
खाकी की सौ करोड़ खोज… खोदा पहाड़ निकली
कोरबा में न्यूज भी फिल्मी होती हैं और व्यूज में जांच तो पूरी की पूरी सिनेमा यूनिट लगती है। इस बार खाकी सौ करोड़ की तलाश में निकली, जी हां, पूरे 100 करोड़। रकम सुनते ही लगा मानो पुलिस नहीं, किसी रियलिटी शो की टीम खजाने की खोज में उतरी हो। लेकिन परिणाम ? सारा रोमांच बैठ गया जब बरामदगी में 66 हज़ार का “ग्रैंड टोटल” सामने आया। बाकी के 99 करोड़ 99 लाख 34 हजार लगता है किसी स्वर्गीय लॉकर में OTP डाले बिना खुल ही नहीं रहे। मामला ऐसे लपका गया था मानो जैकपॉट खुल गया हो।
दअरसल 11 नवंबर की रात डकैती का मामला जैसे ही सामने आया, ब्रांडिंग ऐसी हुई मानो हॉलीवुड ब्लॉकबस्टर रिलीज हो रही हो। कनेक्शन? पूर्व सीएम के उप सचिव का क्लासमेट! ये क्लासमेट शब्द ही TRP का असली मूलमंत्र बन गया। डकैत भी किसी “KGF” से ऑडिशन देकर आए लगते हैं। गैती सब्बल… साउथ स्टाइल एंट्री… और पुलिस ने दिखाया दम 22 आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। लेकिन बरामदगी सामने आते ही कहानी कॉमेडी हो गई।
खाकी के जाबाजों की कार्रवाई के बाद गांव में लोग गब्बर मोड में पूछ रहे “रामगढ़ वालों में कितने आदमी थे… साहब?”22″और जब्ती?”66 हजार…”दया… कुछ तो गड़बड़ है!”
प्रमाण (हंस) छुट्टी पर और जुगाड़ (कौवें) ड्यूटी पर
प्रशासनिक दुनिया एक नई ऊंचाई पर है. अब प्रमाणिकता योग्यता और अनुभव जैसी पुरानी चीजों की जरूरत किसे है. स्टीलबॉब फिल्म का पुराना गीत खुद को बेहद अपडेटेड महसूस कर रहा है. लोग हंसते हुए गुनगुना रहे हैं “हंस चुगेगा दाना, कौव्वा मोती खाएगा” और ऊपर से आदेश आ रहा है कि ताली भी बजाओ.
जनपद पंचायत में एडीओ को मनरेगा का पीओ बनाया गया। जिम्मेदार अफसरों ने माथा पीटा, लेकिन सरकार बोली “ये प्रशासनिक स्टार्टअप है।” प्रतिभा का चीरहरण और उलटे को सीधे पर बैठाना अब प्रशासनिक फैशन है. योग्यता वाले हंस को दाना दिखाकर लाइन में लगाओ और मोती कौव्वा को देकर कहो कि सुशासन आ गया. और बात यहीं खत्म हो जाए ऐसा कैसे. शिक्षा विभाग में प्राचार्य डीईओ बनकर ज्ञान नहीं व्यापार बढ़ा रहे हैं. पोड़ी जनपद में तकनीकी सहायक पीओ बनकर चमत्कार दिखा रहे हैं. ग्रामीण यांत्रिकी सेवा में तो मजाल कि कोई नियम बीच में आए. रिटायर बाबू अलमारी की चाबी हिलाते हुए फैसले सुना रहे हैं और खुद को जिले का वनमैन आर्मी समझ रहे हैं।
कुल कहानी यही कि जिसे कल तक नोटिंग की स्पेलिंग नहीं आती थी,आज वह दूसरों को साइन सिखा रहा है. जिला अधिकारी भी आंखें मूंदकर आशीर्वाद दे रहे हैं और जनमानस सोच रहा है कि
“अरे वाह, कलयुग प्रगति कर रहा है”. अब तो लगता है आगे चलकर चपरासी कलेक्टर और कलेक्टर चपरासी को सलाह देते नजर आएंगे. और तब भी हम गीत ही गाएंगे “रामचंद्र कह गए सिया से…” क्योंकि इस प्रशासन में हंस भूखे रह सकते हैं लेकिन मोती कभी कौव्वों से दूर नहीं जाएंगे.
