
थ्योरी का तंत्र, जांच का मंत्र और सच का अंतिम संस्कार..!
कोरबा पुलिस की कहानियां (?) अब एफआईआर में नहीं, फिक्शन रैक में रखे जाने लायक हो गई हैं। ताज़ा फार्म हाउस हत्याकांड ने तो क्राइम थ्रिलर का ऐसा कॉकटेल परोस दिया है कि दर्शक क्षमा कीजिए, जनता समझ ही नहीं पा रही कि यह केस डायरी है या किसी ओटीटी सीरीज़ का ट्रेलर।
कहा जा रहा है कि हत्या “रुपयों की बारिश” के लिए हुई। मगर यक्ष प्रश्न यह नहीं कि बारिश हुई या नहीं, प्रश्न यह है कि क्या जांच की बारिश में सच की एक बूँद भी गिरी…? जिस तत्परता से आरोपियों को अदालत में पेश किया गया, उसने जज साहब को भी सोचने पर मजबूर कर दिया..इतनी जल्दी क्यों, और रिमांड क्यों नहीं..? पारदर्शिता का दावा इतना पतला है कि रोशनी आर-पार हो जाए।
पुलिस की थ्योरी सुनकर जनता को वही पुराना सीआईडी एपिसोड याद आ रहा है, जहां हर उत्तर पहले से लिखा होता है और हर मोड़ पर सस्पेंस सिर्फ़ टाइम पास के लिए होता है। ऊपर से तंत्र-मंत्र की थ्योरी…! मानो जांच नहीं, कोई टीवी सीरियल का स्पेशल इफेक्ट चल रहा हो। सब कुछ है ड्रामेटिक एंट्री, सिनेमाई गिरफ्तारी, और अंत में यक्ष प्रश्न का क्लिफहैंगर..बस एक चीज़ नहीं है, ठोस, निष्पक्ष और गहरी जांच। गिरफ्तारी की स्टाइल ऐसी कि लगे स्क्रिप्ट राइटर ने नेटफ्लिक्स और सीआईडी दोनों का कॉम्बिनेशन लिख दिया हो। कैमरा एंगल परफेक्ट, संवाद तय, लेकिन सबूतों की पड़ताल पर मौन। असलियत की तह तक जाने के बजाय कहानी की सतह पर तैरती थ्योरियां पेश की जा रही हैं ताकि केस नहीं, नैरेटिव बंद हो जाए।
यह प्रश्न अब सिर्फ़ एक हत्याकांड का नहीं रहा। प्रश्न यह है कि क्या पुलिस जांच सच खोजने के लिए होती है या कहानी गढ़ने के लिए..? क्या अदालत में पेशी न्याय की दिशा है या जल्दबाज़ी का पर्दा? और सबसे बड़ा प्रश्न जब जज भी पूछ रहे हों कि रिमांड क्यों नहीं, तो जवाबदेही किस पर तय हो ?
कोरबा पुलिस अगर वाकई विश्वास चाहती है, तो तंत्र-मंत्र छोड़कर तर्क अपनाए, स्क्रिप्ट छोड़कर सबूत पकड़े, और थ्रिलर से बाहर निकलकर तथ्य की ज़मीन पर उतरे। वरना यह केस भी उसी फोल्डर में चला जाएगा जहां पर सस्पेंस तो बहुत है, पर सच नहीं।
खनिज विभाग का नवाचार..“धान के साथ मुरूम उगाइए, आय दोगुनी पाइए..!”
जिले में खेती अब दो फसली नहीं रही, अब मुरूम फसली हो चली है और यह चमत्कार किसी वैज्ञानिक प्रयोगशाला ने नहीं, बल्कि खनिज विभाग की कृपा से संभव हुआ है। जहां किसान पसीना बहाकर धान उगाता है, वहां तस्कर मशीनें दौड़ाकर मुरूम काट रहा है और विभाग आंखें मूंदकर रॉयल्टी की फसल काट रहा है।
“कहीं का ईंट, कहीं का रोड़ा, भानुमती ने कुनबा जोड़ा” की कहावत को मुरूम तस्कर पूरी तरह चरितार्थ कर रहे हैं। बारिश के दिनों में विवेक कंट्रक्शन कंपनी ने खेत से मुरूम खोदना बताकर साबित कर दिया है जब जेब में हो पैसा तो खनिज विभाग में करा लो मन चाहे जैसा।
कहा जा रहा है कि रॉयल्टी क्लियरेंस में भी झोल-झाल है। अचरज नहीं जब खेत खदान बन सकता है, तो क्लियरेंस क्या चीज़ है! जनता पूछ रही है: क्या अगला कदम यही होगा कि तालाब में कोयला और बगीचे में बॉक्साइट उगाया जाए..?
