साइबर प्रभारी, जुआरी और केस डायरी
कहते हैं ताश का जोकर और अपनों की ठोकर पूरा खेल कब पलट दे, कोई नहीं जानता। करतला में यह कहावत अब मुहावरा नहीं, केस डायरी बन चुकी है।
करतला थाना क्षेत्र में पकड़े गए जुआ फड़ ने साइबर सेल की उस रहस्यमयी थ्योरी को ऐसे उधेड़ा, जैसे सस्ते सूट का अस्तर। जो मामला बाहर से “ऑल इज़ वेल” दिखाया जा रहा था, भीतर से उतना ही ढीला और लचर निकला। जुआ पकड़ने की कहानी धीरे-धीरे अपराध कथा से फिसलकर फिल्मी पटकथा बन गई जहां लॉजिक छुट्टी पर था और संयोगों को ही सबूत मान लिया गया और इसी पटकथा में टीआई को बदनाम करने की कोशिश भी चुपके से फिट कर दी गई। लेकिन फिल्म तब अटक गई, जब कोर्ट ने एंट्री ले ली। साइबर प्रभारी को तलब किया गया और जुआ के साथ जब्त रकम पर सवाल पूछे गए। जवाबों में ऐसा तालमेल टूटा कि कहानी के सीन आपस में भिड़ने लगे। खबरीलाल बताते हैं कि जुआ लोकेशन बदलता रहा, जैसे मोबाइल नेटवर्क कभी यहां कभी वहां। इस ‘जुआ शिफ्टिंग टेक्नोलॉजी’ पर न्यायाधीश ने भी सीधा सवाल दाग दिया कि जांच पर ही दाग लग गया कि वाई-फाई से पहले ही कनेक्शन टूट गया।
साइबर टीम के कामकाज पर उठते सवालों के बीच एक पुराना गीत खुद-ब-खुद याद आने लगा। साल 1968 में आई फिल्म शिकार का वह मशहूर बोल आज कुछ ज्यादा ही मौजू लग रहा है..“तुम्हारे प्यार में हम बेकरार हो के चले,शिकार करने को आए, शिकार हो के चले!! ”…कुल मिलाकर, संदेश साफ है। शिकार की तलाश में निकलने वालों को कभी-कभी आईना भी साथ रखना चाहिए, क्योंकि अदालत की दहलीज़ पर यह तय नहीं होता कि वर्दी किसकी है वहां सिर्फ यह देखा जाता है कि सच किसके साथ है।
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साइबर प्रभारी, जुआरी और केस डायरीकहते हैं ताश का जोकर और अपनों की ठोकर पूरा खेल कब पलट दे, कोई नहीं जानता। करतला में यह कहावत अब मुहावरा नहीं, केस डायरी बन चुकी है।करतला थाना क्षेत्र में पकड़े गए जुआ फड़ ने साइबर सेल की उस रहस्यमयी थ्योरी को ऐसे उधेड़ा, जैसे सस्ते सूट का अस्तर। जो मामला बाहर से “ऑल इज़ वेल” दिखाया जा रहा था, भीतर से उतना ही ढीला और लचर निकला। जुआ पकड़ने की कहानी धीरे-धीरे अपराध कथा से फिसलकर फिल्मी पटकथा बन गई जहां लॉजिक छुट्टी पर था और संयोगों को ही सबूत मान लिया गया और इसी पटकथा में टीआई को बदनाम करने की कोशिश भी चुपके से फिट कर दी गई। लेकिन फिल्म तब अटक गई, जब कोर्ट ने एंट्री ले ली। साइबर प्रभारी को तलब किया गया और जुआ के साथ जब्त रकम पर सवाल पूछे गए। जवाबों में ऐसा तालमेल टूटा कि कहानी के सीन आपस में भिड़ने लगे। खबरीलाल बताते हैं कि जुआ लोकेशन बदलता रहा, जैसे मोबाइल नेटवर्क कभी यहां कभी वहां। इस ‘जुआ शिफ्टिंग टेक्नोलॉजी’ पर न्यायाधीश ने भी सीधा सवाल दाग दिया कि जांच पर ही दाग लग गया कि वाई-फाई से पहले ही कनेक्शन टूट गया।साइबर टीम के कामकाज पर उठते सवालों के बीच एक पुराना गीत खुद-ब-खुद याद आने लगा। साल 1968 में आई फिल्म शिकार का वह मशहूर बोल आज कुछ ज्यादा ही मौजू लग रहा है..“तुम्हारे प्यार में हम बेकरार हो के चले,शिकार करने को आए, शिकार हो के चले!! ”…कुल मिलाकर, संदेश साफ है। शिकार की तलाश में निकलने वालों को कभी-कभी आईना भी साथ रखना चाहिए, क्योंकि अदालत की दहलीज़ पर यह तय नहीं होता कि वर्दी किसकी है वहां सिर्फ यह देखा जाता है कि सच किसके साथ है।