
प्रतीकात्मक तस्वीर
कोरबा। कोसा नगरी में इन दिनों सिनेमा नहीं, ज़मीन का स्क्रिप्ट चल रहा है नाम है “बाप नंबरी, बेटा दस नंबरी!” लोग कहते हैं, यह कोई फिल्म नहीं, “सच्ची घटना पर आधारित” है।
एसईसीएल अधिग्रहीत इलाके के किसान मजाक में कहते हैं, “बेटा पटवारी, बाप जमीन कारोबारी… छा गए गुरु!”
जमीन के धंधे में पटवारी की भूमिका किसी “गेम चेंजर” से कम नहीं होती। और जब खुद का बेटा पटवारी बन जाए, तो फिर खेल तय समझिए। कोसा नगरी में ऐसी ही बाप-बेटे की जोड़ी ने भू-माफियागिरी का नया अध्याय लिख दिया है।
पोस्टिंग मिलते ही पटवारी साहब ने पिता के “बिजनेस” में हाथ बंटाना शुरू कर दिया। सरकारी रकबा हो या किसान की पुश्तैनी जमीन सौदे अब सरकारी कागजों से लेकर बाजार तक, सब इनके इशारे पर होते हैं। किसान की मजबूरी, अफसरों की सेटिंग और दलालों की मिलीभगत ने मुआवजे की रकम को इनकी तिजोरी तक सीमित कर दिया है।
लोग कहते हैं एसईसीएल अधिग्रहीत क्षेत्र में पटवारी और थानेदारी सबसे “लाभदायक” पद हैं। और जब पोस्टिंग अपने ही शहर में हो, तो मामला और भी गड़बड़। कोसा के लोग कहते हैं, “होमटाउन पोस्टिंग मतलब खुला खेल फर्रूखाबादी।” बाप-बेटे की इस जोड़ी ने तो सरकारी तंत्र को ही “फैमिली बिज़नेस मॉडल” में बदल दिया है।
किसान की जमीन औने-पौने में हथियाना, डराना-धमकाना और मुआवजे की रकम पर डाका डालना अब यही असली “परिवारिक धंधा” बन गया है। पटवारी पिता के नक्शेकदम पर नहीं, बल्कि उसे पीछे छोड़कर दौड़ रहा है। इस जोड़ी ने साबित कर दिया“बाप नंबरी तो बेटा दस नंबरी।”



