Featuredकटाक्ष

Two and a half years and six months: खाकी के सपनों में मलाई की खुशबू,असमंजस में भगवान, अफसर परेशान ..शिक्षक “प्रोसेस में” विभाग अब भी “लोडिंग” में,पुलिस-कमिश्नर बनने की रेस और टाइमिंग..

अथ मुंगेरी गाथा “खाकी के सपनों में मलाई की खुशबू”

 

जिले के थानेदार इन दिनों “मुंगेरीलाल के हसीन सपने” देखने में व्यस्त हैं। उन्हें पूरा यकीन है कि अब थानों में फेरबदल होगा और भाग्य मेहरबान हुआ तो मलाईदार थाना हाथ लगेगा। थ्री-स्टार सुपरकॉप बन चुके कुछ अफसरों को तो बड़ा थाना मिलने का सपना रोज रात को आता है। खैर, उम्मीद रखना बुरी बात नहीं आखिर दुनिया उम्मीद पर ही तो कायम है।

लेकिन अगर कहीं यह सपना सच हुआ, तो तीन ऐसे थाना भी हैं जिनका नाम सुनकर जांबाज अफसरों को भी पसीना आ जाता है लेमरू, श्यांग और पसान। अगर इस बार पोस्टिंग की गाड़ी उलटी दिशा में चल पड़ी और किसी का टिकट जंगलों में कट गया, तो सपना हसीन नहीं, दर्दनाक हो जाएगा।

थानों की अगली पोस्टिंग लिस्ट अगर थोड़ी-सी भी उलटी दिशा में दौड़ पड़ी, तो “लेमरू, श्यांग और पसान” जैसे नाम सुनकर रौबदार मूंछें भी झुक जाएंगी क्योंकि वहां नेटवर्क नहीं मिलता न मोबाइल का, न संपर्कों का। और अगर किस्मत ने धक्का दे दिया, तो एसी से निकलकर जंगल की आग में ‘गम भुलाने’ का एक ही उपाय बचेगा.. “मेरी महुवा तेरे वादे क्या हुए..तू है मेरी दुल्हन”

दूसरी तरफ कुछ मुस्कानधारी थानेदार हैं, जिनकी किस्मत और कृपा-दाता दोनों हर बार साथ देते हैं। उनके लिए तो जिला मुख्यालय के पास “थाना” सिर्फ पोस्टिंग नहीं, पुश्तैनी हक जैसा है। सूत्रधार का मानना हैं कि इनका तो ट्रांसफर ऑर्डर भी लौटकर “अप्रूवल लंबित” में चला जाता है।

हालांकि “सपनों के सौदागर” इन थानेदारों को अभी थोड़ा और इंतजार करना होगा क्योंकि अफसरशाही का यह खेल बड़ा अद्भुत है किसी के लिए सपना हसीन, तो किसी के लिए जागरण में डरीन। जिनके पास “फिरकी गेंद” फेंकने का हुनर है, वे फील्ड की फील्डिंग में भी बच जाते हैं और स्कोर शीट में भी नाम चमका लेते हैं।

अब बस सबकी निगाहें उस “गुप्त लिस्ट” पर टिकी हैं, जो कभी भी जारी हो सकती है। तब पता चलेगा कि किसकी पोस्टिंग “शहर के सेंटर” में है और किसकी “सेंटर ऑफ फॉरेस्ट” में।

तब तक, सभी वीर मुंगेरीलालों से यही कहना है “थोड़ा इंतजार का मज़ा लीजिए… बाकी सपनों की सर्विसिंग बाद में करवा लीजिए!”

