चुस्त पुलिसिंग,कबाड़ चोर फरार और एसआई गिरफ्तार
जिले में चल रहे चुस्त पुलिसिंग “Policing” को लेकर इन दिनों चौक-चौराहों से लेकर चाय की दुकानों तक खुली बहस चल रही है। चर्चा का विषय कानून नहीं, बल्कि उसका अजीब संतुलन है। जनमानस अब कटाक्ष करते हुए कहने लगे हैं साहब ये कैसी चुस्त पुलिसिंग कबाड़ चोर फरार है और एसआई गिरफ्तार!
कहते हैं घर का मुखिया सख्त हो तो घर सुरक्षित रहता है। लेकिन जब मुखिया ही दिशाहीन हो जाए, तो घर नहीं, अखाड़ा बन जाता है। कुछ ऐसा ही हाल इन दिनों कोरबा की पुलिसिंग में दिखाई दे रहा है, जहां लोहे का पुल गायब है, लेकिन कानून का वजन पूरा का पूरा एक एसआई पर आकर रुक गया।
सेठों के नगर में पदस्थ एक एसआई की गिरफ्तारी हो जाती है, मगर रशियन हॉस्टल के पास लोहे का पुल काटकर ले जाने वाले कबाड़ चोर अब भी कानून की पकड़ से बाहर हैं। सवाल सीधा है क्या अपराध छोटा था या पकड़ कमजोर? जिस पुल से रोज़ आम लोग गुजरते हैं, जिसे काटकर चोर कबाड़ बना ले गए, वह कोई छोटी घटना नही है। ये बात भी सच है की कार्रवाई तो हुई, लेकिन दिशा उलटी दिख रही है। जिन पर उंगली उठनी चाहिए थी, वे नजर नहीं आ रहे और जो सामने थे, वे सलाखों के पीछे पहुंच गए। जनमानस यह नहीं पूछ रही कि गिरफ्तारी क्यों हुई, यह पूछ रही है कि
असली गुनहगार कब पकड़े जाएंगे? कहते है कानून का डर तब बनता है, जब अपराधी सलाखों के पीछे हो। वरना हालात ऐसे ही रहेंगे..पुल कटते रहेंगे, कबाड़ बिकता रहेगा और शहर यही कहता रहेगा..कबाड़ चोर फरार, एसआई गिरफ्तार..!
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कबाड़ का काम, बोलो जय सियाराम…
सरकार बदली तो कागजों में कबाड़ बंद हो गया। पुलिस रिकॉर्ड चमकने लगे, फाइलों में सब कुछ “नियंत्रण में” दिखने लगा, लेकिन ज़मीन पर तस्वीर वही रही। फर्क सिर्फ इतना आया कि कबाड़ अब थाने की चौखट लांघकर नहीं, थानेदार की छाया में चलने लगा।
कहते हैं व्यवस्था बदल जाए तो धंधा नहीं बदलता, बस संरक्षक बदल जाते हैं। लाल डायरी संभालने वालों के दंभ में कबाड़ वैसे ही चलता रहा जैसे पहले चलता था। न वजन घटा, न रफ्तार थमी।
अब कबाड़ की इस दुनिया में पिछले चार दिनों से एक नया नाम ऐसे उछल रहा है जैसे लोहे के ढेर में अचानक सोना चमक जाए। पुराने खिलाड़ी हैरान हैं, नए हालात को परख रहे हैं। चाय की दुकानों पर फुसफुसाहट है, गोदामों में गुनगुनाहट। सूत्रधार की मानें तो हाई लेवल सेटिंग का हवाला देते हुए रिसदी के एक कबाड़ कारोबारी ने फुटकर कबाड़ियों की बैठक बुला ली। साफ शब्दों में एलान कर दिया गया कि फरवरी से कबाड़ का काम पूरे जोर-शोर से शुरू होगा। शहर के सभी कबाड़ कारोबारियों को अपने-अपने चोर गिरोह एक्टिव करने के निर्देश भी दे दिए गए। अवैध कारोबार की दुनिया में जैसे ही नए बॉस की घोषणा हुई, लोहा चुराने वालों की आंखों में हसीन सपने तैरने लगे।
सूत्रधार का कहना है कि अब कबाड़ सिर्फ लोहे का नहीं, लाल डायरी, दंभ और सत्ता की छाया का खेल बन चुका है। और सच पूछिए, इस खेल में कोई नियम नहीं, सिवाय इसके कि जो चमकेगा, वही राज करेगा।
बैठक में शामिल कबाड़ी अब घूम-घूमकर एक ही जुमला दोहरा रहे हैं“कबाड़ का काम, बोलो जय सियाराम…!”
