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Korba: एक मासूम की जान और सिर्फ एक लाख का मुआवजा… आखिर कब जागेगा सिस्टम?


 

 

✍️अनिल द्विवेदी

 

कोरबा।Korba Stray Dog Attack छत्तीसगढ़ के कोरबा में आवारा कुत्तों के हमले में पांच वर्षीय मासूम की दर्दनाक मौत ने पूरे शहर को झकझोर दिया है। यह सिर्फ एक परिवार की त्रासदी नहीं, बल्कि उस सरकारी व्यवस्था पर बड़ा सवाल है जो हर हादसे के बाद सक्रिय नजर आती है, लेकिन हादसा रोकने में अक्सर नाकाम रहती है।

घटना के बाद नगर निगम प्रशासन हरकत में आया। अधिकारियों ने क्षेत्र का दौरा किया, आवारा कुत्तों को पकड़ने का अभियान शुरू किया और पीड़ित परिवार को एक लाख रुपये की आर्थिक सहायता देने की घोषणा की। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या किसी मासूम की जिंदगी की कीमत सिर्फ इतनी है? क्या हर बार किसी की जान जाने के बाद ही प्रशासन की जिम्मेदारियां शुरू होंगी?

शहर के लोगों का कहना है कि आवारा कुत्तों की समस्या नई नहीं है। कई इलाकों से लगातार शिकायतें आती रही हैं। नसबंदी अभियान, डॉग कैचिंग अभियान और नियंत्रण की योजनाएं वर्षों से कागजों में चलती रही हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर अपेक्षित परिणाम दिखाई नहीं दिए। यदि समय रहते प्रभावी कार्रवाई होती, तो शायद आज यह मासूम अपने परिवार के बीच होता।

मुआवजा किसी भी परिवार के टूटे हुए सपनों को वापस नहीं ला सकता। आर्थिक सहायता संवेदना का एक माध्यम हो सकती है, लेकिन इसे समस्या का समाधान नहीं माना जा सकता। जरूरत इस बात की है कि नगर निगम स्थायी और प्रभावी कार्ययोजना बनाकर आवारा कुत्तों की समस्या पर गंभीरता से काम करे, नियमित अभियान चलाए और जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही भी तय हो।

यह घटना केवल एक खबर नहीं है, बल्कि पूरे प्रशासनिक तंत्र के लिए चेतावनी है। यदि हर त्रासदी के बाद सिर्फ मुआवजे की घोषणा होती रही और मूल समस्या जस की तस बनी रही, तो भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति को रोकना मुश्किल होगा।

किसी भी बच्चे की जिंदगी अनमोल होती है। उसकी भरपाई न किसी मुआवजे से हो सकती है और न ही औपचारिक संवेदनाओं से। अब समय आ गया है कि हादसों के बाद नहीं, बल्कि हादसों से पहले कार्रवाई हो, ताकि किसी और परिवार को ऐसा असहनीय दर्द न सहना पड़े।

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