
असमंजस में थानेदार… किससे प्यार, किससे इकरार!
मोहब्बत भी बड़ी अजीब चीज होती है। मासूका अगर दो हों तो आशिक अक्सर असमंजस में पड़ जाता है कि आखिर किससे प्यार करे और किससे इकरार। ऐसा ही हाल इन दिनों जिले के थानेदारों का भी है। फर्क बस इतना है कि यहां दिल नहीं, पदनाम की पट्टिका दांव पर है और माशूका की जगह दो-दो एएसपी साहब खड़े हैं।
मजाकिया अंदाज़ में थानेदारों के बीच खुसर-फुसर चल रही है। कोई कह रहा है कि वरिष्ठ अधिकारियों की तख्ती में पहले लखन साहब का नाम लिखा जाना चाहिए, तो कोई सलाह दे रहा है कि कटघोरा सर्किल में पहले नीतीश साहब का नाम होना चाहिए। रैंक दोनों का एक, पद भी एक। ऐसे में थानेदारों की हालत वैसी हो गई है जैसे शादी में डीजे वाला पूछे कि, पहले दूल्हे का गाना बजाऊं या दुल्हन का।
अब थानेदारों के सामने सवाल खड़ा हो गया है कि सम्मान की इस औपचारिकता में प्राथमिकता किसे दी जाए। यही छोटी सी बात अब महकमे में चर्चा का विषय बन गई है।कबीर ने अपने प्रसिद्ध दोहे में कहा था, “गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूं पाय…” और समाधान भी बता दिया था कि गुरु ही मार्ग दिखाते हैं। मगर यहां थानेदारों के सामने कोई कबीर नहीं खड़ा जो यह बता दे कि पट्टिका में पहले किसका नाम लिखा जाए।
थानेदारों की हालत ऐसी हो गई है कि अगर कोई पूछ ले कि पट्टिका में पहले नाम किसका है, तो जवाब देने से पहले माथा खुजलाना पड़ रहा है।
थानों में टंगी इस छोटी सी पदनाम पट्टिका को लेकर चल रही खींचतान पर अब शहर में भी चुटकी ली जा रही है। लोग मुस्कुराते हुए कहते हैं, “असमंजस में थानेदार… किससे प्यार, किससे इकरार!”
प्रभारी अधिकारी बनाओ, मनचाहा मुनाफा कमाओ
नगर निगम का गलियारा इन दिनों सरकारी दफ्तर कम और किसी मार्केटिंग कंपनी का शो-रूम ज्यादा नजर आने लगा है। अंतर बस इतना है कि यहां साबुन-तेल या मोबाइल नहीं बिक रहे, बल्कि कुर्सियों का “स्पेशल ऑफर” चल रहा है और ऑफर भी ऐसा कि बड़े-बड़े मार्केटिंग गुरु भी माथा पकड़ लें। नारा साफ है….“प्रभारी अधिकारी बनाओ, मनचाहा मुनाफा कमाओ।”
बाजार में सामान बेचने के लिए कंपनियां तरह-तरह के विज्ञापन चलाती हैं। कहीं लिखा होता है “कम गले, ज्यादा चले”, तो कहीं “एक के साथ एक फ्री”। निगम के गलियारे में भी कुछ ऐसा ही ऑफर चल पड़ा है। फर्क बस इतना है कि पहले काम की वजह से चर्चा होती थी, अब कुर्सियों की अदला-बदली से। जिसे जहां फिट कर दो, वही उस विभाग का प्रभारी बन बैठता है।
कोरबा प्रशासन वैसे भी चर्चा में रहने का पुराना शौकीन रहा है। लेकिन अब हालात कुछ अलग हैं। जिले के कई अधिकारी इन दिनों “उधारी की कुर्सियों” पर फल-फूल रहे हैं। ऊपर से आशीर्वाद मिले तो नियम-कायदे अपने आप हल्के हो जाते हैं। नतीजा यह कि व्यवस्था सुधरने के बजाय और उलझती जा रही है।
कुछ बोलबच्चन टाइप अधिकारी तो पहले भी अपनी काबिलियत का नमूना दिखा चुके हैं। मूल विभाग की जिम्मेदारी छोड़कर ट्राइबल अटैचमेंट का रास्ता पकड़ लिया, क्योंकि वहां काम कम और संभावनाएं ज्यादा दिखाई देती थीं। शुक्र मनाइए उस शख्स का जिसने समय रहते उन्हें वापस मूल विभाग की राह दिखा दी, नहीं तो डीएमएफ की कहानी शायद अभी और कई एपिसोड दिखाती।
इधर छात्रावास अधीक्षक साहब ने भी नियमों को किनारे रखकर संपत्तिकर अधिकारी की कुर्सी संभाल ली। लेकिन अब हवा का रुख थोड़ा बदलता दिख रहा है, इसलिए अटैचमेंट खत्म होने का डर उन्हें भी सता रहा है। आखिर उधार की कुर्सी कब वापस मांग ली जाए, इसका भरोसा किसे है। शहर के लोग भी सब समझ रहे हैं। गलियारों में एक ही तंज तैर रहा है “घोड़े को घास नहीं मिली और… कुछ लोग च्यवनप्राश चट कर रहे हैं।”
