
✍️सतीश अग्रवाल
बिलासपुर। Mahua Trees Crisis in Chhattisgarh: Mahua को वनों का कल्पवृक्ष माना जाता है, लेकिन छत्तीसगढ़ के जंगलों में अब इसके भविष्य को लेकर चिंता बढ़ने लगी है। अर्धप्राकृतिक मिश्रित वनों में मौजूद महुआ के अधिकांश वृक्ष 50 से 100 वर्ष की उम्र पार कर चुके हैं। उम्रदराज होते इन वृक्षों की उत्पादन क्षमता लगातार घट रही है, जिसे लेकर वानिकी वैज्ञानिक चिंतित हैं।

Mahua Trees Crisis in Chhattisgarh विशेषज्ञों का मानना है कि प्राकृतिक वन संरचना में आ रहे बदलाव के कारण महुआ के वृक्षों की स्थिति गंभीर होती जा रही है। इसका असर केवल जंगलों तक सीमित नहीं है बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था और आदिवासी आजीविका पर भी पड़ सकता है, क्योंकि महुआ फूल और उससे बनने वाले उत्पाद ग्रामीण जीवन का अहम हिस्सा हैं।
संकट में वनों का कल्पवृक्ष
जलवायु परिवर्तन अब महुआ के वृक्षों पर साफ असर दिखा रहा है। असमय वर्षा, तापमान में असामान्य बढ़ोतरी, सर्दियों की अवधि का कम होना और असंतुलित बारिश जैसी परिस्थितियां महुआ की उत्पादन क्षमता को प्रभावित कर रही हैं।
इसके साथ ही फफूंदजनित रोग, जड़ों का सड़न और पत्तियों में धब्बा रोग जैसी समस्याएं भी तेजी से सामने आ रही हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार यह स्थिति हर साल फैलती जा रही है, जो भविष्य के लिए चिंताजनक संकेत है।
बढ़ रही उम्र, घट रहा उत्पादन
छत्तीसगढ़ के अर्धमिश्रित वनों में मौजूद अधिकांश महुआ वृक्षों की उम्र 50 से 100 वर्ष के करीब पहुंच चुकी है। ऐसे में प्रति वृक्ष उत्पादन क्षमता घटकर लगभग 60 से 70 किलोग्राम रह गई है, जबकि सामान्य उत्पादक क्षमता 80 से 100 किलोग्राम मानी जाती है।
इसका सीधा असर प्रदेश के कुल उत्पादन पर पड़ रहा है। पिछले वर्ष प्रदेश में करीब 40 हजार टन महुआ फूलों का संग्रहण हुआ था, लेकिन इस वर्ष इसमें लगभग 25 प्रतिशत तक गिरावट की आशंका जताई जा रही है।
कमजोर उत्पादन के अन्य कारण
प्राकृतिक पुनर्जनन और नए पौधरोपण के प्रति उत्साह की कमी भी एक बड़ी समस्या बन गई है। मानव आबादी का विस्तार, पशुओं की चराई, जंगलों में आग और वनों की कटाई जैसे कारण महुआ वृक्षों की संख्या को प्रभावित कर रहे हैं।
इसके अलावा खनन गतिविधियां, कृषि क्षेत्र का विस्तार, मिट्टी की घटती उर्वरता और नमी की कमी भी उत्पादन में गिरावट के प्रमुख कारण बन रहे हैं। इसका असर जंगलों की जैव विविधता पर भी पड़ रहा है।
मांग रहा वैज्ञानिक प्रबंधन
विशेषज्ञों का कहना है कि महुआ को अब भी केवल जंगली वृक्ष की तरह देखा जाता है, जबकि यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जुड़ा एक महत्वपूर्ण आर्थिक वृक्ष है। बदलते समय में महुआ के संरक्षण के लिए उन्नत प्रजातियों का विकास, वैज्ञानिक तरीके से छंटाई और बेहतर पोषण प्रबंधन की जरूरत महसूस की जा रही है।
“महुआ के वृक्षों की बढ़ती उम्र और बदलती जलवायु परिस्थितियां उत्पादन में गिरावट का मुख्य कारण बन रही हैं। अब आवश्यकता है कि महुआ को केवल जंगली वृक्ष न मानकर एक महत्वपूर्ण आर्थिक प्रजाति के रूप में देखा जाए। इसके लिए नए पौधरोपण, वैज्ञानिक प्रबंधन, संरक्षण और उन्नत किस्मों के विकास पर विशेष ध्यान देना होगा।”
— Ajit Williams, साइंटिस्ट (फॉरेस्ट्री), बीटीसी कॉलेज ऑफ एग्रीकल्चर एंड रिसर्च स्टेशन, बिलासपुर



