Featuredकटाक्ष

Government in cattle trolley! थानेदार और कबाड़ कारोबार,बेटा पटवारी, बाप जमीन कारोबारी..!वाह री किस्मत..चल गया झाडू वाला टोटका…! सुशासन पर पीएम के 19 ट्वीट

मैनेजर टाइप के थानेदार और कबाड़ कारोबार..

कोरबा पुलिस की हवा इन दिनों कुछ बदली-बदली सी है। ऊर्जाधानी के मैनेजर टाइप थानेदार हवा के रुख के अनुसार कबाड़ कारोबारी को ढील दे रहे है। हवा के रुख के साथ इनका नैतिक तापमान भी ऊपर-नीचे होता रहता है।

थानेदार को मैनेजरगिरी करते देख अधीनस्थ कर्मचारी भी दबी जुबां से कहने लगे है क्या जमाना है भाई सख्त कप्तान के राज मे कबाड़ कारोबार..!

वैसे तो साहब के कोरबा पोस्टिंग के बाद विभाग के अफसरों के कामों में कुछ खास तब्दीली नहीं आई है। मीटिंग अटेंड करना एक औपचारिकता रह गया है। चर्चा कम, कॉफी और कम्फर्ट ज़ोन ज़्यादा। आदेश ऊपर से आते हैं, लेकिन अमल नीचे “अपनी सुविधा” से होता है। ऐसे मैनेजर टाइप थानेदारों को साहब के सख्त तेवर का कोई असर नही हो रहा है।

वैसे भी कोरबा जिले के थानेदार जैसा डीजे होगा वैसे ही डांस करने वाले है। अब तो ये डांस “पैकेज” की धुन पर होता है।

जश्न रिसॉर्ट के पास खुले कबाड़ की दुकान इसका जीता जागता उदाहरण है, पुलिस की नज़र के नीचे सबकुछ खुला खेल, फर्राटेदार धंधा और सन्नाटा सिर्फ थाने में!

बात जिले की पुलिसिंग की करे तो शहरों के क्राउड वाले इलाके में सड़क पर खड़ी गाड़ियां, कोयले का खेल, आउटर की वसूली, और कालरी क्षेत्र में दो नंबर वाला खेल अब भी चल रहा है। वर्दी का खौफ तो नाममात्र रह गया है, और जनता का विश्वास… वो तो अब “मिसिंग रिपोर्ट” में दर्ज होना चाहिए। जनमानस धीरे-धीरे समझ चुका है कि कोरबा की पुलिसिंग अब “कानून व्यवस्था” नहीं, बल्कि “कमीशन व्यवस्था” के दौर में है। कुल मिला कर जनमानस भी कहने लगी है मैनेजर टाइप के थानेदार और कबाड़ कारोबार.. दया कुछ तो गड़बड़ है..!

 

बेटा पटवारी, बाप जमीन कारोबारी!

 

कोसा नगरी में इन दिनों सिनेमा नहीं, ज़मीन का स्क्रिप्ट चल रहा है नाम है “बाप नंबरी, बेटा दस नंबरी!” लोग कहते हैं, यह कोई फिल्म नहीं, “सच्ची घटना पर आधारित” है।

एसईसीएल अधिग्रहीत इलाके के किसान मजाक में कहते हैं, “बेटा पटवारी, बाप जमीन कारोबारी… छा गए गुरु!”

जमीन के धंधे में पटवारी की भूमिका किसी “गेम चेंजर” से कम नहीं होती। और जब खुद का बेटा पटवारी बन जाए, तो फिर खेल तय समझिए। कोसा नगरी में ऐसी ही बाप-बेटे की जोड़ी ने भू-माफियागिरी का नया अध्याय लिख दिया है।

पोस्टिंग मिलते ही पटवारी साहब ने पिता के “बिजनेस” में हाथ बंटाना शुरू कर दिया। सरकारी रकबा हो या किसान की पुश्तैनी जमीन सौदे अब सरकारी कागजों से लेकर बाजार तक, सब इनके इशारे पर होते हैं। किसान की मजबूरी, अफसरों की सेटिंग और दलालों की मिलीभगत ने मुआवजे की रकम को इनकी तिजोरी तक सीमित कर दिया है।

लोग कहते हैं एसईसीएल अधिग्रहीत क्षेत्र में पटवारी और थानेदारी सबसे “लाभदायक” पद हैं। और जब पोस्टिंग अपने ही शहर में हो, तो मामला और भी गड़बड़। कोसा के लोग कहते हैं, “होमटाउन पोस्टिंग मतलब खुला खेल फर्रूखाबादी।” बाप-बेटे की इस जोड़ी ने तो सरकारी तंत्र को ही “फैमिली बिज़नेस मॉडल” में बदल दिया है।

किसान की जमीन औने-पौने में हथियाना, डराना-धमकाना और मुआवजे की रकम पर डाका डालना अब यही असली “परिवारिक धंधा” बन गया है। पटवारी पिता के नक्शेकदम पर नहीं, बल्कि उसे पीछे छोड़कर दौड़ रहा है। इस जोड़ी ने साबित कर दिया“बाप नंबरी तो बेटा दस नंबरी।”

वाह री किस्मत..चल गया झाडू वाला टोटका…!

