कोरबा।Korba Bhojli Mahotsav 2026 भोजली… नाम छोटा है, लेकिन इसके भीतर छत्तीसगढ़ की पूरी आत्मा बसती है। मिट्टी की खुशबू, बारिश की बूंदें, खेतों की हरियाली, दाई-बहनों की आस्था और रिश्तों में घुला अपनापन। यह सिर्फ टोकरी में उगा हरा पौधा नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की उस पुरखौती परंपरा की निशानी है, जिसे पीढ़ियां अपने सीने से लगाकर आगे बढ़ाती आई हैं।
इसी लोकभावना और अपनी माटी से जुड़े रिश्ते को फिर से जीवंत करने के लिए 29 अगस्त को कोरबा के घंटाघर चौक में भव्य प्रदेश स्तरीय भोजली रैली एवं महोत्सव का आयोजन किया जाएगा।
मिट्टी में बोए जाएंगे रिश्ते, भोजली में दिखेगा अपनापन
भोजली की शुरुआत मिट्टी और पानी से होती है। बारिश की बूंदों को गंगा मैया का स्वरूप मानकर टोकरी में मिट्टी रखी जाती है और उसमें जौ बोए जाते हैं। कुछ ही दिनों में जब वही मिट्टी हरी-भरी भोजली का रूप लेती है तो उसमें केवल पौधा नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति आस्था और कृतज्ञता का भाव दिखाई देता है।
छत्तीसगढ़ की यही खूबसूरती है कि यहां प्रकृति केवल पूजी नहीं जाती, उससे रिश्ता भी बनाया जाता है।भोजली इसी रिश्ते की कहानी कहती है।
एक तिनका जोड़ देता है जिंदगीभर का रिश्ता
भोजली पर्व का सबसे भावुक पक्ष है मितान परंपरा। भोजली को कान के पीछे खोंसकर जब दो लोग एक-दूसरे से हाथ मिलाते हैं तो केवल हाथ नहीं मिलते, दो परिवारों और दो दिलों के बीच अपनत्व का रिश्ता बनता है।
न जाति की दीवार, न ऊंच-नीच का भेद… बस एक-दूसरे के सुख-दुख में साथ खड़े रहने का वादा।
भोजली का यही संदेश आज के दौर में और भी महत्वपूर्ण हो जाता है, जब रिश्ते मोबाइल की स्क्रीन पर सिमटते जा रहे हैं और पड़ोस में रहने वाले लोग भी एक-दूसरे से दूर होते जा रहे हैं।
जब घंटाघर में गूंजेगी मांदर की थाप
29 अगस्त को घंटाघर चौक का नजारा कुछ अलग होगा। सिर पर भोजली का कलश लिए दाई-बहनें पारंपरिक वेशभूषा में नजर आएंगी। मांदर की थाप और झांझ-मंजीरे की झंकार के बीच लोकगीत गूंजेंगे।
छत्तीसगढ़ के अलग-अलग अंचलों से आने वाले लोक कलाकार अपनी कला के जरिए प्रदेश की विविध संस्कृति की झलक प्रस्तुत करेंगे। पारंपरिक नृत्य, लोकसंगीत और पुरखौती संस्कृति को दर्शाती झांकियां रैली को खास बनाएंगी।
यह केवल एक रैली नहीं होगी, बल्कि माटी से जुड़ने, पुरखों को याद करने और आने वाली पीढ़ी को अपनी पहचान सौंपने का अवसर होगी।
मोबाइल की दुनिया से माटी की दुनिया तक
आज के बच्चे भोजली की कहानी शायद किताबों और मोबाइल की स्क्रीन पर जानें, लेकिन इस आयोजन का उद्देश्य उन्हें उस परंपरा से सीधे जोड़ना है जिसे उनके दादा-दादी और पुरखे जीते आए हैं।
आयोजकों का कहना है कि यदि हमने अपनी लोकपरंपराओं को अगली पीढ़ी तक नहीं पहुंचाया तो धीरे-धीरे हमारी सांस्कृतिक पहचान धुंधली हो सकती है। भोजली, करमा, सुआ और पंथी जैसी परंपराएं केवल उत्सव नहीं, बल्कि हमारी जड़ों की पहचान हैं।
भोजली विदा होगी, लेकिन छोड़ जाएगी रिश्तों की खुशबू
विसर्जन के समय भोजली भले ही विदा हो जाएगी, लेकिन उसके साथ जुड़ा मया, दुलार और भाईचारे का संदेश लोगों के बीच बना रहेगा।
एक-दूसरे को भोजली भेंट कर लोग फिर यही संकल्प दोहराएंगे कि रिश्ते केवल खून से नहीं, मया और अपनापन से भी बनते हैं।
29 अगस्त को घंटाघर में होने वाला भोजली महोत्सव इसी भावना का उत्सव होगा। अपनी माटी के सम्मान का, अपनी संस्कृति के संरक्षण का और उन रिश्तों को फिर से महसूस करने का, जिन्हें छत्तीसगढ़ की धरती सदियों से संजोती आई है।