जांच की आंच में एसईसीएल के जमींदार, सीबीआई कर रही फाइल तैयार
हवा में मकान खड़े कर मुआवजा डकारने वाले एसईसीएल के जमींदारनुमा घोटालेबाज अब जांच की आंच में झुलसने वाले हैं। काल्पनिक मकानों के नाम पर करोड़ों का खेल करने वाले राजस्व अफसरों की पेशानी पर पसीना और राम-राम जपने की रट दोनों स्पष्ट दिख रही है।
बात एसईसीएल के लिए अधिग्रहीत जमीन से विधिविरुद्ध क्षतिपूर्ति राशि डकारने की है। राजस्व विभाग के अंदर सक्रिय यह संगठित गिरोह, भूमाफियाओं के साथ मिलकर सरकारी खजाने को अपनी जेब का एटीएम समझ बैठा था और राजस्व अफसरो के संगठित गिरोह ने भूमाफियाओं की मदद से 152 काल्पनिक मकान हवा में खड़े कर दिए।
सरकारी संपत्ति के दुरुपयोग की शिकायत हुई तो सेंट्रल इन्वेस्टिगेशन टीम को मलगांव आना पड़ा। सेंट्रल एजेंसी की एंट्री के बाद तत्कालीन अफसरों और एसईसीएल के अपने आप को जमींदार कहने वाले घोटालेबाज सीबीआई की दबिश से राम राम जपने लगे है। उनका भगवान का नाम जपना भी स्वाभाविक है क्योंकि अब दस्तावेजी प्रमाण से उन्हें सिर्फ भगवान राम ही बचा सकते है। कहा तो यह भी जा रहा कि जिले में पदस्थ रहे कई थानेदार और राजस्व अफसर के रिश्तेदार भी काल्पनिक मकान बनाकर मुआवजा बनाने की प्लानिंग की थी, जो अब सीबीआई की रडार में है।
कहा तो यह भी जा रहा कि मुआवजा घोटाले के मास्टरमाइंड जायसवाल बंधु के ख्याली फूलाव का मजा कितने अफसरो ने लिया इसका पर्दाफाश जल्द होने वाला है। बहरहाल पब्लिक “..जैसी करनी वैसी भरनी..” के गीत गुनगुना रही है।
“गुरु गोविंद दोनों खड़े, काके लागू पाय…
“गुरु गोविंद दोनों खड़े, काके लागू पाय….संत कबीर ने ये बानी तब कही थी जब..भारत में भक्तिकाल का बोलबाला था। मगर आज की तारीख में कबीरदास छत्तीसगढ़ आए होते और यहां गुरुजी को कुत्तों को पकड़ने के लिए उसके आगे पीछे दौड़ते भागते देखते तो खुद चकरा जाते..। भला कबीर को कैसे पता चलता कि ऐसा सरकारी अफसरों की महिमा की वजह से हो रहा है। और उनकी महिमा के आगे “गुरु” महिमा का कोई मोल नहीं।
असल में कबीर के जमाने में गुरु राज आश्रित नहीं हुआ करते थे..उनका काम समाज को शिक्षित करना होता था। गुरुकुल के अपने नियम थे और सरकारी अफसरों का अतापता नहीं था। अब जमाना बदल गया है, गुरुजी अब राज आश्रित और सरकार आश्रित हो गए हैं सो अफसर जो भी काम बताएंगे वही करना होगा, नहीं तो नौकरी पर आफत आन पड़ेगी।
हालांकि कबीर के जमाने के गुरु और आज के दौर के शिक्षक में काफी फर्क है। मगर बच्चों को शिक्षा देने का काम अभी भी होता है। सरकारी फरमान के बाद भी शिक्षक कुत्ते पकड़ने के लिए राजी नहीं है और अफसर बैकफुट पर! तो इसका हल कबीर की उलट वानी में ही है…एक अचंभा देखा रे भाई, ठाढ़ा सिंह चरावै गाई….। अब आप चाहे तो इसका अर्थ निकल सकते हैं।
जो सच सच बोला तो सच्चाई मार गई और बाकी कुछ बचा तो..सरकार मार गई…
जो सच सच बोला तो सच्चाई मार गई और बाकी कुछ बचा तो..सालों पहले मनोज कुमार और मौसमी चटर्जी पर फिल्माए एक रोटी कपड़ा और मकान गाने के बोल छत्तीसगढ़ में दोबारा से हिट हो गए हैं। वैसे रोटी कपड़ा का जुगाड़ तो हो जाता है मगर मकान बनाने लिए बंदे में क्विंटल भर पापड़ बेलने का दम होना जरूरी होता है।
असल में सात साल बाद सरकार ने संपत्ति खरीदी बिक्री के लिए नई गाइड लाईन जारी की है। नई गाइड लाईन में मकान जमीन के रजिस्ट्री रेट जिस अंदाज में बढ़ाए गए हैं उससे ज़मीन कारोबारी सदमे में आ गए हैं। हालत ऐसी हो गई कि रजिस्ट्री आफिस के पास दिन रात मंड़राने वाले ज़मीन कारोबारी धार्मिक यात्रा में निकल गए हैं।
खबरीलाल की माने तो जमीन के कारोबार में कालीकमाई खपाने वालों की वॉट लग गई है। नई गाइड लाईन में रेट ऐसे फिक्स किए गए हैं कि अब जमीन के भाव और उसके सरकारी रेट करीब करीब बराबर हो गए। नकदी पेमेंट का जमाना नहीं रहा वो कालीकमाई घर में ही धरी रह गई।
खबरीलाल को खबर है कि जमीन कारोबारी सरकार को सेट करने में लगे हैं। वैसे सेटिंग पेंटिंग में हर जमीन कारोबारी मंझा हुआ खिलाड़ी होता है। ऐसे में अगर सरकार सेट हो गई तो कोई चकराने वाली बात नहीं है। नहीं तो… जो सच बोला तो सच्चाई मार गई और बाकी कुछ बचा तो..सरकार मार गई…।



