Textbook Corporation sexual harassment case: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने पाठ्यपुस्तक निगम के तत्कालीन महाप्रबंधक अरविंद कुमार पांडेय के खिलाफ यौन उत्पीड़न की शिकायत की पुरानी जांच शून्य घोषित कर नई जांच के निर्देश दिए।
बिलासपुर/रायपुर।Textbook Corporation sexual harassment case छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने राज्य पाठ्यपुस्तक निगम के तत्कालीन महाप्रबंधक अरविंद कुमार पांडेय के खिलाफ लगाए गए यौन उत्पीड़न के आरोपों की जांच को नए सिरे से कराने का आदेश दिया है। कोर्ट ने माना कि जिस आंतरिक शिकायत समिति ने पहले मामले की जांच की थी, उसका गठन ही कानून के अनुरूप नहीं था।
जस्टिस अमितेंद्र किशोर प्रसाद की सिंगल बेंच ने पुरानी जांच और उसके आधार पर तैयार रिपोर्ट को शून्य घोषित कर दिया। अब शिकायत की जांच नए सिरे से एक ऐसी समिति करेगी, जिसका गठन निर्धारित कानूनी प्रावधानों के मुताबिक किया जाएगा।
स्टेनो टाइपिस्ट है जुड़ा है मामला
मामला राज्य पाठ्यपुस्तक निगम की एक स्टेनो टाइपिस्ट की शिकायत से जुड़ा है। उन्होंने मार्च 2022 में तत्कालीन महाप्रबंधक अरविंद कुमार पांडेय के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी।
शिकायत के बाद निगम ने पांच सदस्यीय आंतरिक शिकायत समिति बनाकर मामले की जांच कराई। हालांकि, शिकायतकर्ता ने समिति के गठन और उसकी निष्पक्षता पर ही सवाल उठा दिए थे।
उनका कहना था कि समिति में शामिल अधिकारी तत्कालीन महाप्रबंधक से कनिष्ठ थे। ऐसे में उनके द्वारा निष्पक्ष जांच किए जाने को लेकर आपत्ति जताई गई। उन्होंने यह भी कहा कि समिति में कोई महिला सदस्य नहीं थी।
शिकायतकर्ता ने क्या लगाए थे आरोप
शिकायतकर्ता वर्ष 2008 से निगम में स्टेनो टाइपिस्ट के पद पर कार्यरत हैं। उन्होंने तत्कालीन महाप्रबंधक पर कार्यालय में अनुचित व्यवहार, अशोभनीय इशारे और आपत्तिजनक प्रस्ताव देने के आरोप लगाए थे।
हालांकि, इन आरोपों की नई जांच अभी होनी है। हाईकोर्ट के आदेश का मुख्य आधार पुरानी आंतरिक शिकायत समिति के गठन में सामने आई कानूनी खामी रही।
समिति के गठन पर हाईकोर्ट ने क्या कहा
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने आंतरिक शिकायत समिति के गठन से जुड़े कानूनी प्रावधानों पर गौर किया। कोर्ट ने कहा कि समिति में वरिष्ठ महिला अधिकारी को पीठासीन अधिकारी बनाया जाना जरूरी है। इसके अलावा समिति में कम से कम आधे सदस्य महिलाएं होना भी आवश्यक है।
निगम की ओर से दलील दी गई कि महिला कर्मचारियों की संख्या कम होने के कारण समिति में महिला सदस्यों को शामिल नहीं किया जा सका था। इस पर हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि ऐसी स्थिति में किसी दूसरे कार्यालय या प्रशासनिक इकाई से वरिष्ठ महिला अधिकारी को समिति में शामिल किया जा सकता था।
पुरानी जांच और रिपोर्ट क्यों हुई शून्य?
हाईकोर्ट ने समिति के मूल गठन को ही दोषपूर्ण पाया। जब समिति का गठन कानून के अनुरूप नहीं था, तो उसके आधार पर हुई जांच की वैधता पर भी सवाल खड़ा हुआ। इसी आधार पर कोर्ट ने पुरानी जांच और उससे तैयार रिपोर्ट को शून्य घोषित कर दिया।
अब मामले की जांच नए सिरे से होगी। इसके लिए कानून के अनुरूप नई आंतरिक शिकायत समिति गठित करनी होगी और शिकायत में लगाए गए आरोपों की निर्धारित प्रक्रिया के तहत दोबारा जांच की जाएगी।