 

भक्तों की भक्ति से असमंजस में भगवान, अफसर परेशान

 

कभी-कभी भक्तों की भक्ति से भगवान भी असमंजस में पड़ जाते हैं। और जब भक्तों की टोली आपस में दो.दो हाथ करने के लिए तैयार हो जाएं तो इससे दुनिया को चलाने वाले भगवान भी परेशान हो जाते हैं।

असल में कोरबा की जीवनदायिनी हसदेव किनारे के एक आरती को लेकर भक्तों के दो गुट आमने सामने आ गए। भक्तों का ये हट देखकर भगवान तो मौन हो गए मगर शासन प्रशासन की परेशानी बढ़ गई।

अधिकारी हर बार की तरह समझाइस देकर काम चला रहे हैं। देखने वाली बात ये होगी कि प्रशासन एक तरफ कुआँ, दूसरी तरफ खाई..क्या करेगा…. वाले हालत से कैसे निपटता है।

चर्चा तो इस बात की भी है कि नगर कमिश्नर ने किसी दबाव में आकर एक पक्ष को अनुमति दे दी थी, लेकिन जैसे ही ऊपर वालों को भनक लगी आदेश उड़ गया हवा में। अब न आरती तय है, न आरतीकार।

कहते हैं, “जीवनदायिनी हसदेव” अब राजनीति की नई प्रयोगशाला बन गई है जहाँ श्रद्धा का हर दीपक “वर्चस्व की हवा” में टिमटिमाता है। अफसरों की मानें तो अब यह केवल आरती नहीं, “आरती-वार” बन गई है। इसी बीच एक अफसर ने हँसते हुए कहा “एक तरफ कुआँ, दूसरी तरफ खाई क्या करेगा राहुल भाई?”

 

 

शिक्षक “प्रोसेस में” विभाग अब भी “लोडिंग” में…

 

कवि सूरदास ने कहा था “बीत गए दिन भजन बिना रे…” सूरदास अगर शिक्षा विभाग में होते, तो लिखते “बीत गए दिन शिक्षा बिना रे…”

फर्क बस इतना है कि सूरदास के जमाने में भजन न करने से परलोक बिगड़ता था, और अब शिक्षा विभाग के जमाने में शिक्षक न आने से पृथ्वीलोक की पीढ़ी बिगड़ रही है।

जिले में शैक्षणिक सत्र के पाँच महीने कब बीत गए, इसका हिसाब तो विभाग के पास नहीं, पर बच्चों के भविष्य से समय जरूर फिसल गया।

शैक्षणिक सत्र के पाँच महीने ऐसे बीत गए, जैसे विभाग ने कैलेंडर को “ऑफलाइन मोड” में डाल दिया हो।
किसी को नहीं पता कि पढ़ाई कहाँ पहुँची!! क्योंकि विभाग खुद कागज़ी ज्ञान की पीएचडी किए बैठा है।

युक्तिकरण और युवाकरण के नाम पर जिले के 340 शिक्षकों में से 48 अब भी “अदृश्य अवतार” बने हुए हैं। स्कूल खुल रहे हैं, बच्चे आ रहे हैं, पर शिक्षक?.. वो अभी सिस्टम में लॉगिन नहीं हुए हैं।

सरकारी स्कूलों की बात करें तो वहां बच्चों को पढ़ाने से ज्यादा अधिकारियों को गिनाने में वक्त जाता है कि “शिक्षक आने वाले हैं”। वहीं आत्मानंद अंग्रेजी माध्यम के 15 स्कूलों में 122 पद अभी तक भर्ती के इंतज़ार में हैं। स्मार्ट क्लासरूम तो तैयार हो गए, पर स्मार्ट टीचर अभी “प्रोसेस में” हैं।

अभिभावक अब कहते हैं  “सरकार ने स्कूलों को ‘स्मार्ट’ तो बना दिया, पर शिक्षा विभाग ने उन्हें चार्जर के बिना मोबाइल बना दिया!”
लगता है, अब सूरदास की पंक्तियाँ ही थोड़ी बदलनी पड़ेंगी “बीत गए दिन शिक्षा बिना रे, अब बच्चा जाने किस गिना रे…”

 

