
कोरबा।BALCO Administration Intervention राजनीति का एक पुराना नियम है, निशाना कहीं और लगाया जाता है और तीर कहीं और जाकर लग जाता है। हाल ही में एक पूर्व मंत्री की प्रेस वार्ता में भी कुछ ऐसा ही हुआ, जहां विरोधियों पर हमला करते-करते उन्होंने व्यवस्था का पूरा एक्स-रे जनता के सामने रख दिया।
पिछले दिनो नेताजी अपने कार्यकाल का बखान करते हुए बता रहे थे कि कैसे वे बालको, एनटीपीसी और एसईसीएल जैसी कंपनियों से करोड़ों रुपये का सीएसआर फंड लाकर विकास कार्य कराते थे। लेकिन वर्तमान व्यवस्था पर तंज कसते हुए उन्होंने कहा कि आज के नेता जनहित छोड़कर स्वहित में उलझ गए हैं।
इस बयान ने जनता को सोचने पर मजबूर कर दिया। अगर पहले सीएसआर से विकास की गंगा बहती थी और आज उसकी रफ्तार धीमी है, तो आखिर विकास का रास्ता बदल कहां गया?
पूरी कहानी का सबसे दिलचस्प मोड़ तब आया, जब नेताजी ने कोरबा कलेक्टर की तारीफ करते हुए कहा, “वो तो भला हो बड़े साहब का, जिन्होंने बालको का कान पकड़कर 30 करोड़ रुपये सड़क के लिए निकलवा लिए।”
बस, यही एक लाइन पूरे घटनाक्रम की जान बन गई। कॉर्पोरेट दुनिया जिसे सीएसआर समन्वय कहती है, नेताजी ने उसे ठेठ देसी अंदाज में “कान-पकड़ू कूटनीति” का नाम दे दिया।
अब जनता की आंखों के सामने एक ही दृश्य घूम रहा है कि बंद कमरे में कंपनी के अधिकारी बैठे हैं और बड़े साहब सिंघम स्टाइल में कह रहे हैं, “निकालो 30 करोड़!” और अगले ही पल चेक तैयार हो जाता है।
अब जनता असमंजस में है कि शहर के विकास के लिए ज्यादा जरूरी क्या है सीएसआर नीति, नेताओं के वादे या फिर ऐसा कोई “बड़ा साहब”, जिसके पास जरूरत पड़ने पर बड़े-बड़ों का कान उमेठने का हुनर हो।






