Tribal Department Scam : 32,000 रुपए का एक स्टील जग…! आदिवासी बच्चों के हक पर डाका… 51 लाख का घोटाला उजागर

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रायपुर, 15 जुलाई। Tribal Department Scam : छत्तीसगढ़ सरकार के आदिवासी विकास विभाग में एक चौंकाने वाला घोटाला सामने आया है। आदिवासी बच्चों के छात्रावासों और स्कूलों के लिए जो बजट शिक्षा, भोजन और मूलभूत सुविधाओं पर खर्च होना था, उसी राशि से ₹32,000 की दर से स्टील के जग खरीदे गए। इस घोटाले की सीधी ज़िम्मेदारी तत्कालीन आदिवासी विकास मंत्री विष्णुदेव साय और संबंधित विभागीय अधिकारियों पर आ रही है।

दस्तावेज़ों के अनुसार, विभाग ने 160 स्टील जगों की खरीदी पर ₹51 लाख से अधिक की राशि खर्च की है। यह खरीद “छात्रावासों की रसोई व्यवस्था” के नाम पर की गई बताई जा रही है, लेकिन कीमत सुनकर हर कोई हैरान है। यह रकम उन बच्चों के लिए थी जिनका जीवन पहले ही गरीबी और सामाजिक उपेक्षा से जूझ रहा है। यह न केवल सरकारी धन की बर्बादी है, बल्कि एक नैतिक अपराध भी है।

कांग्रेस का तंज 

छत्तीसगढ़ में आदिवासी बच्चों के लिए भेजी गई सरकारी राशि से ₹32,000 का एक स्टील का जग खरीदने की खबर सामने आने के बाद कांग्रेस ने राज्य की भाजपा सरकार पर तीखा हमला बोला है।

कांग्रेस प्रवक्ता ने तंज कसते हुए कहा, “विष्णुदेव साय जी बताएं, ये स्टील का जग था या कोई ‘सोने का कलश’ जो ₹32,000 में खरीदा गया?” “क्या आदिवासी छात्रावासों में अब झूठा जग भी VIP ट्रीटमेंट पाएगा? या फिर ये पैसा सीधे ‘भ्रष्टाचार के घड़े’ में गिरा दिया गया?”

कांग्रेस ने यह भी आरोप लगाया कि भाजपा की सरकार में “हर घोटाले को धर्म, विकास और परंपरा के पर्दे में छिपाने की आदत बन चुकी है।” आदिवासी समाज के साथ यह सीधा धोखा है। “बेटियों को राशन नहीं, लेकिन स्टील का जग ₹32,000 का! यही है भाजपा का ‘सुशासन मॉडल’?”

INC Chhattisgarh (@INCChhattisgarh) / X

मुख्य बिंदु

  • खरीदी गई वस्तु: स्टील का जग

  • कीमत (प्रति नग): ₹32,000

  • कुल संख्या: 160

  • कुल खर्च: ₹51 लाख से अधिक

  • प्राप्ति स्थल: आदिवासी बालक छात्रावास, बस्तर, सरगुजा, रायगढ़ संभाग

असल सवाल

क्या एक आम स्टील का जग, जिसकी बाजार में कीमत ₹300–₹500 होती है, सरकारी खरीद में 100 गुना महंगा हो सकता है? क्या अधिकारी और मंत्री इस फर्जीवाड़े से अनजान थे? बच्चों के अधिकारों पर ऐसा खुला डाका आखिर कब तक चलता रहेगा?

इस घोटाले में सरकार की जवाबदेही तय होनी चाहिए, क्योंकि यह रकम उन गरीब आदिवासी छात्रों के नाम पर केंद्र व राज्य सरकार से जारी की गई थी, जो पहले से ही संसाधनों के लिए जूझ रहे हैं।

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