Weekly Articles kataksha : मैनू इश्क दा लाग्या ऐसा रोग..कुर्सी हो गई गोल,शर्मा से वर्मा और निगम की तिजोरी…तीन बटा चार… प्रॉपर्टी डीलर के बड़े ठाठ!अल्पविराम और पूर्णविराम,फाइलों से ज्यादा तेज हाथ-पांव

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Weekly Articles kataksh : कटाक्ष के जरिए पढ़िए राजनीति, प्रशासन, समाज और व्यवस्था पर तीखे व्यंग्य, बेबाक विश्लेषण और रोचक अंदाज में उठाए गए सवाल।

मैनू इश्क दा लाग्या ऐसा रोग… कुर्सी हो गई गोल

 

Weekly Articles kataksha : ऊर्जाधानी में इन दिनों बिजली के अलावा एक और चीज खूब दौड़ रही है इश्क की खबर। फर्क बस इतना है कि बिजली का झटका मीटर देता है और इश्क का झटका सीधे कुर्सी तक पहुंच गया। जिले के एक ऊर्जावान थानेदार साहब को लगा झटका चर्चा में है।

साहब कभी महकमे में अपने रसूख को लेकर काफी चर्चित थे। खास होने का अंदाज भी कुछ ऐसा था कि मातहतों को दूर से ही समझ आ जाता था कि साहब का मूड आज किस दिशा में है। मगर कहते हैं न, इश्क और बारिश कब किस करवट बरस जाएं, कोई नहीं जानता। यहां तो इश्क बरसा और कुर्सी बह गई।

इन दिनों पुलिस महकमे में एक पुराना फिल्मी गीत फिर से हिट हो गया है… मैनू इश्क दा लाग्या रोग…! दिल का मामला महकमे के भीतर ही था और दिलरुबा भी वर्दी में थीं। यानी मामला फिल्मी लव स्टोरी से थोड़ा ज्यादा हाई-प्रोफाइल था।

महकमे के कानों से होकर इसकी खबर कप्तान और गृहमंत्री तक पहुंच गई। मामला किसी तरह शांत हुआ, मगर पुलिस महकमे में खबरें वायरलेस से भी तेज दौड़ती हैं। थाने की दीवारों के कान तो होते ही हैं, यहां तो कानों के भी अपने-अपने मोबाइल और व्हाट्सऐप ग्रुप होते हैं। ऊपर से ऐसा संदेशा आया कि साहब की कुर्सी सीधे लाइन की तरफ खिसक गई।

अब साहब लाइन में हैं और महकमे में उनके इश्क की कहानी ऑफ-द-रिकॉर्ड है। कोई इसे प्रेम का साइड इफेक्ट बता रहा है तो कोई इसे कुर्सी का दुर्भाग्य। कुछ थाना स्टाफ तो मौका मिलते ही मुस्कुराकर पूछ लेते हैं… साहब, इश्क में अगला पोस्टिंग ऑर्डर कब है?

अब साहब के करीबी हंस-हंसकर हाल ही में रिलीज हुई फिल्म ‘टॉक्सिक’ का डायलॉग सुना रहे हैं..आदमी को हर फैसले की सही कीमत चुकानी पड़ती है। इस कहानी का सबसे बड़ा सबक भी शायद यही है कि पुलिस विभाग में कानून की किताब चाहे कितनी मोटी हो, लेकिन इश्क में कुर्सी भी जा सकती है।

 

शर्मा से वर्मा और निगम की तिजोरी…

 

नगर निगम के गलियारों में इन दिनों फाइलों से ज्यादा चर्चा नामों की है। पुराने दौर के शर्मा जी से लेकर नए दौर के वर्मा जी तक, निगम की लंबी प्रशासनिक यात्रा को जानने वाले अब दोनों के कार्यकाल की तुलना करने में जुटे हैं। कोई इसे संयोग बता रहा है तो कोई निगम की परंपरा!

कहानी शुरू होती है अविभाजित मध्यप्रदेश के जमाने से। साडा कार्याकाल में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी के पद से नौकरी की शुरुआत करने वाले मिस्टर शर्मा जी आगे चलकर नगर निगम के आयुक्त पद तक पहुंचे और वहीं से सेवानिवृत्त हुए। यानी नौकरी की पहली सीढ़ी से लेकर निगम की सबसे महत्वपूर्ण प्रशासनिक कुर्सियों में से एक तक का सफर कोरबा की सरकारी व्यवस्था को करीब से देखते हुए पूरा हुआ।