पुलिस-कमिश्नर बनने की रेस और टाइमिंग

 

छत्तीसगढ़ में 1 नवंबर से रायपुर को पुलिस-कमिश्नरी बनाने की तैयारी है। पब्लिक और पुलिस महकमें दोनों में यह जानने की होड़ मची है कि रायपुर पुलिस-कमिश्नरी बनी तो पहला पुलिस-कमिश्नर कौन होगा…। मगर इससे ज्यादा चर्चा राज्य के एक सीनियर आईपीएस पर 7 साल पुराने मामले लगे यौन शोषण के आरोप की हो रही है। चर्चा इस आरोप की टाइमिंग को लेकर हो रही है…आखिर 7 साल पुराने मामले अब आरोप क्यों लगाए गए।

खबरीलाल की माने तो ऐसा इसलिए भी सही जान पड़ता है कि जिन अफसर पर आरोप लगे हैं वो सीनियर आईपीएस हैं और उनका ये कहना है कि उनकी साफ-सुथरी छवि को धूमिल करने का प्रयास किया जा रहा है, खासकर उच्च पदों पर संभावित नियुक्तियों के समय में ऐसा हो रहा है।

हालांकि पुलिस-कमिश्नर बनने की रेस राज्य की आईपीएस लॉबी के लिए विभागीय प्रक्रिया का हिस्सा है मगर जिस तरह से इस वक्त आईपीएस लॉबी में चर्चा चल रही है वो सोचनीय है। सवाल ये नहीं है कि सीनियर आईपीएस पर लगे संगीन आरोपी सही है या नहीं बल्कि सवाल ये है कि 7 साल पुराने मामले आरोप लगाने वाली महिला अब तक कहां थी। फिलहाल तो मामला जांच में है मगर जांच कमेटी इस आरोप की टाइमिंग को अपनी इक्वांरी में शामिल करे तो असल बात सामने आते देर नहीं लगेगी।

 

ढाई साल छह महीना

 

छत्तीसगढ़ कांग्रेस में ऑल इज वेल हो..ऐसा फिलहाल तो नहीं दिखा..। असल में पार्टी के संगठन सृजन अभियान को लेकर बड़े नेताओं में ही एक राय नहीं हो पाई है। जिला अध्यक्षों के चयन के लिए दिल्ली से आए हाईकमान के पर्यवेक्षक रिपोर्ट लेकर लौट गए..और वहां जिला अध्यक्षों के चयन के लिए परफॉर्मेंस बेस्ड सिस्टम की बात हुई। मगर परफॉर्मेंस बेस्ड सिस्टम का क्राइटेरिया अपने अपने जिले में करीबी लोगों को डीसीसी अध्यक्ष बनाने की होड़ में फुस्स हो गई।

असल में पार्टी में गुटबाजी इस कदर हावी हो चुकी है कि वो सुलझने की जगह हर बार उलझ जाती है। पहले जब कांग्रेस की सरकार की बनी थी तब इसे सुलझाने के लिए ढाई.ढाई साल के सीएम का फार्मूला लाया गया था…अब जिला अध्यक्षों के चयन के लिए छह-छह महीने के परीक्षण कार्यकाल की बात हो रही है।

खबरीलाल की माने तो छह महीने बाद उनके कामकाज का मूल्यांकन किया जाएगा, जिसके बाद आगे विस्तार होगा। देखना ये होगा कि ढाई.ढाई साल के सीएम वाले फार्मूले की तरह  कहीं छह महीना के परीक्षण कार्यकाल वाला फार्मूला भी बड़े नेताओं की लड़ाई की भेंट न चढ़ जाए, नहीं तो संगठन सृजन अभियान बाकी घोषणा की तरह कागजी ही साबित होगा। ऐसे में ऑल इज वेल कैसे हो यह दिल्लीवालों को सोचना होगा।

✍️अनिल द्विवेदी, ईश्वर चन्द्रा

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button