 

कहावत है जब किस्मत का चक्कर चलता है तो हर बला दूर भाग जाती है। फिर चाहे वो ट्रांसफर पोस्टिंग का मामला ही क्यों न हो…। ऐसा इसलिए कि कलेक्टर्स कांफ्रेंस के बाद आईएएस अफसरों के तबादला की जो लिस्ट निकलने वाली थी वो लटक गई। कटाक्ष के पिछले अंक में..”धनतेरस.. झाडू और कलेक्टर” वाले कालम में खबरीलाल ने पहले ही बता दिया था कि..इस बार धनतेरस और दिवाली में मनी पॉवर वाली ब्यूरोक्रेसी में सोना चांदी की जगह झाडू खरीदने का ट्रेंड चल पड़ा है। खबरीलाल को ये भी खबर थी कि इस बार झाडू का importance धन लक्ष्मी की वजह से नहीं बल्कि खुद की कुर्सी बचाने के धनतेरस पर बुरी नजर से बचाने लिए आजमाए जाने वाले टोटके के लिए हो रहा है।

आखिर खबरीलाल की खबर सच निकली..। हालांकि इस खबर को सच होते धनतेरस और दिवाली दोनों बीत गए..मगर एकादशी आते-आते टोटका काम कर गया। दिवाली के अगले सप्ताह चुनाव आयोग ने झाडू फिराते हुए SIR ला दिया। अब SIR से जुड़े अफसर आयोग के डेपुटेशन पर माने जाएंगे और किसी भी ट्रांसफर पोस्टिंग से पहले राज्य सरकार को आयोग की अनुमति लेनी होगी। वैसे भी जो किस्मत के धनी होते हैं उन्हें ही कलयुग में कलेक्टरी का सुख मिलता है…एक बात और ध्यान में रखे, एकादशी को देवउठनी भी कहते हैं…सूबे में विष्णुदेव का राज है अगर विष्णुदेव जाग उठे तो फिर उनके आगे झाडू वाला टोटका चलने से रहा..मतलब साफ है हरि अनंत हरि कथा अनंता…सब कुछ सांय सांय…बाकि आप खुद समझ जाएं..।

सुशासन पर पीएम के 19 ट्वीट

 

छत्तीसगढ़ अपने स्थापना दिवस के 25 साल पूरे कर चुका है…राजधानी रायपुर और जिलों में  5 नवंबर तक राज्योत्सव मनाया जाएगा। छत्तीसगढ़वासियों के लिए ये गर्व का पल है। पीएम मोदी इसमें शिरकत करने खुद रायपुर पहुंचे। राज्योत्सव को लेकर छत्तीसगढ़वासियों के उल्लास को लेकर पीएम कई बार भावुक भी नजर आए..हर कार्यक्रम को गौर से देखा..यहां कि जनता के चेहरों को पढ़ा और जय जोहर भी किया। मगर यहां से जाने के बाद पीएम ने अपने ट्विटर अकाउंट में एक के बाद लगातार 19 ट्वीट कर छत्तीसगढ़ के अपने आत्मीय लगाव को जिस अंदाज में पोस्ट किया, उसमें सुशासन वाली सरकार की तारीफ, और आने वाले सालों को रोड मैप सब कुछ साफ-साफ दिखा। कुल मिला कर छत्तीसगढ़ से पीएम का यह जुड़ाव को प्रदेश के विकास के लिए शुभ संकेत है। अब यहां की सरकार की जिम्मेदारी बनती है कि वो पीएम के भरोसे पर खुद का खरा साबित करे।

पशु ट्राली में सरकार!

 

कोरबा यानि नाम ही काफी है…बार बार अपनी कारगुजारी को लेकर , जिला एक बार फिर चर्चा में है। इस बार तो हद हो गई नगर निगम ने अपनी पशु ट्राली में सरकार को ही समेट लिया। छत्तीसगढ़ राज्य स्थापना की रजत जयंती के अवसर पर ओपन थिएटर में 2 से 4 नवम्बर तक होने वाले राज्योत्सव कार्यक्रम स्थल पर छत्तीसगढ़ के नेताओं मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री, श्रम मंत्री आदि के कट आउट को लगाने के लिए इनका परिवहन पशु ट्राली में किए जाने से बवाल मचा हुआ है।

सोशल मीडिया में इसकी तस्वीर तेजी से वायरल हो रही है। ऐसा दूसरी बार हुआ है (11 सितम्बर 2025 को भी यह हुआ था) जब नेताओं के कट आउट पशु ट्राली में ढोए गए थे। पहली बार चेतावनी दी गई थी लेकिन निगम ने अपनी लापरवाही वहीं गलती को दोबारा दोहरा दिया। हालांकि आयुक्त ने निगम के अफसरों से 48 घंटे में जवाब मांगा है। मगर नहीं चेतावनी देकर छोड़ देने से काम होना होता तो निगम के अफसर गलती को नहीं दोहराते। अपने देखने वाली बात ये होगी लापरवाह अफसरों पर क्या कार्यवाही होती है।

 

  ✍️अनिल द्विवेदी , ईश्वर चन्द्रा

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button