
खाकी का कम हुआ खौफ, इनकी मौज
कहते हैं आदमी को ज़िंदा रखने के लिए तीन चीज़ें ज़रूरी हैं, खाते का बैलेंस, नाम का रुतबा और खाकी का खौफ। पहले दो तो फिर भी जैसे-तैसे चल जाते हैं, लेकिन खाकी का खौफ अगर कम हो जाए तो समाज में “जंगलराज” बन जाता है। पॉवर सिटी कोरबा फिलहाल उसी “जंगलराज” की ओर तेज़ी से बढ़ रही है।
कटघोरा में दिनदहाड़े हत्या ने यह जता दिया कि जो इलाका कभी शांति का पोस्टर बॉय था, वह अब अपराधियों के लिए “ट्रायल ग्राउंड” बन चुका है। जनता कह रही है, “साहब, अपराधी डरते नहीं… बस थाने का रास्ता जानते हैं।”
खाकी का डर जितना मजबूत होता है, जनता का भरोसा उतना ही पुख्ता रहता है। मगर यहां तस्वीर उलटी है। रौब बढ़ने के बजाय घट रहा है। अपराध का बढ़ता ग्राफ ये सिद्ध करता है कि चोर, मनचले और मारपीट करने वालो को पुलिस का खौफ तनिक भी नही है। जिले में घट रहे घटनाओं पर खाकी से जनता का विश्वास हर वारदात के साथ थोड़ा और कमजोर होता जा रहा है।
चर्चा यह भी है कि जिस रफ्तार से जिले में क्राइम ग्राफ ऊपर चढ़ रहा है, उससे सुशासन के दावों पर सवाल खड़े होने लगे हैं। शहर के शांत माहौल में अशांति घोलने वाले और प्रोटेक्शन मनी गैंग फिर से सक्रिय होने लगे हैं। पुलिस की कमजोर पड़ती धार देखकर खुद को डॉन समझने वाले अपराधियों के हौसले बुलंद है और पब्लिक असहाय महसूस कर रही है।
हाल के दिनों में एक के बाद एक हुई हत्याओं ने लोगों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या अब पुलिसिंग धरना प्रदर्शन, रैली और मंत्रियों की सुरक्षा तक सिमट कर रह गई है। सड़कों पर संदेश साफ सुनाई दे रहा है। अपराधियों के हौसले बुलंद है, खाकी का जोर मंद है और वायलेंस पसंद लोगो के लिए चहुं ओर प्रबंध है।
DMF की दूसरी किश्त पर ‘कलेक्शन’ का कमाल
खनिज न्यास (DMF) से स्वीकृत कार्यों की दूसरी किश्त निकलवाना अब प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि विधिवत अनुष्ठान बन चुका है। फाइलें आगे बढ़ाने से पहले मंत्र पढ़े जाते हैं, दक्षिणा तय होती है और तब कहीं जाकर किश्त अवतरित होती है। कहते हैं काजल की कोठरी से कोई बेदाग नहीं निकलता, मगर यहां तो कोठरी के बाहर ही रेट कार्ड टंगा होने की चर्चा है।
पूर्ववर्ती सरकार के DMF घोटाले को कोसते हुए सत्ता तक पहुंची भाजपा सरकार में अब सिस्टम फिर से अपनी पुरानी स्मृति में लौटता दिख रहा है। फर्क बस इतना है कि पहले खुलेआम था, अब फाइलों के बीच सलीके से। सेकेंड इंस्टॉलमेंट के नाम पर विभागों से हो रहा कलेक्शन बता रहा है कि DMF से पैसा निकालना है तो पहले दक्षिणा चढ़ानी होगी। विभागीय अफसर तो ठेकेदारों से साफ साफ कहने लगे है नज़राना दीजिए, फाइल सरकाइए, किश्त पाइए…!
जनता के लिए बना DMF अब अफसरों की ऊपरी आमदनी और चमचमाती जीवनशैली का भरोसेमंद साधन बनता दिख रहा है। सरकार बदली, तो सख्ती का नाटक हुआ, कैमरे चमके, बयान गरजे, मगर कुछ ही महीनों में वही हाथ फिर से गर्म होने लगे। अब फाइल आगे बढ़ाने का चार्ज अलग, किश्त रिलीज़ कराने का रेट अलग मतलब पूरा पैकेज सिस्टम।
जनमानस प्रश्न कर रही है- ” क्या DMF सच में विकास का फंड है, या फिर हर सरकार में अफसरों का भरोसेमंद एटीएम?”….और जवाब संभवतः फाइलों में नहीं,.अफसरों की बढ़ती चमक और घटती शर्म में छिपा है।
प्रोटोकॉल नहीं चेहरा बदलने की जरूरत
छत्तीसगढ़ में अब मंत्रियों और अफसरों को गार्ड ऑफ ऑनर नहीं मिलेगा। सरकार ने अंग्रेजों के जमाने पुराने प्रोटोकॉल को समाप्त कर दिया, इसके पीछे सरकार का तर्क है गार्ड ऑफ ऑनर जैसी औपचारिक जिम्मेदारियों में पुलिस बल की तैनाती से उनकी मूल भूमिका प्रभावित होती है। अब पुलिस कर्मियों को औपचारिक और प्रतीकात्मक ड्यूटी से मुक्त कर केवल पुलिसिंग के काम के लिए तैनात किया जाएगा।
अब केवल राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय महत्वपूर्ण आयोजनों में यह परंपरा जारी रहेगी। गणतंत्र दिवस, स्वतंत्रता दिवस, पुलिस शहीद दिवस, राष्ट्रीय एकता दिवस, पुलिस पासिंग आउट परेड जैसे अवसरों पर तथा संवैधानिक पदों पर आसीन व्यक्तियों और विशिष्ट अतिथियों के लिए प्रोटोकॉल के अनुसार गार्ड ऑफ ऑनर जारी रहेगा।
