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Muswa Phag: खाकी ने निभाया अहम रोल, “सुरक्षा स्पेशल शो”..हाई एप्रोच की नो-बॉल पर एंट्री, संपदा शाखा के ‘सीक्रेट ओवर’,छा गए गुरु, धुरंधर के…कलेक्टर बड़ा या मंत्री! सीधा सवाल

खाकी ने निभाया अहम रोल, जनसुनवाई बनी “सुरक्षा स्पेशल शो”

Police Security Operation : लैंको से जुड़ी Adani Power Limited की विस्तार परियोजना की जनसुनवाई में इस बार विकास से ज्यादा चर्चा खाकी की रही। एएसपी के नेतृत्व में करीब 350 जवानों ने ऐसा सुरक्षा कवच तैयार किया कि कार्यक्रम कम और व्यवस्था का लाइव डेमो ज्यादा लगने लगा। सफल आयोजन के बाद महकमे में “मैनेजमेंट मॉडल” की खूब सराहना हो रही है।

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Police Security Operation दरअसल, पिछली बार रायगढ़ में जो हुआ था, वह इतिहास बन गया। इस बार इतिहास को दोहराने की इजाजत नहीं थी। इसलिए इतिहास बनने से पहले ही भूगोल घेर लिया गया। सभा स्थल पर पहुंचते ही लोगो को साफ दिखने लगा कि खाकी के जाबांज फिटनेस मोड में है, हर एंट्री पर चेकिंग, हर कदम पर निगरानी। सभा स्थल पर पहुंचते ही साफ संदेश था: “यहां विकास सुना जाएगा, लेकिन व्यवधान नहीं।”

 

जल, जंगल, जमीन की बात करने निकले कुछ माटीपुत्रों को व्यावहारिक पाठ पढ़ाया गया कि लोकतंत्र में आवाज से ज्यादा अहम अनुमति होती है। डंडा भी समझाता है और याद भी दिलाता है, यह संदेश बड़े सलीके से अहसास कराया गया। जनसुनवाई की सुबह सड़क पर गुजरने वाले आम लोग भी खास हो गए। पूछताछ की कृपा सब पर समान रूप से बरसी। समर्थक, विरोधी और राहगीर, सबको यह अहसास कराया गया कि सुरक्षा एक समतामूलक भावना है। यहां सब बराबर हैं, खासकर जांच के वक्त। सुरक्षा का समाजवाद अपने चरम पर था..जांच के वक्त सब बराबर थे।

इसी बीच 2022 की वह याद भी ताजा हुई, जब बालको में श्रमिकों के समर्थन में खाकी की मानवीय छवि चर्चा में आई थी। तब कहा गया था कि पुलिस पहली बार दीये के साथ खड़ी दिखी। अब लोग मुस्कराकर कहते हैं, दीया वही है, बस इस बार हवा की दिशा पहले से तय थी। कुल मिलाकर जनसुनवाई सफल रही। न शोर ज्यादा, न सवाल ज्यादा। व्यवस्था ऐसी दमकी कि मुद्दा थोड़ा फीका पड़ गया। लोकतंत्र मुस्कराया, खाकी चमकी, और विकास ने दूर खड़े होकर सीन का क्लाइमेक्स एंजॉय किया। डंडे की भाषा भी इस बार बेहद शिष्ट रही…उठा कम, दिखा ज्यादा। संदेश स्पष्ट था कि“व्यवस्था सर्वोपरि है।” माहौल कुछ ऐसा कि खाकी मानो खुद कह रही हो “पुलिस की वर्दी पर शक नहीं करते साहब, ये जहां खड़ी हो जाए, लाइन वहीं से शुरू होती है।”

 

हाई एप्रोच की नो-बॉल पर एंट्री, संपदा शाखा के ‘सीक्रेट ओवर’

