Election year and trusted officers:कैप्टन कूल हो गए वंडरफूल ,’ये मानचित्रकार है’ जो.. शिक्षक गुनगुना रहे लागी छूटे न अब तो,राम नाम की लूट है लूट सके तो..
कैप्टन कूल का नाम आते ही क्रिकेट मास्टर एमएस धोनी का नाम दिमाग में तेजी से उभर कर आता है। वे विकट से विकटतम परिस्थितियों में भी शांत रहकर बेहतर रणनीति बनाकर टीम को मैच जीतने में सफल रहते हैं। सफल रणनीतिकार होने के कारण उन्हें कैप्टन कूल कहा जाता है। वैसे ही रणनीतिकार औऱ पुलिस की टीम को चैलेंजिग टास्क से उबारने और मर्डर मिस्ट्री से पर्दा हटाने का काम कोरबा के कैप्टन कूल ने किया है।
आम जनमानस का परिचय अब तक उनकी आक्रमक कार्यशैली से था। कानून व्यवस्था में बाधा उत्पन्न करने वालों के लिए वे शूल थे। ऐसा पहली बार हुआ है जब कैप्टन ने शांत रहकर लगातार चुनौतियों से भरे ब्लाइंड मर्डर को सुलझाकर साबित कर दिया की हल्ला मचाने और बल्ला चलाने भर से सफलता नहीं मिलती बल्कि शांत रहकर बिना थके रुके काम करने से जीत सुनिश्चित होती है।
प्रदेश के हॉट सीट बने मर्डर को सुलझाने के बाद अब कप्तान को कैप्टन कूल के साथ साथ वंडरफूल भी कहने लगे हैं। ” कहते हैं रख हौसला वो मन्ज़र भी आएगा, प्यासे के पास चल के समंदर भी आयेगा” इस कहावत को सही साबित करते हुए कप्तान ने 10 तरह की बातें करने वालों की न सिर्फ बोलती बंद कर दी है बल्कि ये सिद्ध कर दिया कि वे हर चुनौतियों का सामना करने के लिए हर पल तैयार हैं।
“ये कौन चित्रकार है”.. ‘ये मानचित्रकार है’ एमबी में उकेर रहे चित्र…
“अपनी तो आँख एक है,इसकी हज़ार है ये कौन चित्रकार है ये कौन चित्रकार है” जितेंद्र अभिनीत मुकेश द्वारा गाया गया यह गीत इन दिनों जिले के चर्चित मानचित्रकार पर फिट है। जिनकी आंख, हाथ, अधिकारियों का साथ हजार हैं क्योंकि लाखों का माल पचाना बारम्बार है।
अब तक आपने कोरे कागज में चित्रकारों को रंग भरते सुना होगा। लेकिन, अब मानचित्रकार एमबी यानि मेजरमेंट बुक में भी चित्र बना रहे हैं। जी हां मामला आदिवासी विकास विभाग के ड्राफ्टमैन यानी सहायक मानचित्रकार का है जो हॉस्टल निर्माण के एमबी में रंग भरकर अपना और ठेकेदारों की जेब भर रहा है। कहा तो यह भी जा रहा है कि उनकी पोस्टिंग एक छोटे कद के महाराज ने कराई है, सो काम भी उन्ही के हिसाब से हो रहा है।
ठीक है भी जब अफसर मेहरबान हो तो मानचित्रकार पहलवान क्यों न हो! वैसे कहा तो यह भी जा रहा है कि उनकी एमबी बुक की जांच हो जाए तो कई ठेकेदारों पर रिकवरी भी हो सकती है लेकिन, बिल्ली के गले मे घंटी बांधे कौन!
चर्चा तो इस बात की भी है कि जिले के महत्वपूर्ण काम भी ड्राफ्टमैन को सौंपने की तैयारी की जा रही है। तभी तो 44 खोखा के निर्माण कार्य का एजेंसी ट्राइबल को बनाया गया है। जिससे विभाग का हिस्सा ज्यादा मिल सके और अपने चहेते ठेकेदारों को मनपसंद काम भी..!
लागी छूटे न अब तो..
“लागी छूटे न अब तो सनम चाहे जाए जिया तेरी कसम”… फिल्म काली टोपी लाल रुमाल का यह गीत शिक्षा विभाग और उसके प्राचार्यों पर सटीक बैठता है। न जाने फेविकोल का ऐसा क्या जोड़ है कि एक ही स्कूल में प्राचार्य दस से बारह बरस तक चिपके हुए हैं। कई ऐसे भी प्राचार्य हुए जो जीवन पर्यंत एक ही स्कूल में कार्य करते करते सेवा निवृत्त हो गए।
मलाईदार स्कूलों में प्राचार्य बनने की होड़ अभी भी लगी हुई है। “कुछ पाने के लिए कुछ खोना पड़ता है” की कहावत को चरितार्थ करते हुए कई लोग कतार में अभी भी खड़े हैं। शिक्षा विभाग पूरी तरह से दो औऱ लो की पॉलिसी पर काम कर रहा है। वो दौर भी याद करना जरूरी होगा कि जब शिक्षक से प्रधान पाठक बनने की बात चली तो दो और लो का यह खेल अधिकारियों को खूब फला.. फल से लदे शिक्षा विभाग के पेड़ का स्वाद खद्दर नेता भी चखे..!