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बाप मंत्री, बेटा सुपर मंत्री
छत्तीसगढ़ में मंत्रियों के बंगले का काम संभालने वाले पीएस और निजी स्टाफ रात को चैन की नींद नहीं ले पा रहे हैं..क्या पता कल मंत्री की नजर फिर जाए और बोरिया बिस्तर समेट कर बंगले से रुखसत लेना पड़ जाए। कई मंत्री पहले ही पर्सनल स्टाफ को बदल चुके हैं। वैसे भी पीएस और निजी स्टाफ के मामले में मंत्रियों की पसंद नहीं चल रही है लेकिन, मंत्री भी कम सयाने थोड़े हैं…।
असल में सरकार में कई विभाग संभाल रहे एक मंत्री ने इसका तोड़ निकाल लिया। बार बार स्टाफ बदलने से अच्छा है बेटे को ही आगे बढ़ाया जाए। बेटा भी होनाहार निकला..। खबरीलाल की माने तो मंत्री के ई आफिस का पासवर्ड भी उसी के पास रहता है। जिस पर हरी स्याही वाली टिक वही फाइल आगे बढ़ती है, अन्यथा नहीं।
और तो और मंत्री का स्टाफ उसे ( super minister) सुपर मंत्री मानकर आदेश बजा रहे हैं। अब मंत्री स्टाफ के कई लोग मंत्री पुत्र के फरमान से असहज महसूस करने लगे हैं। खबरीलाल की माने तो कई स्टाफ अपना बोरिया बिस्तर समेट कर बैठे हैं पता नहीं कब बंगले से रवानगी का फरमान जारी हो जाए।
शतरंज के खिलाड़ी
राजधानी रायपुर में एक खबर बड़ी चर्चा में रही। असल में आशीर्वाद भवन में रविवार को पूर्व केंद्रीय मंत्री स्व विद्याचरण शुक्ल के गठित छत्तीसगढ़ संघर्ष परिषद के रजत जयंती समारोह में कांग्रेस के दिग्गज नेता डॉ चरणदास महंत और अमितेश शुक्ल के साथ मंच साझा करने के लिए सांसद बृजमोहन अग्रवाल भी पहुंचे थे।
वैसे जिस मंच पर चरणदास महंत जैसे तर्जुबेदार चेहरा मौजूद हो वहां राजनीति की गहरी बात न हो…ऐसा कैसे हो सकता है। असल में महंत जी को ये मौका बृजमोहन ने खुद ही दे दिया। अग्रवाल ने, मंच से कहा, एक बार के लिए लगा कि कहीं कांग्रेस के आयोजन में ही तो मौजूद नहीं। फिर कहा, मेरी सबके साथ मित्रता।
फिर महंत कहां चूकने वाले थे..फट से कह दिया… बृजमोहन जी के कांग्रेस से अच्छे संबंध.. वो कांग्रेस के भी काम आते हैं और बीजेपी के भी..! वो बीजेपी में रहते हुए भी वो हमारी मदद करते रहे हैं..करते रहेंगे आगे भी करेंगे..!
