CGPSC 2003 : भर्ती घोटाले की जांच फिर शुरू, उत्तर पुस्तिकाओं में हेरफेर के आरोप; 5 अधिकारियों पर चार्जशीट की तैयारी

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CGPSC 2003:  भर्ती मामले की 23 साल बाद EOW ने जांच फिर शुरू की। उत्तर पुस्तिका हेरफेर समेत कथित अनियमितताओं में 5 अधिकारियों पर चार्जशीट की तैयारी।

 

रायपुर।CG PSC 2003 : छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग (CGPSC) की वर्ष 2003 की भर्ती परीक्षा में कथित अनियमितताओं का मामला करीब 23 साल बाद एक बार फिर जांच के दायरे में आ गया है। एसीबी-ईओडब्ल्यू ने लंबे समय से लंबित इस मामले की फाइलें दोबारा खोली हैं और जांच शुरू कर दी है। इसके लिए डीएसपी रैंक के अधिकारियों को जांच अधिकारी बनाया गया है।

मामले में जल्द ही पांच तत्कालीन अधिकारियों के खिलाफ चार्जशीट पेश किए जाने की चर्चा है। हालांकि, अधिकारियों की चयन प्रक्रिया को प्रभावित करने से जुड़े कुछ पहलुओं की जांच फिलहाल नहीं की जाएगी, क्योंकि इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का स्टे है। ऐसे में ईओडब्ल्यू की जांच का दायरा मुख्य रूप से भर्ती में कथित गड़बड़ी और आर्थिक अनियमितताओं तक सीमित रहेगा।

23 साल पुरानी भर्ती परीक्षा फिर जांच के घेरे में

छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद हुई शुरुआती पीएससी परीक्षाओं में शामिल सीजीपीएससी-2003 की भर्ती प्रक्रिया को लेकर तीन अभ्यर्थी पिछले करीब 23 वर्षों से कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं। इनमें कवर्धा की वर्षा डोंगरे, चमन सिन्हा और राजनांदगांव के रविंद्र सिंह शामिल हैं।
तीनों ने तत्कालीन भर्ती में चयनित 147 डिप्टी कलेक्टर, डीएसपी, आबकारी सहित अन्य अधिकारियों के चयन को चुनौती दी थी।

मामले की सुनवाई के दौरान बिलासपुर हाईकोर्ट ने वर्ष 2016 में उत्तर पुस्तिकाओं में कथित हेरफेर और अपात्र अभ्यर्थियों को लाभ पहुंचाने से जुड़े आरोपों को गंभीर माना था। कोर्ट के फैसले से 147 अधिकारियों की नियुक्तियों पर असर पड़ने की स्थिति बनी थी। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जहां चयनित अधिकारियों को स्टे मिला। इस मामले से जुड़े विभिन्न पहलू अभी न्यायिक विचाराधीन हैं।

इन 5 तत्कालीन अधिकारियों की भूमिका की जांच

ईओडब्ल्यू की दोबारा शुरू हुई जांच में उस समय पीएससी की भर्ती प्रक्रिया से जुड़े पांच पदाधिकारियों की भूमिका पर फोकस किया जा रहा है। वर्ष 2003 में अशोक दरबारी पीएससी के चेयरमैन थे। वहीं बीपी कश्यप परीक्षा नियंत्रक थे। इसके अलावा खेलनराम जांगड़े और अमोल सिंह सलाम सदस्य के रूप में पदस्थ थे।

परीक्षा से जुड़े अन्य महत्वपूर्ण पदों पर उप परीक्षा नियंत्रक और विधि सलाहकार भी जिम्मेदारियों में थे। एजेंसी इन पदों से जुड़े अधिकारियों की परीक्षा आयोजन से लेकर चयन प्रक्रिया तक की भूमिका की जांच कर रही है।

0.ड्राई रन में सामने आए थे चौंकाने वाले आंकड़े

ईओडब्ल्यू की प्रारंभिक जांच और मूल डेटा की दोबारा गणना यानी ड्राई रन में भर्ती प्रक्रिया को लेकर कई विसंगतियां सामने आने का दावा किया गया था।

0. जांच के अनुसार कहां गडबड़ी

1- 17 अपात्र अभ्यर्थियों के चयनित होने की बात सामने आई।
2- 17 योग्य अभ्यर्थी चयन से बाहर रह गए।
3-56 अभ्यर्थियों के पद और मेरिट क्रम में बदलाव पाया गया।
4-52 अपात्र अभ्यर्थियों को इंटरव्यू के लिए बुलाने का आरोप है।
5- इतने ही पात्र अभ्यर्थियों को इंटरव्यू का अवसर नहीं मिलने की बात कही गई।
6- योग्य अभ्यर्थियों की प्रेफरेंस शीट में कथित जालसाजी के आरोप भी जांच का हिस्सा हैं।