नगर निगम इन दिनों क्रिकेट मोड में नजर आ रहा है। फर्क बस इतना है कि यहां बल्ला और गेंद की जगह फाइलें और आदेश चल रहे हैं। इंडियन प्रीमियर लीग की तर्ज पर अब निगम में भी प्रतिनियुक्ति के खिलाड़ी उतारे जा रहे हैं। कौन कितनी बोली में आया, यह तो पर्दे के पीछे की बात है, लेकिन मनचाहे रन बनाने की तैयारी पूरी दिख रही है।

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पहले एक डिप्टी कलेक्टर को अपर आयुक्त बनाकर ओपनिंग कराई गई। अब महापौर के ओएसडी रहे तिवारी जी को विशेष रणनीतिक भूमिका में उतारा गया है। चर्चा है कि उन्हें ‘कप्तान सचिन’ की तरह लंबी पारी खेलने की जिम्मेदारी दी गई है। हालांकि यह पारी स्टेडियम में नहीं, बंद कमरों में खेली जाती है, जहां रन स्कोरबोर्ड पर नहीं, फाइलों के नोटशीट में जुड़ते हैं। भाजपा महापौर की टीम के लिए चुपचाप “सिंगल-डबल” लेकर स्कोर बढ़ाने की कला में वे निपुण बताए जाते हैं।

उधर दर्शक दीर्घा में बैठी जनता को मैच थोड़ा संदिग्ध लग रहा है। “मैच फिक्सिंग” की फुसफुसाहट इसलिए है कि संपदा शाखा के कुछ अहम ओवर बिना लाइव टेलीकास्ट के डाले जा रहे हैं। हर गेंद पर नजर न पड़े, इसलिए खास फील्डिंग सेट की गई है। सूत्र तो यहां तक कह रहे हैं कि हाई एप्रोच की थर्ड अंपायर कॉल के बाद ही इस खिलाड़ी को कोरबा की पिच पर उतारा गया है।
अब सवाल यह है कि जब बाहर से स्टार खिलाड़ी बुलाने पड़ें, तो क्या लोकल टैलेंट नेट प्रैक्टिस में ही रह जाएगा…? या फिर असली मुकाबला मैदान में नहीं, ड्रेसिंग रूम में तय हो रहा है? निगम की यह ‘लीग’ कितने ओवर चलेगी और आखिर में ट्रॉफी किसके हाथ लगेगी, यह तो वक्त बताएगा। फिलहाल दर्शक दीर्घा में बैठे शहरवासी स्कोरबोर्ड पर नजर टिकाए हुए हैं।

 

छा गए गुरु, धुरंधर के…

 

क्रिकेटर,कॉमेडियन और पॉलिटिशियन का डायलॉग छा गए गुरु…राजस्व विभाग के एक ट्रेनी आईएएस अफसर पर बखूबी जंच रहा है। साहब के वर्किंग स्टाइल पर जनमानस कहने लगे है आप तो छा गए गुरु…!

एक तरफ हाल ही में रिलीज हुई फिल्म धुरंधर में अक्षय खन्ना के अभिनय की देशभर में तारीफ हो रही है, तो दूसरी तरफ जिले में एसडीएम तन्मय खन्ना की कार्यशैली की। फर्क बस इतना है कि वहां परदे पर अभिनय है, यहां प्रशासनिक मैदान में वास्तविक एक्शन।
हाल में दर्री राजस्व मंडल के सरकारी जमीन में काबिज कब्जाधारियों के फार्म में चले बुलडोजर और एसडीएम के वर्किंग स्टाइल से प्रशासन के और अफसरों को भी सीखने की जरूरत है। खबरीलाल की माने साहब ने एक कड़क रुख दिखाते हुए नेताओं की एक न सुनी और दूसरी ओर गरीब तपके के लोगो पर इंसानियत की छाप छोड़ गए। कहा तो यह भी जा रहा एक गरीब परिवार का मकान गलती से टूट गया तो परिवार के सदस्य ने पीड़ा सुनाई तो एसडीएम साहब ने कहा गलती से टूटा है आप चिंता न करे कल एसडीएम कार्यालय आकर पीएम आवास का फर्म भरिए मैं तुरंत स्वीकृत कराता हूं..! कड़कपन और संवेदनशीलता का ऐसा संतुलन कम ही देखने को मिलता है।
अफसरशाही में जहां अक्सर दूरी का भाव दिखता है, वहां इस युवा अधिकारी ने संवाद और विश्वास की नई मिसाल पेश की है। कहने वाले तो यहां तक कह रहे हैं कि अगर राजस्व विभाग में इसी अंदाज की पारी जारी रही, तो यह “ट्रेनी” टैग ज्यादा दिन नहीं टिकेगा।
फिलहाल जनता की जुबान पर एक ही जुमला है…“छा गए गुरु… सच में छा गए…”