सूत्रधार की माने तो रॉयल्टी जारी करने के लिए माइनिंग इंस्पेटर ने जांच कर प्रतिवेदन प्रस्तुत किया था। जिस जमीन से मुरूम निकालना बताया गया है वहां धान की फसल लहलहा रही थी। बावजूद इसके रॉयल्टी जारी करना खनिज विभाग की लापरवाही को दर्शाता है। कहा तो यह भी जा रहा है रॉयल्टी क्लियरेंस में भी बड़ा झोल झाल है। विभाग की कार्यप्रणाली को देख जनमानस में शोर है – ” वाह साहब लहलहाते धान के खेतों में मुरूम की फसल ये तो खनिज तंत्र ही कर सकता है।”
तंत्र मंत्र के फेर में पुलिस !
दिल्ली का चांदनी चौक और छत्तीसगढ़ का कोरबा..ये दोनों नाम लोगों को चौंकाने के लिए काफी हैं। यहां कब क्या हो जाएगा सोच पाना मुश्किल है। और जब घटना होकर गुजर जाती है तो लोग उसकी तुलना पुराने कहानी किस्सों से करने लगते हैं। अगर ऐसा होता तो वैसा होता..वैसा हुआ होता तो ऐसा नहीं हुआ होता।
अब कोरबा की बात करें तो कभी आम लोगों को ठगी से बचाने और छात्रों का आत्मविश्वास बढ़ाने वाली यहां की पुलिस तंत्र मंत्र के फेर में उलझ गई है। पैसे की बारिश कराने के बहाने हुए तीन हत्या और कुछ दिन पहले हुई खजाने की खोज की बात पर चाय की चुस्की में अचानक सोशल पुलिसिंग की याद आ गई है।
वही सोशल पुलिसिंग, जो कभी ‘निजात अभियान’ बनकर नशे के खिलाफ जंग लड़ती थी और तालियाँ बटोरती थी। तब समाज जाग रहा था, अब समाज डर रहा है। लेकिन बात वहीं अटकी है ..अगर ऐसा होता तो वैसा होता।
फर्क इतना है तब पुलिस और समाज मिलकर नशे को जड़ से उखाड़ने का सपना देख रहे थे, अब तंत्र-मंत्र से रातों-रात करोड़पति बनने के सपने बिक रहे हैं। तब अंधेरा हटाने की कोशिश थी, आज अंधविश्वास ही उजाले का विकल्प बन गया है। आज सोशल मीडिया पर पुलिसिंग बस पोस्ट और बयान तक सीमित है। और अपना शहर वह तांत्रिकों के भरोसे अपनी किस्मत ढूंढ रहा है। पता नहीं इस शहर का क्या होगा।
काफी कम चीनी ज्यादा..या चाय कम चीनी ज्यादा!
पिछले सप्ताह शहर से लौटे शर्माजी पूरा गांव सिर पर उठाये फिर रहे थे। ऐसा लग रहा था कि शर्माजी शर्माजी न हो -लाल बुझक्कड़जी हो गए हों। वो महंगू की चाय गुमठी में आने वाले सभी से केवल एक ही सवाल पूछे जा रहे थे.. बताओ कॉफी कम चीनी ज्यादा..या चाय कम चीनी ज्यादा! भला गांव वालों ने कभी काफी चखी होती तो इसका जवाब दे पाते। मगर जब बात हद से बढ़ चली तो गांव वालों ने भी तय कर लिया, आज इसका फैसला हो जाए कि कॉफी कम चीनी ज्यादा..या चाय कम चीनी ज्यादा! आखिर में इस नानस्टाप पहेली का हल ढ़ूढने के लिए प्राइमरी स्कूल के मास्टर ज्ञान चंद को तैयार किया गया।
आज शर्माजी के आने काफी पहले से गांव वाले महंगू की गुमठी में जुटे थे। शर्माजी जैसे ही अपना सवाल शुरु करते उससे पहले मास्टर ज्ञान चंद जी बोल पड़े…शर्माजी पिछले सप्ताह रायपुर शहर घूमकर आये हो वहां का कुछ हाल चाल तो बताओ..ये कॉफी कम चीनी ज्यादा..या चाय कम चीनी ज्यादा पहली तो सुलझाओ। पहले तो शर्माजी सकपकाये फिर धीरे से बोले..क्या बताये मास्टर ज्ञान चंद पता नहीं किस पागल कुत्ते ने काटा था जो उस दिन सिविल लाइन वाले कॉफी हाउस के सामने गुजरना हुआ। ढेरों गाड़ियां खड़ी थी, मंत्री…नेता और अखबार और टीवी चैनल्स के बड़े बड़े पत्रकार वहां आ जा रहे थे। लगता था कोई कॉफी पार्टी चल रही थी।
