहा होगा। अंदरखाने चर्चा है कि कुछ खाकीधारी नए ठिकानों पर सिर्फ “औपचारिक आमद” देकर पुराने ठिकानों पर ही सेवा दे रहे हैं मानो नई पोस्टिंग सिर्फ एक “टूरिस्ट स्पॉट” हो, जहां जाकर फोटो खिंचवाई और लौट आए। महकमे में अब यह हाल है कि आदेश से ज्यादा “एडजस्टमेंट” का बोलबाला है। साथी जवान भी तंज कसते हुए वही धुन छेड़ देते हैं“लागी छूटे न अब तो सनम…”अब सवाल यह नहीं कि आदेश जारी हुआ या नहीं, सवाल यह है कि क्या आदेश जमीन पर उतरने की हिम्मत जुटा पाएगा, या फिर खाकी का यह “अटूट प्रेम” हर आदेश को यूं ही मात देता रहेगा।
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बंगले में कृपा राज, नियमों का वनवास
“जिसके हाथ में होगी लाठी, भैंस वही ले जाएगा..” ये लाइन दिलीप कुमार की फिल्म गोपी के गीत से निकलकर जैसे सीधे नगर निगम के गलियारों में आ बसी है। फर्क बस इतना है कि यहां लाठी की जगह ‘साहब की कृपा’ है, और भैंस की जगह सरकारी बंगले।
कहते हैं, ऊपर वाला मेहरबान हो तो गधा भी पहलवान बन जाता है। एक तरफ वो कर्मचारी हैं जो सालों की सेवा के बाद भी फाइलों में मकान ढूंढते रह जाते हैं, और दूसरी तरफ संविदा वाले ऐसे इठला रहे हैं जैसे सरकारी बंगले उनकी पैतृक संपत्ति हों। हालात ऐसे हैं कि नियम-कायदों की किताब जैसे सिर्फ दिखावे के लिए रह गई हो। चर्चा तो यहां तक है कि एक बड़े अधिकारी के ड्राइवर ने भी नियमों की सीमाएं लांघते हुए अफसर श्रेणी के क्वार्टर पर कब्जा जमा लिया है। यह सब कुछ खुलेआम हो रहा है और जिम्मेदार चुप्पी साधे बैठे हैं।
नगर निगम में चल रही इस ‘उल्टी गंगा’ को लेकर अब आम लोग भी तंज कसने लगे हैं। उनका कहना है कि जब साहब की कृपा हो, तो ड्राइवर भी ‘पहलवान’ बन जाता है और नियम सिर्फ कागजों तक सीमित रह जाते हैं। सवाल यह है कि आखिर नियमों का पालन होगा या फिर रसूख के आगे असली सुखदारों का सुख कुछ यूं ही लुटता रहेगा?
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IPL के शोर में सट्टे का ‘’साइलेंट सिक्स’’, पुलिस क्लीन बोल्ड
दाग छोटा हो या बड़ा, दामन पर लगे तो दिखता जरूर है। इन दिनों IPL के चौकों-छक्कों के शोर के बीच सट्टे का कारोबार भी उतनी ही तेजी से फल-फूल रहा है और इसके साथ ही पुलिस की साख पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
शहर में जिस नाम को “IPL सट्टा किंग” कहा जाता है, उसने खेल का तरीका बदल दिया है। अब वह सीधे मैदान में नहीं, बल्कि “आउटसोर्सिंग मॉडल” पर काम कर रहा है। धंधा कोरबा का, लेकिन कंट्रोल किसी दूसरे शहर से। हर मैच में करोड़ों का दांव और लोकेशन ऐसी कि पुलिस की पकड़ से बाहर। तलाश जारी है, लेकिन असली खिलाड़ी अब भी पहचान से दूर है।
पुलिस ने हाल ही में एक छोटे सटोरिये को पकड़कर अपनी फाइल में ‘’विकेट’’जरूर जोड़ ली। लेकिन यह वैसा ही है जैसे पूरी टीम ढेर हो और स्कोरबोर्ड पर सिर्फ 12वें खिलाड़ी का नाम चमकाया जाए। शहर जानता है कि असली मैच अभी जारी है और बड़े बल्लेबाज़ अब भी नॉट आउट हैं। सबसे बड़ा सवाल टेक्नोलॉजी को लेकर है। आज के दौर में मोबाइल लोकेशन, डिजिटल पेमेंट और कॉल रिकॉर्ड जैसे कई टूल्स मौजूद हैं, जिनसे बड़े से बड़ा नेटवर्क ट्रैक किया जा सकता है। फिर भी सट्टा सिंडिकेट का “मिसिंग मोड” में चलना कई तरह की शंकाएं पैदा करता है।
यह मामला अब सिर्फ अवैध सट्टे का नहीं, बल्कि भरोसे का बन गया है। पुलिस के सामने चुनौती साफ है, क्या वह इस खेल के असली खिलाड़ियों तक पहुंचेगी या फिर छोटे मोहरों पर कार्रवाई कर ही संतोष कर लेगी। इससे चर्चा तो यही है कि यहां विश्वास आउट हो रहा है और वह भी बिना थर्ड अंपायर के।
निजी स्कूलों की A B C D..!