कलेक्टर बड़ा या मंत्री! सीधा सवाल… उलझा जवाब

होली पर्व को देखते हुए आसंदी ने विधानसभा सत्र 9 मार्च तक स्थगित कर दिया। लेकिन इसी सत्र में CSR मद से होने वाले काम में चुने हुए जनप्रतिनिधियों की राय और कलेक्टरों के अधिकार को लेकर पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और उद्योग मंत्री लखनलाल देवांगन के बीच सदन में हुए तीखे बहस ने एक प्रदेश की ब्यूरोक्रेसी और सरकार के लिए एक अधूरा सवाल छोड़ दिया…कलेक्टर बड़ा या मंत्री!

बघेल का सवाल सीधा था, लेकिन मंत्री का जवाब उलझा हुआ। असल में छत्तीसगढ़ में DMF और CSR मद से क्षेत्र के विकास के लिए मिलने वाले करोड़ों रुपये को खर्च करने में अफसरों की मनमानी के चर्चे रहे हैं। DMF तो समझ में आता है, यह केंद्र का विषय है और इस राशि को खर्च करने के लिए कलेक्टर को फुल अथॉरिटी हैं। मगर जहां तक CSR मद की बात है, उसमें कमेटी बनी हुई है। कमेटी की बैठक में जनप्रतिनिधि भी शामिल होते हैं, तो फिर उनकी राय का क्या?
प्रश्नकाल के दौरान कांग्रेस विधायक व्यास कश्यप ने CSR मद से होने वाले कार्यों में कलेक्टर की मनमानी और जनप्रतिनिधियों की उपेक्षा का मुद्दा उठाया था। उसमें भी यही सवाल था, जब सब कुछ कलेक्टर को ही करना है, तो कमेटी किस लिए? और किस बात के लिए मंत्री? अब सरकार को ही जवाब देना है कि कलेक्टर बड़ा या मंत्री?

मुसवा फाग

होली उल्लास भाईचारा और रंगों को त्योहार है…और आखिरी ये चार शब्द…बुरा न मानो होली है..इसमें और मिठास घोल देता है। कुछ ऐसा ही नजारा पिछले सप्ताह विधानसभा के मीडिया दीर्धा में उस वक्त देखने को मिला जब पूर्व सीएम भूपेश बघेल ने मुसवा फाग गाया। गीत की यह पंक्तियां सुनते ही विधानसभा की मीडिया गैलरी में ठहाके गूंजने लगे।
असल में होली रंगों और ठहाकों का पर्व है। फाग गीत उसी की कड़ी है, जिसमें होली के बहाने सच कहने का अपना अलग अंदाज होता है। हालांकि बीजेपी ने इसका उसी अंदाज में जवाब दिया..पकड़ागे-धरागे मुसवा मन रे..मगर ठहाके तो बघेल बटोर ले गये।
अभी 9 मार्च को दोबारा से विधानसभा शुरु होगी तब सत्ता और विपक्ष में कई मामलों में गरमा गरम बहस होना है और मुसवा फाग चलता रहेगा। और आखिर में बुरा न मानो होली है..।

 

             ✍️अनिल द्विवेदी, ईश्वर चंद्रा

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