
कोरबा।Korba Multilevel Parking Traffic Jam शहर को जाम से राहत दिलाने के उद्देश्य से बनाई गई समृद्धि पार्किंग एंड ट्रेड सेंटर (मल्टीलेवल पार्किंग) फिलहाल अपने मकसद पर खरी उतरती नजर नहीं आ रही है। करीब 15 करोड़ रुपये के टेंडर से शुरू हुई यह परियोजना लागत बढ़ते-बढ़ते 16.84 करोड़ रुपये तक पहुंच गई और लगभग 15 साल बाद बनकर तैयार हुई। लेकिन विडंबना यह है कि उद्घाटन के सात दिन बाद भी पार्किंग में एक भी वाहन नहीं पहुंचा, जबकि बाहर सड़क पर पहले की तरह बेतरतीब पार्किंग और रोजाना जाम की स्थिति बनी हुई है।
पावर हाउस रोड पर दुकानों के सामने वाहन खड़े करने की पुरानी आदत अब भी नहीं बदली है। सुनालिया नहर पुल और आसपास का इलाका व्यस्त समय में रोज जाम की चपेट में रहता है। इसका सबसे ज्यादा खामियाजा रेलवे स्टेशन जाने वाले यात्रियों को भुगतना पड़ता है। कई बार लोग जाम में फंसने के कारण समय पर स्टेशन नहीं पहुंच पाते और उनकी ट्रेन तक छूट जाती है।
करोड़ों रुपये खर्च कर बनाई गई मल्टीलेवल पार्किंग फिलहाल सूनी पड़ी है। संचालन के लिए निजी एजेंसी ने कर्मचारियों की तैनाती कर दी है, लेकिन एक सप्ताह में एक भी वाहन पार्किंग तक नहीं पहुंचा। दूसरी ओर सड़क किनारे अव्यवस्थित पार्किंग का सिलसिला लगातार जारी है।
माना जा रहा है कि पार्किंग और मुख्य बाजार के बीच दूरी इसकी सबसे बड़ी चुनौती है। लोग दुकानों के सामने वाहन खड़ा कर सीधे खरीदारी करना अधिक सुविधाजनक समझते हैं। नगर निगम की योजना के अनुसार पार्किंग से बाजार तक मुफ्त ई-रिक्शा सेवा उपलब्ध कराई जानी थी, ताकि लोगों को पैदल चलने की परेशानी न हो। हालांकि उद्घाटन के एक सप्ताह बाद भी यह सुविधा शुरू नहीं हो सकी है।
शहरवासियों का कहना है कि केवल पार्किंग बनाकर समस्या का समाधान नहीं होगा। जब तक सड़क किनारे अवैध पार्किंग पर सख्ती नहीं होगी और पार्किंग तक पहुंचने के लिए सुविधाजनक व्यवस्था विकसित नहीं की जाएगी, तब तक करोड़ों रुपये की यह परियोजना अपने उद्देश्य को हासिल नहीं कर पाएगी।
नगर निगम आयुक्त आशुतोष पांडेय का कहना है कि समृद्धि पार्किंग एंड ट्रेड सेंटर में जल्द आवश्यक सुविधाएं विकसित की जाएंगी। पार्किंग की उपयोगिता बढ़ाने और आमजन को इसका लाभ दिलाने के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं।
अब बड़ा सवाल यह है कि 15 साल की प्रतीक्षा और करोड़ों रुपये खर्च करने के बाद बनी यह मल्टीलेवल पार्किंग आखिर शहर को जाम से कब राहत दिलाएगी, या फिर यह भी सरकारी योजनाओं की लंबी फेहरिस्त में शामिल एक और अधूरा सपना बनकर रह जाएगी?