A B C D बोलोगे तो बनोगे नवाब… सरगुजिहा बोलोगे तो होगे खराब..! छत्तीसगढ़ में कुकुरमुत्तों की तरह चल रहे अंग्रेजी माध्यम स्कूलों का हाल ऐसा ही है, जहाँ अंग्रेजी माध्यम में पढ़ाई का झांसा देकर बच्चों के पैरेंट्स की जेब काटी जा रही है।
अंबिकापुर के चोपड़ापारा में बिना मान्यता चल रहे स्वरंग किड्स एकेडमी ने एक बच्चे को सिर्फ इसलिए एडमिशन देने से मना कर दिया कि बच्चा सरगुजिहा बोलता था। इससे बाकी बच्चे भी सरगुजिहा बोलना सीख जाएंगे। इससे किड्स एकेडमी का स्टेटस खराब होगा और पैरेंट्स अपने बच्चों को यहाँ नहीं भेजेंगे।
मगर, किड्स एकेडमी जैसे बिना मान्यता के ऐसे कितने ही प्ले-स्कूल छत्तीसगढ़ के गली-कूचों में चल रहे हैं। हैरानी वाली बात यह है कि यह घटना उस शहर की है जो संभागीय मुख्यालय है और वहाँ शिक्षा विभाग के डायरेक्टर स्तर के अफसर बैठते हैं। मामला जब तूल पकड़ा तो विभाग ने इस किड्स एकेडमी पर जुर्माना लगाया और मान्यता रद्द करने का नोटिस जारी कर दिया।
मगर, विभाग के अफसर यह पता नहीं कर पाए कि बिना मान्यता स्कूल चल कैसे रहा था। किड्स एकेडमी जैसे संवेदनशील संस्थान चलाने के लिए निर्धारित योग्यता वाला स्कूल स्टाफ वहाँ था या नहीं। केवल एक बिल्डिंग, बच्चों को ढोने की गाड़ी, कुछ खिलौने और देखरेख के लिए आया रख देने का नाम किड्स एकेडमी तो नहीं हो सकता।
असल बात तो यह है कि शिक्षा विभाग के घाघ अफसर निजी स्कूलों की A B C D अच्छे तरीके से समझते हैं। बिना मान्यता स्कूल चलना तभी संभव हो सकता है जब विभाग के अफसर बैकडोर से इसके लिए राजी हों। विभाग के लिए निजी स्कूल मतलब दूधारू गाय। जब हल्ला मचे तो नोटिस थमा दो, मामला शांत हो जाए तो… गाय दुह लो।
अंबिकापुर में भी कुछ ऐसा ही हुआ। अब पैरेंट्स के सोचने की बारी है कि अपने बच्चों को वे जिस संस्थान में भेज रहे हैं, उसकी मान्यता है भी या नहीं। कहीं वह भी शिक्षा विभाग की A B C D से तो नहीं चल रहा है।
आसन पर सुशासन
आने वाला मई का महीना प्रदेश की ब्यूरोक्रेसी का तापमान बढ़ाने वाला है। 1 मई से 10 जून तक सीएम के सुशासन तिहार में अफसरों की परख होगी। ई-ऑफिस जो कुछ दिखा रहा है, वह जमीन पर कितना उतरा है—यह देखा जाएगा। पिछले सुशासन तिहार में मिले कितने मामले सुलझे और कितने लंबित हैं, इसका पूरा बही-खाता तैयार होगा।
गांवों में लगने वाली सीएम की चौपाल में इसका फीडबैक मिलेगा। लोक सेवा गारंटी का क्या हुआ? ‘कटाक्ष’ के पिछले अंक में न्यूज पावर जोन ने पहले ही बता दिया था कि लोक सेवा यानी अफसरी की गारंटी।
इस बार सरकार हाईटेक तरीके से सुशासन तिहार की मॉनिटरिंग करेगी। ग्रामीण क्षेत्रों में 15 से 20 ग्राम पंचायतों के समूह तथा शहरी क्षेत्रों में वार्ड क्लस्टर के आधार पर शिविर आयोजित होंगे, जिनमें लोक सेवा गारंटी के तहत मिलने वाले आवेदनों को क्यों लटकाया गया, इसका जवाब भी मांगा जाएगा।
इस बार मंत्री, सांसद एवं विधायक, मुख्य सचिव और प्रभारी सचिव समय-समय पर शिविरों में शामिल होकर आमजन से संवाद करेंगे और योजनाओं का फीडबैक लेंगे। सुशासन तिहार में कहीं ‘शीर्षासन’ न लगाना पड़े, इसके लिए अफसर अभी से अपने एसी लगे कमरों का आसन छोड़कर फील्ड विजिट में आसन जमाना शुरु कर चुके हैं। वैसे भी सरकार चुनावी मोड पर है, और बाकी के दिनों में अगर अफसरी की गारंटी चाहिए, तो सुशासन ही दिखाना होगा।
✍️अनिल द्विवेदी , ईश्वर चंद्रा