कहा तो यह भी जा रहा है कि बड़े बिल्डिंग के साहब को भी पहला फल मिला था। विभागीय गुफ्तगूं की माने शिक्षकों के प्रमोशन के लिए बकायदा दरबार लगाया गया था, जिसमें बीआरसी के गुरुजियों को राजदार बनाया गया था। “जो दो औऱ लो ” की नीति का पालन कराते हुए लोगों को प्रमोशन लेटर बांट रहे थे।
ये बात अलग है इसके बाद भी विभाग के मुखिया लोगों के पास रो.रोकर गरीबी की गीत गाते रहते हैं। पदोन्नति से विभाग इतना बदनाम हुआ कि बड़े साहब को सूची निरस्त करनी पड़ी। हालिया स्थिति यह है कि अभी भी मामला नहीं सुलझ पाया है। बात प्राचार्यों की जाए तो यह भी एक ऐसा पद है जो दो और लो पर टिका हुआ है।
चुनावी साल और भरोसे के अफसर
विधानसभा सत्र में भरोसे का बजट पास हो गया….सरकार भी खुश और जनता भी। धान बेचने वाले किसानों का रकबा बढ़ा, आंगनवाड़ी कार्यकताओं की मांग भी पूरी की और बेरोजगारों की तो चल पड़ी। अब प्रदेश सरकार घर.घर सर्वे कर बेरोजगारों को 2 हजार रुपए भत्ता बंटेगी। यानि भरोसे के बजट में जनता को भरोसे में लेने में भूपेश बघेल की सरकार कामयाब हो गई।
मगर कका अच्छी तरह से जानते हैं चुनावी साल है ऐसे में भरोसे के अफसर को भी मैदान में उतारे दें तो सोने पर सुहागा वाली बात होगी। सो सीएम हाउस में उन भरोसे वाले अफसरों की लिस्ट की तैयार हो चुकी है, जो सीएम साहब की गुडबुक में भरोसे वाले अफसर की लिस्ट में शामिल हैं। इनमें आईएएस, आईपीएस और वो मैदानी अफसर भी हैं जो साढ़े चार साल में सीएम के नजर में भरोसे मंद साबित हुए हैं। यानि कलेक्टर, एसपी से लेकर जिला पंचायत तक एक और चुनावी फेरबदल कभी भी हो सकता है।
अच्छा जब तक लिस्ट जारी ना हो जाएं इंतजार कीजिए….लिस्ट में नाम आए तो समझे आप भरोसे मंद हैं अगर ना आए …नंबर बढ़ाने में जुट जाएं!
राम नाम की लूट है लूट सके तो लूट….चुनाव करीब है कहीं हो जाए चूक…
कोरबा शहर वैसे तो कई मामलों में मशहूर है और यहां राजनीति करना हर किसी के बूते की बात नहीं है। यहां जो मंजा खिलाड़ी होगा वही बाजी मार सकता है। कुछ ऐसा ही हाल हिन्दू नव वर्ष पर उमड़े ऐतिहासिक जनसैलाब में देखने को मिला। शहर के अलावा आसपास के सभी लोग शोभा यात्रा में पहुंचे थे। लंबे असरे बाद ऐसी भीड़ शहर में जुटी थी। शोभा यात्रा में जय श्रीराम के जयघोष लग रहे थे। पूरा शहर पोस्टर से पाट दिया गया था।
मगर जिस नेता के पोस्टर और होडिंग्स की चर्चा सबसे ज्यादा रही वो स्थानीय विधायक और सरकार में मंत्री जयसिंह अग्रवाल की रही। बाकी नेता के भी पोस्टर और होडिंग्स शहर में लगे थे मगर वो ”सरकार” के पोस्टर में दबे हुए दिखे।
कहने को तो ये आयोजन हिन्दू नववर्ष पर भगवान श्री राम की शोभायात्रा का था जिसका सर्व हिन्दू समाज और हिन्दू क्रांति सेना ने मिलकर किया था। पर चुनावी साल होने से शहर के बड़े खिलाड़ी ने इसका जमकर फायदा उठाया। भगवा वालों को भी कहते नहीं बना… आखिर राम तो सबके के हैं तो जो ”रम” गया वो राम जो नहीं रम पाया वो ”जय राम”। यानि राम नाम की लूट है लूट सके तो लूट….चुनाव करीब है कहीं हो जाए चूक…और चूक गए तो दुखी मत होना अगली बार के लिए पोस्टर अभी तैयार करवा लेना।