CSR Controversy : विधानसभा में मंत्री बनाम कलेक्टर पर घमासान…! मंत्री के अधिकारों पर उठे सवाल…भूपेश बघेल के सवाल पर सदन में तीखी नोकझोंक

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CSR Controversy

रायपुर, 25 फरवरी। CSR Controversy : छत्तीसगढ़ विधानसभा में आज प्रश्नकाल के दौरान मंत्री और कलेक्टर के अधिकारों को लेकर जोरदार बहस छिड़ गई। कांग्रेस विधायक व्यास कश्यप द्वारा CSR (कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी) मद से होने वाले कार्यों में कथित अनियमितता और जनप्रतिनिधियों की उपेक्षा का मुद्दा उठाए जाने के बाद सदन का माहौल अचानक गरमा गया।

क्या है पूरा मामला?

प्रश्नकाल में चौथे नंबर के सवाल पर चर्चा के दौरान व्यास कश्यप ने आरोप लगाया कि औद्योगिक इकाइयों की निर्धारित सीमा से बाहर भी CSR मद की राशि के ब्याज से विकास कार्य कराए गए। उन्होंने कहा कि सांसद की अनुशंसा पर औद्योगिक क्षेत्र से बाहर के गांवों में काम हुए, जबकि समिति की भूमिका को नजरअंदाज किया गया।

कश्यप ने विशेष रूप से अटल बिहारी वाजपेयी ताप विद्युत संयंत्र से प्रभावित गांवों का उल्लेख करते हुए पूछा कि क्या उनकी अनुशंसा पर कार्य होगा और मंत्री सदन में इसकी घोषणा करें।

मंत्री का जवाब और बढ़ा विवाद

उद्योग मंत्री लखनलाल देवांगन ने जवाब देते हुए कहा कि उन्हें घोषणा करने का अधिकार नहीं है और विधायक कलेक्टर के साथ बैठकर विचार-विमर्श कर काम आगे बढ़ा सकते हैं। मंत्री के इस बयान पर विपक्ष ने कड़ी आपत्ति जताई।

भूपेश बघेल की तीखी प्रतिक्रिया

पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने खड़े होकर कहा कि यदि मंत्री कलेक्टर को निर्देशित नहीं कर सकते और सभी काम कलेक्टर को ही करना है, तो फिर मंत्री पद का औचित्य क्या है।

उन्होंने कहा कि मंत्री द्वारा की गई घोषणा का पालन करना कलेक्टर की बाध्यता है और यदि ऐसा नहीं होता, तो इसका अर्थ है कि मंत्री का प्रशासन पर नियंत्रण नहीं है।

सत्ता पक्ष का स्पष्टीकरण

इस पर मंत्री देवांगन ने स्पष्ट किया कि उन्होंने केवल घोषणा संबंधी अधिकारों की बात कही थी और प्रक्रियात्मक सीमाओं के तहत जवाब दिया था। हालांकि विपक्ष इस स्पष्टीकरण से संतुष्ट नजर नहीं आया।

व्यापक बहस का विषय

सदन में हुई यह बहस केवल CSR मद के उपयोग तक सीमित नहीं रही, बल्कि प्रशासनिक अधिकारों, जनप्रतिनिधियों की भूमिका और मंत्री-कलेक्टर संबंधों पर व्यापक चर्चा का कारण बन गई।

जहां विपक्ष ने इसे मंत्री के सीमित अधिकारों का मुद्दा बताया, वहीं सत्ता पक्ष ने इसे प्रक्रियात्मक स्पष्टता का विषय बताया। बहस के दौरान सदन का माहौल काफी देर तक गरमाया रहा।

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