सरकार की इस पहल का स्वागत है। मगर क्या गार्ड ऑफ ऑनर जैसे परंपरा को बदलने भर से पुलिस का चेहरा बदल जाएगा ?, जरूरत इस बात की है बेसिक पुलिसिंग के लिए पुलिस पब्लिक रिलेशनशिप में भी बदलाव की जरूरत है। अंग्रेजों के जमाने में पुलिस की भूमिका ब्रितानिया राज्य की रक्षा करने और हुकुम बजाने की रही है।
अब अगर सरकार मंत्रियों और अफसरों को गार्ड ऑफ ऑनर की पंरपरा को बंद कर रही है तो उसे इस बात पर भी ध्यान देना चाहिए कि, जिन उद्देश्यों के लिए बदलाव लागू किया गया है उसे बेसिक और सोशल पुलिसिंग से जोड़ा जाए। साथ ही पुलिस पब्लिक रिलेशनशिप को नए सिरे परिभाषित किया जाए ताकि लोगों को विश्वास पुलिस पर बढ़ सके।
सत्ता सियासत, सीडी और वीडियो
कहते हैं जब सत्ता हाथ लगती है तो सियासत खुद बदल जाती है। वैसे भी छत्तीसगढ़ की राजनीति में सत्ता, सियासत, सीडी और वीडियो का गठजोड़ हमेशा से रहा है। और इन सालों में जब चौथे सीएम के रूप में विष्णुदेव साय की सरकार है तब सत्ता के गलियारों में सोशल मीडिया पर कई ऐसे पोस्ट और वीडियो वायरल फिर हो रहे हैं, जिसमें चुनाव फंड के लिए 1,500 करोड़ रुपए वसूले जाने की बात कही जा रही है।
सोशल मीडिया पोस्ट और वीडियो क्यों बना, किसने बनाया, किस लिए बनाया, किसके कहने पर बनाया..ये बड़ा सवाल है। मगर अब इसकी शिकायत भी पुलिस तक पहुंची है। और खबरीलाल की माने तो पुलिस ने इस मामले में कुछ लोगों को पूछताछ के लिए तलब किया है। मगर जांच में क्या मिला ये बाहर नहीं आ पाया है।
बताया जा रहा है कि एक पीआर कंपनी से जुड़े लोगों से पूछताछ की गई है। अब पुलिस वीडियो बनाने, अपलोड करने, शेयर करने और उसे बढ़ाने में शामिल सभी लोगों की पहचान कर रही है। हालांकि इस मामले में बड़े नेता कुछ कहने से बच रहे हैं मगर अंदरखाने में कई तरह की बात गूंज रही है।
खबरीलाल की माने तो इस सोशल मीडिया पोस्ट और वीडियो की शिकायत दिल्ली तक पहुंची है। और, पार्टीस्तर पर इसे गंभीरता से लिया गया है। सच्चाई चाहे जो भी हो मगर छत्तीसगढ़ की सियासत में सीडी और वीडियो का एक्सपीरियंस अच्छा नहीं रहा है। फिलहाल मामला जांच में है और जब जांच रिपोर्ट आएगी तो सच्चाई खुद ब खुद भी समाने आ जाएगी… तब तक इंतजार कीजिए।
सनातन पर तनातनी
बागेश्वर धाम सरकार धीरेंद्र शास्त्री की भिलाई में हो रही हनुमंत कथा इस बार अपने दिव्य दरबार से ज्यादा पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की खुली चुनौती की वजह से चर्चा में है। सनातन के नाम पर जो तनातनी हुई उसकी चर्चा नेशनल मीडिया में हो रही है। पहले सरकारी स्टेट प्लेन का इस्तेमाल फिर धर्म और राजनीति को लेकर छत्तीसगढ़ का माहौल गरमाया हुआ है।
पं धीरेंद्र शास्त्री को लेकर अब कांग्रेस और बीजेपी में तल्ख बयानबाजी हो रही है। कांग्रेस के पूर्व सीएम और पूर्व डिप्टी सीएम, कथा वाचक को बीजेपी का एजेंट और प्रचारक बता रहे हैं। वैसे भी इस वक्त छत्तीसगढ़ धर्मांतरण की आग में सुलग रहा है। और ऐसे में अगर ये कहे कि हर चीज का इलाज चर्च नहीं है। तो बवाल तो मचना ही था।
रही बात हनुमंत कथा की तो हर सनातनी इसमें श्रद्धा रखता है। अगर किसी को ये लगता है कि पं धीरेंद्र शास्त्री बीजेपी के एजेंट और प्रचारक हैं तो इसे राजनीति बयान के नजरिये से कहना सही होता… हनुमंत कथा या हनुमान चालीसा जैसे हिंदुओं के धार्मिक मामलों से इसे नहीं जोड़ा जाना चाहिए।
रही बात हिंदू समाज को एकजुट करना, भक्ति का प्रसार करना और राष्ट्रवाद की भावना जगाना को अंधविश्वास कहना तो..याद रखिये सनातन धर्म में संतों की वाणी को पूज्य माना गया है और जब संतों के बारे में कुछ कहा जाए तो लोगों की भावनाओं का ख्याल भी रखना जरूरी है। और समाज तभी जुड़ेगा जब सनातन के नाम पर तनातनी नहीं बल्कि उसमें श्रद्धा और भक्ति की मिठास घुली हो..जय श्रीराम..।
✍️अनिल द्विवेदी, ईश्वर चंद्रा




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