Mahatari Vandan Yojana Scam : महतारी वंदन योजना का पैसा 12 महीने तक पुरुष के खाते में जाता रहा…! पति और हितग्राही दोनों ‘तिलोक साहू’…फिर भी पास हो गया फॉर्म

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Mahatari Vandan Yojana Scam
खैरागढ़, 09 जुलाई। Mahatari Vandan Yojana Scam : छत्तीसगढ़ की महतारी वंदन योजना में एक बड़ा फर्जीवाड़ा सामने आया है। महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण के लिए शुरू की गई इस योजना में खैरागढ़ जिले के ग्राम मुढ़ीपार निवासी तिलोक साहू का आवेदन स्वीकृत हो गया, जबकि वह पुरुष है। हैरानी की बात यह है कि आवेदन में उसने हितग्राही और पति, दोनों के नाम में खुद ‘तिलोक साहू’ दर्ज किया था। इसके बावजूद आवेदन का सत्यापन कर दिया गया और उसके बैंक खाते में लगातार 12 महीने तक योजना की राशि जमा होती रही।

खुद ही हितग्राही, खुद ही पति

ऑनलाइन रिकॉर्ड के मुताबिक आवेदन में हितग्राही का नाम और पति का नाम दोनों तिलोक साहू दर्ज था। इसके बावजूद खैरागढ़ परियोजना के मुढ़ीपार सेक्टर की आंगनबाड़ी कार्यकर्ता और सुपरवाइजर ने आवेदन को सत्यापित कर दिया। इसके बाद हर महीने योजना की राशि संबंधित खाते में पहुंचती रही।

एक साल बाद खुली बड़ी लापरवाही

करीब एक साल बाद मामला सामने आने पर आवेदन की स्थिति ‘परमानेंट होल्ड’ और ‘लाभ त्याग अनुरोध स्वीकृत’ दिखाई गई। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि यदि यह गड़बड़ी उजागर नहीं होती तो क्या भुगतान आगे भी जारी रहता?

12 किस्त मिलीं, रिकवरी सिर्फ 10 की?

मामले में एक और बड़ा विरोधाभास सामने आया है। ऑनलाइन रिकॉर्ड के अनुसार लाभार्थी को 12 महीनों तक राशि मिली, जबकि 3 जुलाई 2026 को एकीकृत बाल विकास सेवा परियोजना, खैरागढ़ ने बैंक को भेजे पत्र में केवल 10 हजार रुपये शासन के खाते में वापस जमा कराने के निर्देश दिए। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि यदि 12 किस्तों का भुगतान हुआ, तो रिकवरी सिर्फ 10 महीने की राशि की ही क्यों हुई? बाकी राशि का क्या हुआ, इसका जवाब विभागीय जांच के बाद ही सामने आएगा।

जिला परियोजना अधिकारी का बयान

जिला परियोजना अधिकारी पी.आर. खुटेल ने बताया कि संबंधित हितग्राही से राशि की रिकवरी कर ली गई है। अन्य तथ्यों के संबंध में उन्होंने रिकॉर्ड देखने के बाद जानकारी देने की बात कही।

सत्यापन व्यवस्था पर गंभीर सवाल

इस पूरे मामले ने महतारी वंदन योजना की सत्यापन प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। महिलाओं के लिए बनाई गई योजना में एक पुरुष का आवेदन कैसे स्वीकृत हो गया? हितग्राही और पति का नाम एक होने के बावजूद आवेदन कैसे पास हुआ? और आखिर एक साल तक किसी अधिकारी की नजर इस गड़बड़ी पर क्यों नहीं पड़ी? अब सवाल केवल राशि की रिकवरी का नहीं, बल्कि उन अधिकारियों और कर्मचारियों की जवाबदेही तय करने का भी है, जिनकी लापरवाही से यह पूरा मामला संभव हुआ।
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