
कोरबा। “जली को आग और बुझी को राख कहते हैं, और इस राख को जो बाइक में बैठाकर ट्रक का बिल बनवा ले, उसे उस्ताद कहते हैं।” यह डायलॉग किसी फिल्म का नहीं, बल्कि राख परिवहन में नए खेल का निचोड़ है।
कहते हैं चोर चोरी छोड़ दे, पर हेराफेरी नहीं। यह पंक्ति इन दिनों सीएसईबी की राखड़ ढुलाई करने वाले ट्रांसपोर्टरों पर फिट बैठती है। पर्यावरण विभाग ने राख चोरी और गलत डंपिंग रोकने के लिए ट्रकों में जीपीएस लगाना अनिवार्य किया। लगा कि अब ईमानदारी की राह पर ट्रक दौड़ेंगे। पर ट्रांसपोर्टरों ने सिस्टम को ऐसा गोल चक्कर घुमाया कि क्षेत्रीय पर्यावरण अधिकारी का जीपीएस भी चकरा गया।
सूत्रों के मुताबिक, ट्रक को डंपिंग साइट तक न ले जाकर ये लोग जीपीएस डिवाइस को बाइक में लगाकर वहीं तक घुमा देते हैं। सिस्टम को लगता है कि राख सही जगह पहुंच गई, जबकि हकीकत में राख हिलती भी नहीं। इस तकनीकी जुगाड़ ने पर्यावरण विभाग और निगरानी एजेंसियों को पूरी तरह चकमा दे दिया है।
राख को कोकीन समझकर उसकी कीमत वसूलने वाले कुछ ठेकेदार और अफसरों की मिलीभगत से यह खेल बेखौफ चल रहा है। कहा तो यह भी रहा है कि सीएसईबी के राखड़ डैम से बिना राख निकाले ही फर्जी पर्चियां काटी जा रही हैं। तभी तो डैम में अब राख भरने की जगह नहीं बची, लेकिन कागजों में ढुलाई जारी है।
जनमानस अब तंज कसते हुए कहने लगा है “जली को आग, बुझी को राख, और बाइक में जीपीएस लगाकर ट्रक का बिल बना ले, उसे उस्ताद कहते हैं।”
उस्तादों ने वैसे साबित कर दिया है कि जहां दिमाग से ट्रेलर चलता है, वहां असली ट्रेलर की क्या ज़रूरत..!



