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Mahadev’s grace: चाय से ज्यादा केतली गरम,आरक्षक रच रहे भरम..! चिकन लेग के सामने घुटने दिए टेक और…खेत खाए गधा और ..किसिम किसिम के मुसवा

चाय से ज्यादा केतली गरम, आरक्षक रच रहे भरम

कहते हैं, “जब चाय से ज़्यादा केतली गरम” हो जाए, तो समझ लीजिए स्वाद नहीं, साज़िश पक रही है। जिले की एक पुलिस चौकी में इन दिनों यही विशेष “फ्लेवर” परोसा जा रहा है। प्रभारी बदले नहीं कि दो आरआर ऐसे उबल पड़े, मानो केतली को ही चूल्हे का मालिक बना दिया गया हो। चौकी के आरआर वाले दो आरक्षक, जो अपने स्वजातीय प्रभारी के साथ नए रोल में खेल रहे हैं, मानो अचानक ही जरूरत से ज्यादा सक्रिय हो गए हों।
बताया जा रहा है कि कबाड़ कारोबारियों पर रौब ऐसे झाड़ा जा रहा है, जैसे वर्दी नहीं, मौसम विभाग की चेतावनी हो “आज दबाव अधिक रहेगा।”…चौकी की चर्चित “लाल डायरी” पहले से ही इनके पास सुरक्षित थी, अब प्रभारी भी अपने ही समाज से मिल गया, तो अधिकार और प्रभाव दोनों जैसे सिर चढ़कर बोलने लगा है।
कहा तो यह भी जा रहा कि चौकी में पुलिसिंग कम और डिमांड ज्यादा वाली पुलिसिंग चल रही है। हालात ऐसे बनते जा रहे हैं कि आमजन खुद कहने लगे है कि साहेब यहां तो “चाय से ज्यादा केतली गरम” है।

सूत्रधार की मानें तो आरक्षकों के सख्त तेवर वही तक सीमित रहता है, जहां तक सिक्कों की खनक सुनाई नहीं देती। जैसे ही लेनदेन की बात आती है, वही डंडा खुद-ब-खुद नरम पड़ जाता है। लाल डायरी की सेहत दिन दूनी, रात चौगुनी बढ़ रही है, और चौकी का “नज़राना ग्राफ” शेयर बाज़ार को टक्कर दे रहा है।
शहर के हृदय स्थल में स्थित इस चौकी क्षेत्र में हालात ऐसे बन रहे हैं कि जनमानस को महसूस होने लगा है कि चौकी प्रभारी से ज्यादा दबदबा उनके अधीनस्थ आरक्षकों का है। इस दुष्प्रभाव से साहेब की छवि अनचाहे धुंधलाती जा रही है।

कबाड़ के गढ़ में जिस तरह की पुलिसिंग हो रही है, उसने क्षेत्र के लोगों के मन में खाकी को लेकर असंतोष और आक्रोश दोनों पैदा कर दिए हैं। अगर हालात ऐसे ही रहे, तो भरोसे की जगह सवाल और गहरे होते जाएंगे। फिलहाल ठंडी में चाय ठंडी, केतली उबाल पर के मजे लेते रहिए।

 

चिकन लेग के सामने घुटने दिए टेक और विकास का हुआ कत्ल

 

कहते हैं सत्ता की भूख खतरनाक होती है, लेकिन अफसरशाही की भूख उससे भी ज़्यादा घातक होती है, खासतौर पर जब प्लेट में चिकन लेग हो तो घुटने टेक दिए जाते हैं।
शहर विकास की योजनाएं फाइलों में दम तोड़ती रहीं और अफसरों का मन एक चर्चित होटल के चिकन पर डोलता रहा। नतीजा यह हुआ कि रिसॉर्ट को बचाने के चक्कर में विकास की बलि चढ़ा दी गई। आरोप सीधा है अफसरों ने विकास की गर्दन दबाकर रिसॉर्ट को जीवनदान दे दिया।
इस सनसनीखेज ” विकास गाथा” का खुलासा को किसी और ने नहीं, बल्कि पूर्व सरकार के एक दबंग मंत्री ने सार्वजनिक बहस में उजागर किया। उन्होंने बताया कि दर्री रोड के अग्रसेन तिराहा से राताखार जोड़ा पुल तक सड़क चौड़ीकरण के लिए दो करोड़ रुपये की स्वीकृति मिली थी। मकसद था जाम से मुक्ति और शहर को रफ्तार… लेकिन अफसरों को रफ्तार नहीं, रेसिपी ज़्यादा पसंद आई।
पूर्व मंत्री का आरोप है कि अफसरों ने होटल के चिकन का कर्ज चुकाने और रिसॉर्ट को बचाने के लिए विकास की बलि दे दी। सड़क चौड़ीकरण की योजना को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया और दो करोड़ रुपये कागजों में ही दम तोड़ गए।
यही नहीं, मंत्री यहीं नहीं रुके। उन्होंने दो साल की मौजूदा सरकार पर तीखा तंज कसते हुए कहा कि सड़क तो दूर की बात है, जो राशि उन्होंने सीएसआर के तहत स्वीकृत कराई थी, उसका टेंडर तक नहीं हो पाया। यानी विकास सिर्फ भाषणों में जिंदा है, जमीन पर नहीं। खुले मंच हुए डिबेट पर जनमानस कहने लगे जिन अफसरो के भरोसे विकास है वो रिसॉर्ट के चिकन के आगे नतमस्तक है। सो शहर विकास का सपना तो टूटेगा ही।