https://aid.aey.mybluehost.me/website_678a5d94/tension-over-sanatan-fear-of-khaki-less-promotion-of-criminals-amazing-collection-on-second-installment-of-fulldmf-not-protocol-need-to-change-face-power-politics-seed/ “दम है तो रोक के दिखा, वर्मा” छोड़ देगा मैं सिंडिकेटपुष्पा 2 का डायलॉग था..“दम है तो रोक के दिखा शेखावत” कोरबा में डायलॉग थोड़ा अपडेट हो गया है,“दम है तो रोक के दिखा वर्मा, पकड़ लिया तो छोड़ देगा सिंडिकेट!!”यह कोई फिल्म नहीं है, यहां कैमरा नहीं, सत्ता का कवर है।यहां हीरो नहीं, पूरे गिरोह की एंट्री है। हसदेव की रेत पर राजनीति का ऐसा आशीर्वाद प्रतीत होता है कि ट्रैक्टर नहीं, सत्ता के प्रतीक सड़कों पर दौड़ रहे हैं। अंतर बस इतना है कि यहां शेखावत की जगह नवपदस्थ “वर्मा” हैं और लाल चंदन की जगह हसदेव की रेत।शहर के रेत तस्कर अब खुलेआम चुनौती देते हुए कह रहे हैं “दम है तो रोक के दिखा वर्मा, पकड़ लिया तो छोड़ देगा सिंडिकेट!!”रेत तस्करी भी अब किसी फिल्मी स्क्रिप्ट से कम नहीं रही। ट्रैक्टर धड़ल्ले से सड़कों पर दौड़ रहे है और थाने और चौकियों के नाम पर टैक्स वसूली हो रही है मानो यह कोई जीएसटी नहीं, सिंडिकेट सेवा शुल्क हो।संरक्षण का सारा ठीकरा खनिज विभाग के सिर फोड़ दिया जाता है। पुलिस कहे हम तो सिर्फ सड़क पार करा रहे हैं, बाकी सब खनिज विभाग जाने। खनिज विभाग की टीम जब कभी कार्रवाई के मूड में आती है, तो सियासत के सूत्रधारों के फोन घनघनाने लगते हैं। उधर रेत तस्करी अपने दम पर नहीं, बल्कि पूरे संगठित गिरोह के साथ चलती है। एक टीम खनिज अधिकारियों पर नजर रखती है, दूसरी हर गतिविधि पल-पल अपने आकाओं तक पहुंचाती है। कौन निकला, कब निकला, किस सड़क पर गया, सबका लाइव अपडेट रहता है। कहा तो यह भी जा रहा है कि रेत तस्करों का क्रिमिनल माइंड इतना तेज है कि शहर में खुलेआम रेत से लदे ट्रैक्टरों को पकड़ना खनिज अफसरों के लिए मुश्किल नहीं, नामुमकिन बना दिया गया है। नियम-कानून अपनी जगह, लेकिन यहां सिंडिकेट का कानून पहले चलता है।हाल ही में कोरबा में पदस्थ हुए एएमओ जब सड़क पर कार्रवाई के लिए निकलते हैं, तो तस्कर उल्टा चुनौती देते हुए कहते है “दम है तो रोक के दिखा वर्मा,पकड़ लिया तो छोड़ देगा सिंडिकेट!! ”अब सवाल यह नही कि रेत तस्करी रुकेगी या नहीं। सवाल यह है कि यह डायलॉग सिर्फ फिल्मी रहेगा या हकीकत में भी कोई इसे पलटने का दम दिखाएगा। फिलहाल तो शहर में यही चर्चा है कि यहां पुष्पा अकेला नहीं, पूरा सिंडिकेट है। जहां यह रेत तस्करी नहीं बल्कि पॉलिटिकल मैनेजमेंट सिस्टम है, जहां कानून बाद में और संरक्षण पहले चलता है।https://aid.aey.mybluehost.me/website_678a5d94/police-commissioner-system-in-the-new-year-tension-in-the-department-due-to-suspension-of-the-police-station/सेंट्रल डेपुटेशन: क्या गम है जो छिपा रहे हो..!कैफ़ी आज़मी का लिखा और जगजीत सिंह आवाज में पिरोई गई गजल..”तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो, क्या गम है जिसको छुपा रहे हो…आज कल छत्तीसगढ़ की ब्यूरोक्रेसी का सबसे पसंदीदा सांग्स बना हुआ है। ये एक ऐसा सवाल है जो हर अफसर दूसरे से मुस्कुरा के पूछ रहे है। असल में छत्तीसगढ़ कैडर के कई आईएएस और आईपीएस अपना गृह राज्य को छोड़ के सेंट्रल डेपुटेशन को तरजीह देने लगे हैं और जो सेंट्रल डेपुटेशन पर हैं उन्हें वापस लौटने में कोई दिलचस्पी नहीं है।