सोचा, अंदर झांक आए बस यहीं गलती कर बैठे। शर्माजी चुप होते उससे पहले मास्टर ज्ञान चंद बोल पड़े वो कैसे। क्या बताये मास्टर.. गेट पर खड़ा दरबान धक्के मार कर रोक दिया। अंदर जाना तो दूर पास फटकने भी नहीं दिया। मैं कुछ कहता उससे पहले दरबान ही फट पड़ा..कहां से आये हो..शक्ल सूरत से तो पत्रकार नहीं लगते..आमंत्रण पत्र है या नहीं..। जब उसको ये पता लगा कि मैं फलांगांव से आया हूं तो बोला..अरे भाई ये कोई आम पार्टी नहीं है। दो साल पूरे होने पर सरकार कॉफी दे रही है और इस कॉफी पार्टी में वही जा सकता है, जिन्हें सरकार ने बुलाया है..।
फिर क्या हुआ..मास्टर जी ने पूछा..शर्माजी बोले.मैं वहीं पास की खिड़की पर जम गया..ये देखने के लिए सरकार जब कॉफी पार्टी अरेंज करती है तो वहां क्या होता है। तो फिर वहां क्या देखा..इस बार मास्टर जी को बोलने का मौका नहीं मिला, गुमठी की पूरी भीड़ शर्माजी को घेरकर खड़ी हो गई। शर्माजी ने जो बताया वो गांव वाले भले ही न समझ पाये हों मगर मास्टर ज्ञानचंद थोड़ा.थोड़ा समझ रहे थे। शर्माजी ने बताना शुरु किया, वहां टेबल पर कॉफी के कप सजे हुए थे..साइड में बड़ी प्लेट में शक्कर और चम्मच अलग से रखे गए थे, नामीगिरामी लोग वहां बैठे थे। सरकार जिसकी ओर ज्यादा देर तक देखती वो उतनी शक्कर चम्मच में भर अपने कप में मिलाने लगाता..बीच बीच में चम्मच से घोलता भी जाता ताकि कॉफी कप में ही रहे। बाहर छलक आई तो सरकार नाराज हो सकती है। सब कुछ बड़े सलीके से करना होता है।
अच्छा और क्या देखा.क्या बताउं मास्टर. बीच बीच में मैं नजर उठाकर दरबान को भी देख लेता था..वो भी मुझे वैसे ही देख रहा था साथ में मुस्कुरा भी रहा था। थोड़ी देर बाद हिम्मत करके मैंने दरबान से पूछा, भाई सरकार को काफी ही पिलाने थी तो इज्जत से पिलाई होती.. भला अलग से शक्कर और चम्मच देने का क्या तुक..। दरबान बोला भले मानुष इसे ही चम्मच कल्चर कहते हैं…और ये सरकार का सबसे पसंदीदा खेल है। जो सबसे ज्यादा और जोर जोर से चम्मच हिलाता है…सरकार उसे ही बड़ा पत्रकार मानती है..तुम नहीं समझोगे..। अपने गांव लौट जाओ और चाय से ही काम चलाओ। ये कॉफी वाफी के झंझट में मत पड़ो।
सच कहूं मास्टर ज्ञानचंद, शहर के काफी हाउस से अपने गांव की महंगू की गुमठी ज्यादा भली है, कम कम से यहां चम्मच कल्चर तो नहीं है। हैसियत न हो तो भी प्याली भर चाय मिल जाती है। शक्कर घोलने के लिए उंगली से ही काम चल जाता है। इसे पहले की कोई और कुछ कहता महंगू मूंछों पर ताव देते हुए कहा..चलो भीड़ हटाओ भाई धंधे का वक्त है..और हां किसी को शक्कर की जरूरत होतो तो वो कांच वाली बरनी से ले सकता है।
ई-ऑफिस और मुसद्दीलाल
दूरदर्शन के जमाने में एक टीवी शो काफी लोकप्रिय हुआ था…’ऑफिस-ऑफिस’ और इसके किरदार मुसद्दीलाल को लोग आज भी याद करते हैं। 2001 में आए इस शो को 2020 में लॉकडाउन में फिर से टेलीकास्ट किया गया था। लेकिन 01 जनवरी से मुसद्दीलाल की किस्मत बदलने वाली है। वो इसलिए क्योंकि छत्तीसगढ़ में 1 जनवरी से पूरी तरह से आनलाइन होगा।
2025 के ‘ऑफिस-ऑफिस’ में साहब भी होंगे..बाबू के साथ दफ्तरी भी होगा मगर टेबलों पर फाइलों के ढेर नहीं होंगे। टीवी शो का पूरा सेट बदला होगा। पता नहीं इस शो को कितनी पापूलरटी मिलती है। असल में सरकार के आनलाइन वाले सिस्टम को सरकारी बाबू, पटवारी जैसे लोग कई बार आफलाइन कर चुके हैं। हर बार सरकार को कंप्रोमाइज के लिए आगे आना पड़ा।
ऐसे में अगर आने वाली जनवरी से छत्तीसगढ़ में सरकार के सभी काम पूरी तरह से आनलाइन शुरु हो गए तो ‘ऑफिस-ऑफिस’वाली सरकार चल पड़ेगी। मुसद्दीलाल को तारीख पर तारीख देने वाले बाबू अफसर की वाट लग जाएगी। मगर ये सब कुछ सरकार पर है कि वो इसे कैसे लागू करती है। अगर इसमें संशोधन की नौबत आई तो बाबू अफसर ही जीतेंगे..और मुसद्दीलाल..!