कलेक्टर का सहज अंदाज
कोरबा में जब भी लेमरू, नकिया और श्यांग जैसे दूरदराज के गांवों का नाम आता है, तब लोगों के जेहन में दो ही खबरें होती थीं ,जंगली हाथियों का उत्पात या फिर इलाज के लिए तरस रहे ग्रामीण। मगर इस बार हालात बदले हुए हैं। गांव वालों ने यह सुनकर हैरानी जताई कि सरकारी अमले के साथ पहुंचा एक शख्स बड़ी सहजता से कह रहा है “मैं कलेक्टर हूं, आपकी समस्या सुनने आया हूं।”
पहले जब सरकारी अमला गांव में पहुंचता था, तो वह कुछ सुनने नहीं, बल्कि सुनाने पहुंचता था। इस बदलाव की शुरुआत कलेक्टर कुणाल दुदावत ने की। सहज भाव से आम पेड़ के नीचे लगी चौपाल में गांव वालों ने राशन, सड़क, बिजली, स्कूल, आंगनबाड़ी, बाजार शेड और आवास जैसी जरूरी योजनाओं का फीडबैक कलेक्टर को दिया।
सड़क से लेकर स्वास्थ्य, पानी से लेकर बिजली और शिक्षा से लेकर किसानी तक की जमीनी हकीकत से कलेक्टर रूबरू हुए। इस चौपाल में एक बात और बदली-बदली सी नजर आई। इस बार ग्रामीण बोल रहे थे, कलेक्टर सुन रहे थे और उनके साथ आया सरकारी अमला चुप था।
धान के कटोरे में अफीम की खेती!
दुर्ग के समोदा गांव में अफीम की फसल उगाने की खबर चौंकाने वाली है। इससे भी ज्यादा चौंकाने वाली बात विनायक ताम्रकार की गिरफ्तारी है, जो सत्तारूढ़ पार्टी का पदाधिकारी था। अब इस मामले में कांग्रेस और बीजेपी के बीच जुबानी जंग हो रही है। कांग्रेस का कहना है कि बिना संरक्षण के ऐसा नहीं हो सकता, जबकि बीजेपी चार साल पहले से अफीम की खेती होने की बात कह रही है।
बात टाइमिंग की नहीं है कि अफीम की खेती कब शुरू हुई। असल सवाल यह है कि धान के कटोरे में अफीम की खेती क्यों, कैसे और किन हालातों में शुरू हुई। बड़े शहरों में ड्रग्स पैडलर पकड़े जा रहे हैं। ओडिशा की ओर से आने वाली गांजे की खेप भी पहुंच रही है। और तो और, नशा तस्करों का जाल पंजाब से आगे निकलकर सीमा पार पाकिस्तान तक पहुंच गया है।
ड्रग्स तस्करी के मामलों में ज्यादातर आरोपी बाहरी प्रदेशों से यहां आकर लोकल नेटवर्क के जरिए युवाओं तक नशा फैला रहे हैं। जरूरत इस बात की है कि सरकारी खुफिया तंत्र के साथ एंटी नारकोटिक्स विंग बाहर के प्रदेशों से छत्तीसगढ़ आकर रहने वाले संदिग्धों पर कड़ी नजर रखे, नहीं तो धान का कटोरा “उड़ता छत्तीसगढ़” बन जाएगा।
कांग्रेस का शोले पार्ट-2
कांग्रेस आलाकमान ने पार्टी के प्रदेश के तमाम बड़े नेताओं को दरकिनार कर राज्यसभा चुनाव में पार्टी की महिला नेत्री फूलो देवी नेताम को दोबारा उम्मीदवार बना दिया। फूलो देवी नेताम का नाम सीधे सोनिया गांधी की ओर से सुझाया गया था। इसका मतलब बिल्कुल साफ है कि इस बार छत्तीसगढ़ के बारे में न तो राहुल गांधी ने कोई फैसला लिया और न ही प्रियंका गांधी ने। खरगे साहब भी इस मामले में चुप ही रहे।
लेकिन छत्तीसगढ़ के पूर्व डिप्टी सीएम टीएस सिंहदेव का “जय-वीरू की जोड़ी हुई पुरानी, अब नई फिल्म आएगी…” वाला बयान कांग्रेस में शोले पार्ट-2 की ओर इशारा करने के लिए काफी था। सिंहदेव की शैली में कहें तो शोले फिल्म में अमिताभ बच्चन, धर्मेंद्र, हेमा मालिनी के अलावा और भी कई कलाकार थे, लेकिन लोगों को एक जैसा दृश्य पसंद नहीं आता, क्योंकि जय-वीरू, जय-वीरू सुन-सुन कर लोग बोर हो जाएंगे। मगर कांग्रेस में अब इस बात की चर्चा हो रही है कि कांग्रेस के शोले पार्ट-2 में गब्बर सिंह का किरदार कौन है।
✍️अनिल द्विवेदी, ईश्वर चंद्रा