आईएएस की बात करें तो छत्तीसगढ़ कैडर की 2009 बैच की अधिकारी डॉ. प्रियंका शुक्ला सेंट्रल डेपुटेशन में ‘मेरा युवा भारत’ की मुख्य कार्यकारी अधिकारी पोस्ट हुईं है। ये प्रतिनियुक्ति के आधार पर तीन साल के लिए प्रभावी होगी। कार्तिकेय गोयल पहले से सेंट्रल डेपुटेशन पर हैं। अब छत्तीसगढ़ के दो जिले के कलेक्टर डेपुटेशन पर दिल्ली जाने को तैयार हैं।ऐसा ही चलन आईपीएस लाबी में दिख रहा है। छत्तीसगढ़ कैडर के 2018 बैच के IPS पुष्कर शर्मा प्रतिनियुक्ति पर इंटेलिजेंस ब्यूरो में असिस्टेंट डायरेक्टर बन गए हैं। कोरबा एसपी रहे जितेन्द्र शुक्ला NSG कमांडर बन गए हैं और राजनांदगांव में एसपी रहे मोहित गर्ग भी केन्द्र सरकार में प्रतिनियुक्ति पर जाने के लिए आवेदन दे चुके हैं। 2008 बैच की आईपीएस नीथू कमल पहले से CBI में डेपुटेशन पर हैं।असल में छत्तीसगढ़ जैसे छोटे राज्य में ब्यूरोक्रेसी को खुलकर फिल्डिंग करने का मौका कम होता है। ऊपर से सरकार का प्रेशर..कुल मिला के सीनियरटी पूरे होने तक अफसरों को दिल्ली का रास्ता ज्यादा मुनासिब लगाता है। फिर भी अफसरों के लिए होम्स कैडर छोड़ के सेंट्रल डेपुटेशन को चुनना मुस्कुराना और गम छिपाना दोनों की वजह हो सकता है। अब इसका अफसना क्या है ये अफसर ही जानें..।बूझो तो जानें..डेढ़ दूनी अठारह!कोरबा जिले के आदिवासी विभाग में इन दिनों एक अनोखा गणित चल रहा है। जिसमें फरसवानी में डेढ़ करोड़ रुपए खर्च कर एक भव्य इमारत खड़ी की जा रही है, जिसमें रहने वाले बच्चों की संख्या महज अठारह बताई जा रही है। दरअसल सरकारी दफ्तरों का गणित आम किताबों से नहीं, कमीशन के हिसाब से डिमांड और सप्लाई के पाठ्यक्रम से पढ़ाया जाता है। यहां डेढ़ दुनी तीन नहीं होता, यहां सीधे डेढ़ करोड़ और अठारह हो जाता है।आदिवासी विकास से जुड़ा यह विभाग पहले भी ऐसे कई गणित के सवाल साल्व कर चुका है। अब यही फार्मूला फरसवानी में खेला जा रहा है। हैरानी की बात यह है कि साल दर साल हॉस्टल में रहकर पढ़ने वाले छात्रों की संख्या घटती जा रही है। इसके बावजूद नए-नए प्रस्ताव भेजे जा रहे हैं और इमारतें पहले बन रही हैं, बच्चे बाद में ढूंढे जाएंगे।कुछ सूत्रधार तो यह भी बताते हैं कि 50 सीटर हॉस्टल में 18 छात्र रहकर 50 लोगों का राशन अफसरों के साथ मिल-बांटकर निपटाया जा रहा है। खबरीलाल की माने तो बच्चे सिर्फ आंकड़ों में रह गए हैं और असली रौनक बजट की रकम में है। कुल मिलाकर आदिवासी बच्चों के नाम पर बजट की बंदरबांट जनता के लिए अबूझ पहेली बन गई है।बजट पर चर्चा:नई शुरुआतछत्तीसगढ़ में 6 जनवरी से बजट 2026.27 के लिए विभागीय मंत्रियों के साथ वित्त मंत्री की बैठक शुरु होगी, मगर इसे पहले आज मुख्य सचिव विकासशील विभागीय सचिव की बैठक लेंगे। दूसरी तरफ सरकार के मंत्री प्रेस के साथ चाय पर चर्चा कर रहे हैं जिसमें वो अपने अपने विभागों के पिछले सत्र में किए गए काम की जानकारी मीडिया से शेयर कर रहे हैं।