 

राजनीति:  खेत खाए गधा और…

राजनीति में खेत खाए गधा, मार खाए जुलाहा वाला फार्मूला हमेश हिट रहा है। कोरबा में चल रहे एसआईआर को लेकर बीजेपी फार्मूले पर चल रही है। खबर है कि जिले की सत्ताधारी पार्टी के अध्यक्ष ने कार्यकर्ताओं की बैठक में फरमान जारी किया है कि एसआईआर के तहत मतदाता सूची पर एक खास समुदाय के वोटरों पर आपत्ति दर्ज कराई जाए। नेता जी ने ये भी समझा दिया कि, शिकायत किसी संगठन पदाधिकारी को नहीं करनी है… यह काम कार्यकर्ता करेंगे।
बैठक खत्म होते ही नेता जी फरमान से कार्यकर्ताओं में खुसर-फुसर शुरू हो गई। यानि खेत किसी और ने चर लिया, डंडा किसी और की पीठ पर पड़ा। राजनीति में इसे ही रणनीति कहते हैं। वैसे ये नेताजी बड़े सयाने है वो राजनीति ऐसे करते है जैसे व्यापारी व्यापार..!. नपे तुले शब्दों में बात बोलकर कार्यकर्ताओं को उलझा देते हैं और…बाकी आप खुद समझ लें तो अच्छा है।

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महादेव की कृपा

नये साल का पहला महीना स्टेट के आईपीएस अफसरों पर भारी रहा। 23 जनवरी से रायपुर पुलिस कमिश्नर सिस्टम लागू हो जाएगा, लेकिन उससे पहले कई आईपीएस कप्तानी छोड़ के केंद्र में जाने के लिए तैयार हैं। असल में केंद्रीय गृह विभाग ने राज्यों से और भी आईपीएस अफसर प्रतिनियुक्ति पर मांगें हैं। ताकि केंद्रीय सुरक्षा बलों और अन्य सुरक्षा एजेंसियों में अफसरों की कमी पूरी की जा सके। और जो बचे हैं उन पर महादेव की कृपा बरस रही है।
खबरीलाल की माने तो पुलिस मुख्यालय में महादेव की कृपा से मालामाल होने वाले अफसरों की फाइल लाल कपड़े में लिपटी मिली है। असल में मंत्रालय में आईपीएस अफसरों की पदोन्नति का आदेश जारी होना है। इसको लेकर दो बार मंत्रालय में उच्चस्तरीय बैठक हो चुकी है। सूत्रों बताते हैं कि पदोन्नति वाले कुछ अफसर महादेव सट्टा ऐप मामले में जांच एजेंसी की रेडार पर हैं, इसलिए पदोन्नति लिस्ट लटक गई।
खबरीलाल की माने तो अगले हफ्ते विभागीय पदोन्नति समिति की बैठक होना है और जो अफसर जांच के घेरे में आए थे, उन सभी की पदोन्नति रोकी जा सकती है। इनमें डीआईजी से लेकर आईजी पद अफसर शामिल हैं। अब अगर इन अफसरों पर महादेव की कृपा हुई तो बात अलग है…नहीं तो पदोन्नति के लिए अभी और इंतजार करना होगा।

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किसिम किसिम के मुसवा

छत्तीसगढ़ राज म गजब हो गे हवय। इंहा किसम-किसम के मुसवा के चर्चा हवे। कहिथें न जिहां सरकार सोथे, तहां मुसवा जागथे। अइसनेच कुछु हो गे हवय। धान के कटोरा छत्तीसगढ़ म 10 करोड़ के धान मुसवा खा गिस। अब सवाल ये नई आय के मुसवा काबर खाइस, सवाल ये आय के मुसवा एतका निडर कइसे हो गे के सरकारी गोदाम म घुस के पेट पूजा कर डारिस। अउ मनखे मन कहिथें..ये मुसवा साधारण नई आय, ये सरकारी मुसवा आय।बिना कमीशन के धान खा जाथे का?कई मनखे मन तो मुसवा के कीमत घलोक लगावत हवय। मनखे मन कहिथें 10 करोड़ के धान अकेला मुसवा तो नई खा सके, फेर जरूर ऊपर ले आदेश आये होही, तबे मुसवा अइसन काम करे होही। छत्तीसगढ़ म 2,740 केंद्र म धान खरीदी होवत हवय। हिसाब-किताब लगाय जाये त एक ठन केंद्र म 10 करोड़ के धान, त 2,740 केंद्र म अब ले मुसवा कतेक धान सफा कर चुके होही! 10 करोड़ के धान खाये वाला मुसवा ल पकड़े बर कांग्रेस जाल फैलाके धुमत हवय। कांग्रेस मन कहिथें मुसवा धान कइसे खाइस, इकर जवाब दे सरकार। फेर सरकार घलोक कम नई आय। अधिकारी मन कहिथें..जांच होवत हवय। मुसवा घुस कइसे गिस, एखर रूट मैप बनत हवय। एक अधिकारी तो ये तक कह डारिस जांच होही त छत्तीसगढ़ म किसिम किसिम के मुसवा के मिलही। अउ मुसवा प्राकृतिक आपदा आय। अब मुसवा घलोक सोचत होही, त बाढ़, सूखा के बाद अब मुसवा घलोक आपदा हो गे! फेर अब पछताये ले का फायदा..।

         ✍️अनिल द्विवेदी, ईश्वर चंद्रा

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