अब तस्वीर में वर्मा जी हैं। साहब पूर्व सांसद के रिश्तेदार है सो नाकेदार के पद पर संविदा भर्ती हुए और सेटिंग को सीढ़ी चढ़ते हुए पहले रेगुलर होते हुए पूरा सेवाकाल कोरबा में बिताते उपायुक्त और अपर आयुक्त की कुर्सी तक पहुंच चुके हैं। अनुभव की लंबी पारी और निगम की अंदरूनी कार्यप्रणाली की गहरी समझ, दोनों के खाते में बताई जाती है।

यही वजह है कि आज निगम के गलियारों में एक पुरानी कहावत नए अंदाज में सुनाई दे रही है।“कुर्सी बदलती रहती है, लेकिन निगम की चाबी उन्हीं हाथों में रहती है, जो ताले की भाषा जानते हों!” राजनीति के जानकार तो इसे और आगे ले जाते हैं। उनका कहना है कि निगम में अधिकारी सिर्फ फाइलें नहीं संभालते, वे सत्ता के गलियारों की नब्ज भी पहचानते हैं। कौन सी फाइल कितनी तेजी से चलेगी, किस मुद्दे पर चुप्पी बेहतर है और किस दरवाजे पर दस्तक देनी है, यह अनुभव की किताब में कहीं दर्ज नहीं होता। इसीलिए शर्मा से वर्मा तक की तुलना महज दो अधिकारियों की तुलना नहीं रह गई है। चर्चा अब इस बात की है कि निगम की तिजोरी की चाबी आखिर किसके पास रही,चर्चा उस अदृश्य चाबी की है, जिसके बारे में हर कोई बात करता है, लेकिन जिसे किसी ने सार्वजनिक रूप से देखा नहीं है।

हालांकि, चाबी किसके पास है यह तो निगम के दस्तावेज ही बेहतर बता सकते हैं। गलियारों की चर्चा को प्रमाण मानना जल्दबाजी होगी। लेकिन इतना जरूर है कि शर्मा से वर्मा तक का सफर निगम की प्रशासनिक कहानी का ऐसा अध्याय है, जिसे पढ़ने वालों की दिलचस्पी अब भी कम नहीं हुई है।

 

तीन बटा चार… प्रॉपर्टी डीलर के बड़े ठाठ!

 

पुराने जमाने का मशहूर गाना था, “अनहोनी को होनी कर दें, होनी को अनहोनी…”। कोरबा के जमीन बाजार में इन दिनों इसका नया डिजिटल वर्जन सुनाई दे रहा है। फर्क इतना है कि यहां अमर-अकबर-एंथनी की जगह रसूखदार, राजस्व के राजदार और प्रॉपर्टी डीलर की तिकड़ी चर्चा में है।

कहानी डीडीएम रोड स्थित राम मंदिर के पास खसरा नंबर 3/4 की करीब 40 डिसमिल जमीन से जुड़ी है। चर्चा है कि मिशल रिकॉर्ड में जमीन दो हिस्सों में दर्ज थी, लेकिन कागजी गणित में उसे तीन हिस्सों में बदलकर बिक्री अनुमति की अर्जी तक पहुंचा दी गई। यानी रिकॉर्ड कुछ और, जमीन का गणित कुछ और!

मामला तब दिलचस्प हुआ जब प्रशासन ने पुराने रिकॉर्ड खंगाले। सवाल उठा कि जो जमीन रिकॉर्ड में सरकारी बताई जा रही है, वह आखिर निजी स्वामित्व तक कैसे पहुंच गई? बिक्री अनुमति की प्रक्रिया पर ब्रेक लगा तो मोनू ने  प्रभाव और दबाव बनाते हुए बड़े साहब को गुमराह करने की कोशिश की ,लेकिन प्रशासन ने फाइल को आगे बढ़ाने के बजाय रिकॉर्ड को ही आगे रखा।

अब जमीन की बिक्री का कथित प्लान फिलहाल ठंडे बस्ते में है। प्रॉपर्टी कारोबार से जुड़े लोगों में बेचैनी है और शहर में चर्चा का बाजार गर्म।

कागजों की दुनिया भी बड़ी अद्भुत होती है। खेत की मेड़, जमीन की मिट्टी अपनी जगह रहती है, मगर फाइल के पन्नों पर रकबा कभी इधर तो कभी उधर दिखाई देने लगे तो सवाल उठना स्वाभाविक है।

सवाल सिर्फ 40 डिसमिल जमीन का नहीं है। सवाल उस कागजी जादू का है, जिसमें सरकारी जमीन निजी होने लगे और खसरे के टुकड़ों का गणित रिकॉर्ड से ज्यादा कल्पनाशील नजर आए।इसीलिए कोरबा में इन दिनों एक ही सवाल तैर रहा है…“खसरा नंबर 3/4 में आखिर प्रॉपर्टी डीलर के इतने बड़े ठाठ कैसे हो गए भाई?”