सरकार की ये नई शुरुआत फिलहाल तो पटरी पर दिख रही है, मगर बजट में किस मंत्री को कितना अलाटमेंट मिलना है इसका खाका पहले ही तैयार हो चुका है। असल में बजट बनाने के लिए इस बार छत्तीसगढ़ सरकार ने नए नियम बना दिया है। विभाग का बजट तैयार करने के लिए सबसे पहले विभाग अध्यक्षों की आकलन और समीक्षा को शामिल किया जाएगा, उसके बाद विभागीय सचिव की प्राथमिकताओं को उसमें शामिल किया गया है।ऐसा पहली बार हुआ है जब छत्तीसगढ़ सरकार बजट बनाने से पहले मंत्रियों से उनके विभाग में होने वाले काम की प्राथमिकता को जानेगी और फिर उसके बाद विभाग के बजट को अंतिम रूप दिया जाएगा। जिसकी शुरुआत कल यानि 6 जनवरी से होगी जिसमें पहले दिन चार मंत्रियों से उनके विभाग के बजट को लेकर चर्चा की जाएगी। ✍️अनिल द्विवेदी, ईश्वर चंद्रा
https://aid.aey.mybluehost.me/website_678a5d94/tension-over-sanatan-fear-of-khaki-less-promotion-of-criminals-amazing-collection-on-second-installment-of-fulldmf-not-protocol-need-to-change-face-power-politics-seed/
“दम है तो रोक के दिखा, वर्मा” छोड़ देगा मैं सिंडिकेट
पुष्पा 2 का डायलॉग था..“दम है तो रोक के दिखा शेखावत” कोरबा में डायलॉग थोड़ा अपडेट हो गया है,“दम है तो रोक के दिखा वर्मा, पकड़ लिया तो छोड़ देगा सिंडिकेट!!”यह कोई फिल्म नहीं है, यहां कैमरा नहीं, सत्ता का कवर है।यहां हीरो नहीं, पूरे गिरोह की एंट्री है। हसदेव की रेत पर राजनीति का ऐसा आशीर्वाद प्रतीत होता है कि ट्रैक्टर नहीं, सत्ता के प्रतीक सड़कों पर दौड़ रहे हैं। अंतर बस इतना है कि यहां शेखावत की जगह नवपदस्थ “वर्मा” हैं और लाल चंदन की जगह हसदेव की रेत।शहर के रेत तस्कर अब खुलेआम चुनौती देते हुए कह रहे हैं “दम है तो रोक के दिखा वर्मा, पकड़ लिया तो छोड़ देगा सिंडिकेट!!”
रेत तस्करी भी अब किसी फिल्मी स्क्रिप्ट से कम नहीं रही। ट्रैक्टर धड़ल्ले से सड़कों पर दौड़ रहे है और थाने और चौकियों के नाम पर टैक्स वसूली हो रही है मानो यह कोई जीएसटी नहीं, सिंडिकेट सेवा शुल्क हो।संरक्षण का सारा ठीकरा खनिज विभाग के सिर फोड़ दिया जाता है। पुलिस कहे हम तो सिर्फ सड़क पार करा रहे हैं, बाकी सब खनिज विभाग जाने। खनिज विभाग की टीम जब कभी कार्रवाई के मूड में आती है, तो सियासत के सूत्रधारों के फोन घनघनाने लगते हैं। उधर रेत तस्करी अपने दम पर नहीं, बल्कि पूरे संगठित गिरोह के साथ चलती है। एक टीम खनिज अधिकारियों पर नजर रखती है, दूसरी हर गतिविधि पल-पल अपने आकाओं तक पहुंचाती है। कौन निकला, कब निकला, किस सड़क पर गया, सबका लाइव अपडेट रहता है। कहा तो यह भी जा रहा है कि रेत तस्करों का क्रिमिनल माइंड इतना तेज है कि शहर में खुलेआम रेत से लदे ट्रैक्टरों को पकड़ना खनिज अफसरों के लिए मुश्किल नहीं, नामुमकिन बना दिया गया है। नियम-कानून अपनी जगह, लेकिन यहां सिंडिकेट का कानून पहले चलता है।हाल ही में कोरबा में पदस्थ हुए एएमओ जब सड़क पर कार्रवाई के लिए निकलते हैं, तो तस्कर उल्टा चुनौती देते हुए कहते है “दम है तो रोक के दिखा वर्मा,पकड़ लिया तो छोड़ देगा सिंडिकेट!! ”अब सवाल यह नही कि रेत तस्करी रुकेगी या नहीं। सवाल यह है कि यह डायलॉग सिर्फ फिल्मी रहेगा या हकीकत में भी कोई इसे पलटने का दम दिखाएगा। फिलहाल तो शहर में यही चर्चा है कि यहां पुष्पा अकेला नहीं, पूरा सिंडिकेट है। जहां यह रेत तस्करी नहीं बल्कि पॉलिटिकल मैनेजमेंट सिस्टम है, जहां कानून बाद में और संरक्षण पहले चलता है।