इन तथ्यों की जांच के आधार पर भर्ती प्रक्रिया में गड़बड़ी की आशंका जताई गई थी।

0.ज्यादा अंक के बावजूद वर्षा डोंगरे का नहीं हुआ चयन

मामले की याचिकाकर्ता वर्षा डोंगरे से जुड़ा मामला भी जांच में महत्वपूर्ण बताया गया है। एससी वर्ग से आने वाली वर्षा डोंगरे ने 1290.41 अंक हासिल किए थे। दावा है कि उनके अंक चयनित पांच अभ्यर्थियों से अधिक थे, इसके बावजूद उनका चयन नहीं हुआ। उनकी प्रेफरेंस शीट में आबकारी उप निरीक्षक पद के सामने की गई कथित काट-छांट को लेकर फोरेंसिक जांच भी हुई। इसमें लिखावट और स्याही को लेकर सवाल उठे थे।

स्केलिंग और आरक्षण पर भी उठे सवाल

जांच में परीक्षा के अंकों की स्केलिंग को लेकर भी कथित अनियमितता सामने आने की बात कही गई। मानव विज्ञान विषय में दो अभ्यर्थियों ने समान 200 वास्तविक अंक हासिल किए थे, लेकिन स्केलिंग के बाद दोनों के अंकों में बड़ा अंतर पाया गया। एक अभ्यर्थी के स्केल्ड अंक 170.01, जबकि दूसरे के 239.22 बताए गए। इस अंतर को लेकर स्केलिंग प्रक्रिया पर सवाल उठे थे।

इसके अलावा आरक्षण प्रक्रिया में भी कथित गड़बड़ी के आरोप लगे। जांच में एक अनारक्षित अभ्यर्थी को एसटी वर्ग में शामिल कर राज्य लेखा सेवा का पद देने का आरोप लगाया गया, जिससे एसटी वर्ग के अभ्यर्थियों के प्रभावित होने की बात सामने आई।

इसी तरह डीएसपी के पांच पदों में एक अनारक्षित युवती के चयन को लेकर भी सवाल उठे थे। दावा था कि ओबीसी प्रतीक्षा सूची के एक अभ्यर्थी का उस पद पर दावा बनता था।

0.23 साल की जांच के दौरान कई अधिकारी बन चुके हैं IAS-IPS

सीजीपीएससी-2003 भर्ती मामले की जांच लंबे समय तक चलती रही। इस दौरान विवादित चयन वाले कई अभ्यर्थी आगे चलकर आईएएस-आईपीएस अधिकारी बन चुके हैं या उच्च वेतनमान प्राप्त कर रहे हैं। ऐसे में अब दोबारा शुरू हुई जांच का तत्काल प्रभाव इन अधिकारियों की नियुक्ति या पद पर पड़ेगा या नहीं, यह न्यायिक प्रक्रिया और जांच के परिणाम पर निर्भर करेगा। फिलहाल ईओडब्ल्यू मुख्य रूप से उस समय की भर्ती प्रक्रिया में जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका और कथित आर्थिक एवं प्रक्रियागत अनियमितताओं की जांच कर रही है।

0.समाधान शिविर में मामला ले जाने की कोशिश भी हुई

सीजीपीएससी-2003 मामले को सुप्रीम कोर्ट में आयोजित होने वाले समाधान शिविर के जरिए निपटाने का प्रयास भी किया गया था। इसके लिए सभी संबंधित पक्षों की सहमति जरूरी थी। बताया गया कि तीनों याचिकाकर्ताओं ने तीन बार मामले को समाधान शिविर में ले जाने से इनकार किया। समाधान शिविर में पक्षों की आपसी सहमति से विवाद का निपटारा किया जाता है। सहमति नहीं बनने के कारण मामला उसी तरह न्यायिक प्रक्रिया में आगे बढ़ता रहा।

EOW ने कहा- पुराने मामलों का किया जा रहा निपटारा

एसीबी-ईओडब्ल्यू के डायरेक्टर अमरेश मिश्रा ने कहा कि सीजीपीएससी-2003 में हुई कथित गड़बड़ी की जांच फिर शुरू की गई है। उन्होंने बताया कि मामला कई वर्षों से लंबित है और पुराने मामलों की जांच कर उनका निपटारा किया जा रहा है। इस मामले में अब जांच किस दिशा में आगे बढ़ती है और पांच अधिकारियों के खिलाफ चार्जशीट कब पेश होती है, इस पर सभी की नजरें हैं।

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