 

दीपक बैज के अल्पविराम और पूर्णविराम के बीच सुखदेव भगत

 

दो दिन पहले खबर आई कि एआईसीसी ने छत्तीसगढ़ का प्रभारी बदल दिया। सचिन पायलट को पंजाब, भूपेश बघेल को असम और सुखदेव भगत को छत्तीसगढ़ का प्रभारी बनाया गया। इन तीनों नेताओं का छत्तीसगढ़ से सीधा कनेक्शन है। सचिन पायलट छत्तीसगढ़ कांग्रेस के प्रभारी थे, बघेल पूर्व सीएम और सुखदेव भगत पड़ोसी राज्य झारखंड के बड़े आदिवासी नेता हैं। लेकिन इसके पीछे चौथी खबर पीसीसी चीफ दीपक बैज से जुड़ी है।

राहुल गांधी अगले महीने बस्तर के दौरे पर आ सकते हैं। राहुल के दौरे से ठीक पहले सुखदेव भगत को छत्तीसगढ़ प्रभारी बनाए जाने के पीछे कांग्रेस का सोचा-समझा फैसला है। असल में भगत के जरिए कांग्रेस यहां आदिवासी वोटों को अपने पक्ष में साधने की तैयारी में है। झारखंड छत्तीसगढ़ से सटा हुआ है और सरगुजा के आदिवासी समाज के लोगों की झारखंड में नाते-रिश्तेदारियां भी हैं। कांग्रेस को उम्मीद है कि इसका असर सरगुजा से लेकर बस्तर तक देखने को मिलेगा।

अब पीसीसी चीफ दीपक बैज से जुड़ी चौथी खबर भी जाने लिजिए…खबरीलाल की मानें तो प्रदेश कांग्रेस में दीपक बैज की पारी लंबी चलने वाली है। कांग्रेस बस्तर और सरगुजा को एक साथ साधना चाह रही है, जहां पिछले विधानसभा चुनाव में पार्टी को बड़ी हार का सामना करना पड़ा था।

फिलहाल पीसीसी चीफ बदले जाने की खबर राजीव भवन में भी मंद पड़ गई है। कटाक्ष के पिछले कॉलम में खबरीलाल ने दीपक बैज के कार्यकाल को लेकर जो अल्पविराम की खबर दी थी, वह अब पूर्णविराम में बदलने जा रही है। फिलहाल हुए बदलाव से तो ऐसा ही दिख रहा है।

 

फाइलों से ज्यादा तेज हाथ-पांव

 

छत्तीसगढ़ में इन दिनों फाइलों से ज्यादा हाथ-पांव तेजी से चल रहे हैं। पिछले हफ्ते मंत्री लक्ष्मी राजवाड़े के पीए पर लहपटरा टोल प्लाजा के कर्मचारी की बेवजह पिटाई के आरोप लगे। इस घटना का असल कसूरवार टोल का बूम था, लेकिन इसकी सजा कर्मचारी को भुगतनी पड़ी।

 

देखा जाए तो मामला आम हादसे जैसा था। हुआ ये कि लहपटरा टोल प्लाजा पर काफिले की आगे चल रही गाड़ी ने जब टोल पार कर लिया, तब ठीक पीछे चल रही मंत्री की गाड़ी के ऊपर टोल का बूम अचानक गिर गया। इससे गाड़ी हल्की क्षतिग्रस्त हो गई। बूम गिरते ही मंत्री के साथ चल रहे कर्मचारी और सुरक्षाकर्मी वाहन से उतरे और सीधे टोल बूथ पर पहुंच गए।

आखिर मंत्री के रसूख का सवाल था। टोलकर्मी के साथ गाली-गलौज और मारपीट हुई और कई थप्पड़ जड़ दिए गए। हालांकि, बाद में यह कहा गया कि मंत्री के पीए मारपीट में शामिल नहीं थे। वीडियो में जो व्यक्ति दिख रहा है, वह वाहन चालक है।

सवाल ये है कि क्या मंत्री के काफिले में चलने वाला स्टाफ उनके कारकेड से अलग है? इसका जवाब तो मंत्री ही बता पाएंगी। लेकिन इतना तो तय है कि फाइलों से ज्यादा तेजी से हाथ-पांव चलने की खबर से कर्मचारियों में गुस्सा है।

 

    ✍️ अनिल द्विवेदी, ईश्वर चन्द्रा

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