Raipur Drugs Case : सालभर थाने में पड़े रहे 17 गैजेट्स, अब फॉरेंसिक लैब भेजे गए, 325 से ज्यादा नाम, कार्रवाई सिर्फ 11 पर

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Raipur Drugs Case

रायपुर, 25 अगस्त। Raipur Drugs Case : राजधानी रायपुर के चर्चित ड्रग्स केस में पुलिस की जांच को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। रिपोर्ट के मुताबिक कोकीन और एमडीएमए सप्लाई से जुड़े मामले में जब्त किए गए 17 इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स करीब एक साल तक थाने में पड़े रहे। इनमें मोबाइल फोन, आईपैड और लैपटॉप शामिल हैं। अब इन डिवाइस को फॉरेंसिक जांच के लिए भेजा गया है। इनमें मुख्य आरोपी नव्या मलिक और विधि अग्रवाल के मोबाइल भी शामिल बताए जा रहे हैं।

एक साल बाद याद आई इलेक्ट्रॉनिक सबूतों की जांच

रिपोर्ट के मुताबिक पुलिस ने आरोपियों से मोबाइल, आईपैड और लैपटॉप जैसे इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस बरामद किए थे, लेकिन इनकी फॉरेंसिक जांच लंबे समय तक नहीं कराई गई। अब नव्या मलिक और विधि अग्रवाल समेत 9 आरोपियों के डिवाइस फॉरेंसिक लैब भेजे गए हैं। इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों की जांच में हुई देरी ने पुलिस की कार्रवाई पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

ड्रग्स केस में मोबाइल और लैपटॉप क्यों हैं अहम?

ड्रग्स नेटवर्क की जांच में मोबाइल फोन और लैपटॉप बेहद महत्वपूर्ण इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य माने जाते हैं। चैट, कॉल रिकॉर्ड, संपर्क, डिजिटल लेनदेन और अन्य डेटा के जरिए सप्लाई नेटवर्क से जुड़े लोगों तक पहुंचने में मदद मिल सकती है। ऐसे में जब्त डिवाइस की जांच में देरी को लेकर अब सवाल उठ रहे हैं कि आखिर इन इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों को समय पर फॉरेंसिक लैब क्यों नहीं भेजा गया।

चार्जशीट पर भी उठ रहे सवाल

रिपोर्ट के मुताबिक पुलिस ने नवंबर में मामले में चार्जशीट पेश की थी। आरोप है कि पूछताछ के दौरान सामने आए कुछ महत्वपूर्ण नामों और कड़ियों को जांच में पर्याप्त तवज्जो नहीं दी गई। दोनों प्रमुख आरोपियों के शहर के प्रभावशाली लोगों और कारोबारियों से संपर्क होने की बात भी सामने आने का दावा किया गया है, लेकिन इन कड़ियों का चार्जशीट में पर्याप्त उल्लेख नहीं होने पर सवाल उठाए जा रहे हैं।

एक नेता के परिवार से कनेक्शन का भी दावा

मामले में एक नेता के परिवार से आरोपियों के संबंध होने की बात भी सामने आने का दावा किया गया है। हालांकि, उपलब्ध जानकारी के मुताबिक चार्जशीट में इसका उल्लेख नहीं है। नव्या से जुड़े लोगों, कथित ड्रग खरीदारों और सप्लाई चेन से संबंधित जानकारियों को लेकर भी जांच की गंभीरता पर सवाल खड़े किए जा रहे हैं।

325 से ज्यादा नाम, लेकिन कार्रवाई सिर्फ 11 पर

प्रारंभिक जांच में नव्या मलिक, विधि अग्रवाल और अन्य आरोपियों से पूछताछ के दौरान 325 से ज्यादा लोगों के नाम या संपर्कों की जानकारी सामने आने की बात कही गई है। इनमें पार्टी में शामिल होने वाले लोगों के साथ कुछ प्रभावशाली परिवारों से जुड़े लोगों के नाम होने का भी दावा है। इसके बावजूद रिपोर्ट के मुताबिक इनमें से केवल 11 लोगों पर कार्रवाई हुई। अब सवाल यह है कि बाकी लोगों की भूमिका की जांच किस स्तर तक की गई।

तत्कालीन पुलिस अधिकारियों की भूमिका पर भी सवाल

जांच में सामने आए कथित 325 से ज्यादा नामों पर कार्रवाई नहीं होने और इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस लंबे समय तक थाने में रखे रहने को लेकर तत्कालीन जांच अधिकारियों की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि फॉरेंसिक रिपोर्ट आने के बाद जांच में कोई नई कड़ी सामने आती है या नहीं।

पुलिस विशेषज्ञों ने बताया मोबाइल क्यों है बड़ा सबूत

पुलिस विशेषज्ञों के मुताबिक ड्रग तस्करी के मामलों में मोबाइल फोन और अन्य डिजिटल डिवाइस महत्वपूर्ण सबूत हो सकते हैं। इनके जरिए संदिग्धों के बीच संपर्क, कथित सौदों और नेटवर्क की जानकारी सामने आ सकती है। यही वजह है कि ऐसे मामलों में इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस को सुरक्षित तरीके से जब्त कर जल्द से जल्द फॉरेंसिक जांच के लिए भेजना जांच का अहम हिस्सा माना जाता है।

DIG ने कहा- सभी इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस भेजे गए

मामले में DIG सेंट्रल रेंज ताकेश्वर पटेल के मुताबिक ड्रग्स केस से जुड़े सभी इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस जांच के लिए भेज दिए गए हैं। उनके अनुसार पहले 9 तस्करों के मोबाइल फॉरेंसिक जांच के लिए भेजे गए थे, जबकि नव्या मलिक और विधि अग्रवाल के डिवाइस लैब नहीं भेजे गए थे। अब इन्हें भी जांच के लिए भेजा गया है और रिपोर्ट के आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी।

23 अगस्त 2025 को गिरफ्तार हुई थी नव्या

जानकारी के मुताबिक मुख्य आरोपी नव्या मलिक को 23 अगस्त 2025 को गिरफ्तार किया गया था। ऐसे में करीब एक साल बाद इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस फॉरेंसिक लैब भेजे जाने की बात सामने आने के बाद जांच की टाइमलाइन भी सवालों के घेरे में है।

फॉरेंसिक रिपोर्ट से खुल सकते हैं कई राज

अब सभी की नजर फॉरेंसिक लैब की रिपोर्ट पर है। डिजिटल डिवाइस से मिलने वाली जानकारी से कथित ड्रग सप्लाई नेटवर्क, संपर्कों और अन्य संदिग्धों की भूमिका को लेकर नई जानकारी सामने आ सकती है। साथ ही यह भी स्पष्ट हो सकता है कि जांच के दौरान सामने आए 325 से ज्यादा नामों में से किन लोगों की वास्तव में कोई भूमिका थी।

क्या लापरवाही पर होगी विभागीय कार्रवाई?

फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों की जांच में इतनी देरी क्यों हुई और इसके लिए जिम्मेदारी किसकी है। फॉरेंसिक रिपोर्ट के साथ-साथ अब यह भी महत्वपूर्ण होगा कि क्या मामले में कथित लापरवाही बरतने वाले तत्कालीन पुलिस अधिकारियों के खिलाफ कोई विभागीय कार्रवाई होती है। आने वाले दिनों में जांच की दिशा और फॉरेंसिक रिपोर्ट इस हाई-प्रोफाइल ड्रग्स केस की आगे की तस्वीर साफ कर सकती है।

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