Titwala Shakuntala Siddhivinayak Mahaganpati Temple : राजा दुष्यंत और शकुंतला से जुड़ी है गणपति मंदिर की कथा, आपको भी मिलेगा खोया प्यार, ऐसी है सिद्धिविनायक की मान्यता,जानें इसकी खासियत

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Titwala Shakuntala Siddhivinayak Mahaganpati Temple

मुंबई, 14 सितंबर। Titwala Shakuntala Siddhivinayak Mahaganpati Temple : मुंबई से कुछ दूर एक ऐसा प्राचीन गणेश मंदिर है, जिसका संबंध महाभारत काल की शकुंतला की कथा से जोड़ा जाता है। ठाणे जिले के कल्याण तालुका के टिटवाला में स्थित सिद्धिविनायक महागणपति मंदिर आस्था के साथ-साथ अपनी पौराणिक और ऐतिहासिक मान्यताओं के लिए भी खास माना जाता है। महाराष्ट्र पर्यटन विभाग भी टिटवाला गणेश मंदिर को ठाणे के प्रमुख धार्मिक स्थलों में शामिल करता है।

स्थानीय मान्यता के अनुसार, इस मंदिर की स्थापना शकुंतला ने की थी। बाद में यह मंदिर एक तालाब के नीचे दब गया और पेशवा काल में तालाब की सफाई के दौरान गणेश प्रतिमा के मिलने की मान्यता है। हालांकि शकुंतला द्वारा मंदिर स्थापना जैसी बातें पौराणिक और स्थानीय मान्यताओं पर आधारित हैं, जिन्हें ऐतिहासिक तथ्य के रूप में नहीं बल्कि मान्यता के रूप में देखना चाहिए।

शकुंतला और टिटवाला गणपति की पौराणिक कथा

टिटवाला के सिद्धिविनायक महागणपति मंदिर की सबसे खास बात इसकी शकुंतला से जुड़ी कथा है। पौराणिक मान्यता के अनुसार, शकुंतला महर्षि विश्वामित्र और मेनका की पुत्री थीं और उनका विवाह राजा दुष्यंत से हुआ था। ऋषि दुर्वासा के श्राप के कारण दुष्यंत उन्हें भूल गए थे। ऐसी स्थिति में गणपति की आराधना से जुड़ी कथा टिटवाला के इस मंदिर से जोड़ी जाती है।

एक प्रचलित मान्यता के अनुसार, शकुंतला को भगवान गणेश की उपासना करने और सिद्धिविनायक मंदिर स्थापित करने की प्रेरणा मिली। कहा जाता है कि उन्होंने अपने पुत्र भरत की सहायता से यहां गणपति की स्थापना की थी। इसी वजह से टिटवाला के महागणपति को श्रद्धालु विशेष रूप से पारिवारिक सुख और वैवाहिक जीवन से जुड़ी मनोकामनाओं के लिए पूजते हैं।

सदियों तक तालाब में दबा रहा मंदिर?

मंदिर से जुड़ी दूसरी रोचक कहानी पेशवा काल की है। मान्यता के अनुसार, समय बीतने के साथ पुराना गणेश मंदिर एक तालाब के नीचे दब गया। बाद में पेशवा माधवराव प्रथम के शासनकाल में क्षेत्र में पानी की समस्या के दौरान तालाब से गाद निकालने का काम शुरू हुआ।

इसी दौरान मिट्टी और गाद के भीतर दबे मंदिर तथा गणेश प्रतिमा का पता चलने की बात कही जाती है। स्थानीय इतिहास से जुड़ी उपलब्ध जानकारियों के अनुसार, पेशवा सरदार रामचंद्र मेहेंदले को प्रतिमा मिलने के बाद मंदिर के पुनर्निर्माण का काम कराया गया। इसके बाद यहां पत्थर का मंदिर बनाया गया।

पेशवा काल के बाद फिर हुआ जीर्णोद्धार

बताया जाता है कि शुरुआती दौर में मंदिर काफी छोटा था और इसमें लकड़ी का सभामंडप था। समय के साथ वह संरचना भी जर्जर हो गई। इसके बाद 1965-66 में मंदिर का फिर से जीर्णोद्धार किया गया और उसी स्थान पर नए मंदिर का निर्माण हुआ।

उपलब्ध स्रोतों में इस निर्माण की लागत ₹2 लाख बताई गई है। यानी आज जिस मंदिर में श्रद्धालु दर्शन करते हैं, उसके पीछे पौराणिक कथा के साथ-साथ कई चरणों में हुए पुनर्निर्माण का इतिहास भी जुड़ा है।

क्यों खास है टिटवाला का सिद्धिविनायक?

टिटवाला महागणपति को लेकर श्रद्धालुओं में कई तरह की आस्थाएं प्रचलित हैं। खास तौर पर इसे पति-पत्नी के बीच मनमुटाव दूर करने और वैवाहिक जीवन से जुड़ी मनोकामनाओं के लिए पूजे जाने वाले गणपति के रूप में माना जाता है। यह धार्मिक विश्वास है, इसकी कोई वैज्ञानिक गारंटी नहीं है।

मंदिर की गणेश प्रतिमा को लेकर भी मणि से जुड़ी मान्यता सुनने को मिलती है। श्रद्धालुओं के बीच यह विश्वास है कि प्रतिमा के माथे और नाभि पर लगी मणि के दर्शन शुभ माने जाते हैं। ऐसी बातें मंदिर की लोक-आस्था और परंपरा का हिस्सा हैं।

गणेश चतुर्थी पर क्यों बढ़ जाती है रौनक?

गणेश चतुर्थी के दौरान टिटवाला मंदिर में श्रद्धालुओं की आवाजाही बढ़ जाती है। महाराष्ट्र पर्यटन विभाग भी गणेश चतुर्थी और संकष्टी चतुर्थी के अवसर पर यहां बड़ी संख्या में भक्तों के आने का उल्लेख करता है।

इसलिए अगर आप गणेश उत्सव के दौरान किसी ऐसे मंदिर में जाना चाहते हैं, जहां धार्मिक आस्था के साथ पौराणिक कथा और इतिहास की झलक भी मिलती हो, तो टिटवाला महागणपति एक दिलचस्प विकल्प हो सकता है।

कहां स्थित है टिटवाला महागणपति मंदिर?

टिटवाला महाराष्ट्र के ठाणे जिले के कल्याण तालुका में स्थित है। मंदिर टिटवाला रेलवे स्टेशन के पास है और रेल मार्ग से पहुंचना अपेक्षाकृत आसान है। मंदिर के आसपास तालाब और शांत परिसर इसकी पहचान का हिस्सा हैं। मुंबई और आसपास के इलाकों से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए यह धार्मिक यात्रा के साथ एक छोटी-सी पर्यटन यात्रा का अनुभव भी बन सकती है।

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