Real Estate Scam : बिलासपुर में ‘नक्शा घोटाला’ का खुलासा…! 60 फ्लैट की अनुमति पर 90 फ्लैट का नक्शा पास…फर्जी आर्किटेक्ट के नाम पर 400 से ज्यादा नक्शे मंजूर

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बिलासपुर, 15 मार्च। Real Estate Scam : छत्तीसगढ़ की न्यायधानी बिलासपुर में शहरी विकास से जुड़े एक बड़े कथित घोटाले का खुलासा हुआ है। नगर निगम और Town and Country Planning Department (टीसीपी) की स्वीकृति प्रक्रिया में गंभीर अनियमितताओं के आरोप सामने आए हैं। दस्तावेजों की जांच में सामने आया है कि जहां एरिया स्टेटमेंट में केवल 60 फ्लैट का उल्लेख था, वहीं विभागीय स्वीकृति में 90 फ्लैट और छह मंजिल का नक्शा पास कर दिया गया।

यह मामला अज्ञया नगर क्षेत्र में प्रस्तावित ‘मेसर्स अनंत रियाल्टी’ प्रोजेक्ट से जुड़ा बताया जा रहा है। आरोप है कि बिल्डर नमन गोयल ने विभागीय अधिकारियों की कथित मिलीभगत से निर्माण नियमों और मास्टर प्लान को दरकिनार करते हुए स्वीकृति हासिल की। विशेषज्ञों का कहना है कि एरिया स्टेटमेंट और स्वीकृत नक्शे के बीच इतना बड़ा अंतर सामान्य प्रशासनिक गलती नहीं माना जा सकता।

फर्जी आर्किटेक्ट के नाम पर सैकड़ों मंजूरियां

मामले का सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि दस्तावेजों में जिस आर्किटेक्ट का नाम दर्ज है ‘विकास सिंह’ उस नाम का कोई पंजीकृत आर्किटेक्ट या इंजीनियर शहर में मौजूद ही नहीं है। नगर निगम के रिकॉर्ड और पेशेवर संस्थाओं से मिली जानकारी के अनुसार इस नाम का कोई आधिकारिक पंजीकरण नहीं मिला।

जांच में यह भी सामने आया कि इसी नाम का उपयोग कर शहर में 400 से अधिक भवनों के नक्शे और 150 से ज्यादा लेआउट स्वीकृत किए गए। यानी एक ऐसे व्यक्ति के नाम पर वर्षों तक निर्माण स्वीकृतियां जारी होती रहीं, जिसका वास्तविक अस्तित्व ही संदिग्ध बताया जा रहा है।

अवैध निर्माण से खुली परतें

नगर निगम की एक कार्रवाई के दौरान भी इस नेटवर्क की झलक सामने आई। पुराने बस स्टैंड के पास स्थित महुआ होटल पर अवैध निर्माण को लेकर कार्रवाई की गई थी। जांच में पाया गया कि होटल का नक्शा भी ‘विकास सिंह’ के नाम से स्वीकृत किया गया था और निर्माण में ओपन स्पेस व पार्किंग जैसी शर्तों का उल्लंघन किया गया था। बाद में इस नाम से जुड़े लाइसेंस को ब्लैकलिस्ट कर दिया गया।

EWS आवास को लेकर भी सवाल

नियमों के अनुसार बड़े आवासीय प्रोजेक्ट में आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) के लिए आवास आरक्षित करना अनिवार्य होता है। संबंधित प्रोजेक्ट के लिए बिल्डर द्वारा एक शपथपत्र दिया गया था, जिसमें ग्राम तिफरा की जमीन पर EWS फ्लैट बनाने का दावा किया गया। लेकिन राजस्व रिकॉर्ड की जांच में पता चला कि जिस जमीन का उल्लेख किया गया है, वह बिल्डर के नाम पर दर्ज ही नहीं है।

एक दिन में 29 लेआउट मंजूर

जांच के दौरान यह भी सामने आया कि कुछ मामलों में एक ही दिन में 29 लेआउट फाइलों को मंजूरी दी गई। शहरी नियोजन से जुड़े जानकारों का कहना है कि सामान्य प्रक्रिया में इतनी बड़ी संख्या में फाइलों को एक ही दिन में स्वीकृत करना लगभग असंभव है, जिससे विभागीय मिलीभगत की आशंका और गहरा जाती है।

करोड़ों के लेनदेन की आशंका

नगर निगम के आकलन के अनुसार एक एकड़ रिहायशी लेआउट को स्वीकृति दिलाने में 75 हजार से 2.5 लाख रुपये तक खर्च आता है, जबकि मकान के नक्शे के लिए 8 हजार से 20 हजार रुपये तक शुल्क लिया जाता है। ऐसे में 400 से अधिक नक्शे और 150 से ज्यादा लेआउट स्वीकृत होने के पीछे करोड़ों रुपये के लेनदेन की आशंका जताई जा रही है।

इस पूरे घटनाक्रम के सामने आने के बाद शहर में शहरी विकास तंत्र की पारदर्शिता और निर्माण स्वीकृति प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठने लगे हैं। अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि प्रशासन इस कथित नक्शा और लेआउट घोटाले की जांच कितनी गंभीरता से करता है और क्या दोषियों की जवाबदेही तय हो पाती है या नहीं।

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