भरे मंच से महंत ने उपमाओं और संकेतों की भाषा में बहुत कुछ कह दिया। राजनीति को उन्होंने शतरंज की जटिल बिसात से जोड़ते हुए कहा कि किस मोहरे को ढाई घर की चाल चलनी है और कब हाथी पर आरूढ़ होकर दीर्घ यात्रा करनी है, यह केवल कुशल खिलाड़ी ही जानता है। उसे भलीभांति ज्ञान होता है कि किस क्षण किस पर प्रहार करना है और कब किसका आश्रय लेना है।
महंत की इस रूपकात्मक अभिव्यक्ति के बाद राजधानी के वैचारिक और राजनीतिक गलियारों में सरगर्मी बढ़ गई है। हर ओर यही जिज्ञासा है कि उस शतरंज का वास्तविक खिलाड़ी कौन है और अगली निर्णायक चाल किस दिशा में चली जाएगी। मंच से निकले शब्द अब सत्ता के गलियारों में गूंज बनकर फैल चुके हैं।
स्पा की डायरी और खाकी की खामोशी
स्पा सेंटर सिर्फ मसाज नहीं बेचते। यहां नाम बिकते हैं, नंबर बिकते हैं और वो पल बिकते हैं, जो बाहर आ जाएं, तो इज्जत से पहले कुर्सी गिरती है।
शहर में इन दिनों एक प्रश्न चिमनी से निकले राख की तरह चारों ओर बरस रहा है अगर डायरी खुल गई तो सबसे पहले पसीना किसका छूटेगा?बिलासपुर के स्पा से खाकी की वसूली की खबर क्या हवा में तैरी, कोरबा के एसी दफ्तरों में मौसम अचानक उमस भरा हो गया।वजह साफ है। यहां भी सब कुछ “जानकारी में” चलता रहा है, बस लिखित में कभी नहीं आया।
कहते हैं अवैध काम बिना संरक्षण के नहीं चलता और जब संरक्षण मौन में मिले, तो शिकायत भी मौन ही रह जाती है। लेकिन समस्या तब खड़ी होती है जब मौन टूटने लगे और लाल डायरी की स्याही बोलने को तैयार हो जाए।
शहर के पॉम मॉल, सिटी सेंटर, अभिनंदन कॉम्प्लेक्स और कॉफी हाउस के सामने वाली स्पा सेंटरों में आने वाले “विशेष” ग्राहकों का हिसाब किताब सिर्फ कैश बुक में नहीं, एक अलग डायरी में रखा जाता है। नाम, नंबर और वो पल, जिन्हें याद रखना भी खतरे से खाली नहीं। यही लाल डायरी जरूरत पड़ने पर एटीएम बन जाती है। बटन कोई और दबाता है, नोट कोई और उगलता है।
खबरीलाल बताते हैं कि यहां काम करने वाली युवतियों में कई दिल्ली, हरियाणा और विदेश से बुलाई गई है। जिनके वीजा पर भी सवाल उठ रहे है। वीज़ा पर सवाल हैं, मगर सवाल पूछने वाले अक्सर सिस्टम से बाहर हो जाते हैं।
शहर में चर्चा ये भी है कि स्पा सेंटर के लाल डायरी में सिर्फ लक्ष्मीपुत्रों के नाम नहीं हैं। खाकी के कुछ नाम भी स्याही में दर्ज हैं। डंडे के दम पर मिलने वाली एक्स्ट्रा सर्विस और खामोशी का सौदा समय समय पर अपडेट होता रहा है। शहर में चल रहे स्पा पर दुर्ग के तत्कालीन रहे एसपी अभिषेक पल्लव का पुराना वीडियो की याद आने लगी है। वीडियो देखकर स्पा प्रेमी अब मजा कम और चिंता ज्यादा कर रहे हैं। डर ये नहीं कि कानून आएगा, डर ये है कि कहीं फोटो बाहर आ गई तो धन के साथ पुण्य भी चला जाएगा। अब सवाल ये नहीं कि स्पा में क्या चल रहा है। सवाल ये है कि अगर लाल डायरी खुल गई तो सस्पेंशन की फाइल किस टेबल से चलेगी और किस टेबल पर रुक जाएगी,क्योंकि शहर जानता है..डायरी लाल है, स्याही गहरी है और खामोशी सबसे बड़ी साझेदार।
✍️अनिल द्विवेदी ,ईश्वर चंद्रा
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