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Flag, stick and jalebi : खाकी का प्रहार, सियाराम के कितने तार,रोप लाइट की कहानी, विपिन की जुबानी..चेला ने किया खेला,होइहि सोइ जो राम रचि राखा…

खाकी का प्रहार, सियाराम के कितने तार…

 

 

खाकी इस बार मैदान में उतरी तो पूरे जोश-खरोश में दिखी। परिणामस्वरूप करीब 50 से ज्यादा कबाड़ दुकानों को एक साथ खाकी ने खाक में मिला दिया। तस्वीर बड़ी है, एक्शन भारी है, मगर अफसोस… चर्चा कार्रवाई की नहीं, बल्कि सियाराम के “तार नेटवर्क” की ज्यादा है।

 

कागजों में तो सरकार बदलते ही कबाड़ कारोबार का अंतिम संस्कार हो चुका था। मगर एक साथ 50 से अधिक दुकानों का सील होना खुद इस दावे की पोल खोल देता है। सवाल सीधा है कि अगर सब बंद था, तो यह पूरा कबाड़ आखिर चल किसके भरोसे पर रहा।

चर्चा यह भी है कि पुलिस प्रोटेक्शन में कबाड़ किंग बनने का दंभ भरने वाला सियाराम आखिरकार गिरफ्त में आ गया। सियाराम, जो कल तक कबाड़ का बादशाह कहलाता था, आज सलाखों के पीछे है। गिरफ्तारी से ज्यादा दिलचस्प यह है कि वह इतने समय तक निडर क्यों रहा…? चर्चा है कि उसका आत्मविश्वास उसकी कमाई से नहीं, बल्कि वर्दी के भीतर बैठे “टीआई ब्रांड” आशीर्वाद से आता था। जब तक सिर पर हाथ था, तब तक कानून कबाड़ में पड़ा रहा।

 

अब जब सियाराम सलाखों के पीछे है, तो जनमानस में एक ही सवाल गूंज रहा है। सियाराम के तार आखिर किन-किन अफसरों तक जुड़े थे। क्या इन तारों की लंबाई कॉल डिटेल तक पहुंचेगी या जांच वहीं खत्म हो जाएगी जहां से शुरू हुई थी।

पुलिस महकमे के भीतर भी अब खुसुर-फुसुर तेज है। कबाड़ कारोबार और सियाराम के रिश्तों की परतें अगर ईमानदारी से खोली जाएं, तो सिर्फ कबाड़ नहीं, कई सफेदपोश चेहरे भी कबाड़ में तब्दील होकर रद्दी के भाव बिकते नजर आ सकते हैं।

खाकी का प्रहार फिलहाल मजबूत दिख रहा है लेकिन असली परीक्षा अभी बाकी है कि प्रहार सिर्फ लोहे पर पड़ेगा,या फिर उन कुर्सियों पर भी जिनकी छाया में कबाड़ चमक रहा था?

 

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रोप लाइट की कहानी, विपिन की जुबानी

 

 

कहते हैं हर चमक के पीछे अंधेरा ज़रूर होता है। शहर की सड़कों पर झिलमिलाती रोप लाइट इन दिनों यही सिखा रही है। फर्क बस इतना है कि यहां अंधेरा किसी कोने या खड्डे में नहीं, सीधे नगर निगम के दफ्तरों में पसरा है। इसलिए इस कहानी को अब एक नाम मिल गया है “विपिन की जुबानी”

सोशल मीडिया पर “बंटोगे तो कटोगे” ट्रेंड कर रहा है, लेकिन नगर निगम में इसका देसी संस्करण चल रहा है। यहां कहा जा रहा है, काम पार्ट में बंटेगा तो कमीशन भी बंटेगा। फर्क बस इतना है कि यहां कटने वाला कोई और नहीं, सरकारी खजाना है।

शहर की सड़कों पर लगी रोप लाइट कोई सजावटी योजना नहीं, बल्कि नियमों की कसरत का नतीजा बताई जा रही है। शासन की गाइडलाइन साफ कहती है कि 10 लाख से ऊपर का काम ऑनलाइन टेंडर से होगा। लेकिन ऑनलाइन में सेटिंग का जुगाड़ मुश्किल होता है। मैन्युअल टेंडर में दबाव, पहचान और पहचान वालों का दबदबा आसानी से काम करता है। बस यहीं से कहानी मोड़ लेती है।

सूत्रधार की माने तो निगम के विपिन ने करीब 20 लाख के काम को दो टुकड़ों में काट दिया। नियम भी कटे, प्रक्रिया भी कटी और अंत में सरकारी पैसा भी कट गया। सवाल ये नहीं कि काम हुआ या नहीं, सवाल ये है कि काम किस तरीके से कराया गया।

मामला तब और रोशन हुआ, जब रोप लाइट लगाने के लिए ठेकेदार के लोग निगम की गाड़ियों में घूमते दिखे। यानी जनता की गाड़ी, ठेकेदार का काम और ऊपर से नियमों की बत्ती गुल। चर्चा है कि खंभों पर चढ़ने वाले मजदूर भले निजी हों, लेकिन सहारा सरकारी संसाधनों का लिया गया।

कहा तो यह भी जा रहा है कि टेंडर इतनी हड़बड़ी में निकाला गया कि जिन अधिकारियों ने स्टीमेट बनाया, उनके दस्तखत तक गायब थे। और मजेदार बात ये कि कहीं कोई और बाजी न मार ले, इसलिए टेंडर खुलने से पहले ही सड़कों पर रोप लाइट टांग दी गई।

अब निगम को करीब से जानने वाले लोग खुलकर कह रहे हैं कि ये सिर्फ रोप लाइट की कहानी नहीं है। ये सिस्टम की वो जुबानी है, जिसमें नियम मोड़ दिए जाते हैं, प्रक्रिया सजावट बन जाती है और हर चमकती लाइट के पीछे एक जाना पहचाना नाम खड़ा दिखता है।

यही वजह है कि शहर में चर्चा है, रोप लाइट की कहानी नहीं, ये तो पूरी की पूरी विपिन की जुबानी है।

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चेला ने किया खेला…

 

 

कबीर का दोहा है…आछे दिन पाछे गए, हरि से किया न हेत..अब पछताए होत क्या, चिड़िया चुग गयी खेत…कबीर सालों पहले राजनीतिबाजों को जो सबक देकर गए थे वो आज सच हो रहा है। राजनीति में न कोई स्थायी गुरु, न कोई आजीवन चेला। वक़्त आने पर चेला भी खेला कर जाता है।

 

ऐसा ही जिला के कद्दावर आदिवासी राजनीति के मजबूत स्तंभ ननकीराम के साथ हुआ, जिसका अंदाजा खुद नेताजी को भी नहीं था। जिले के जो हालत बदले हैं, उसमें पार्टी का मंच हो या बड़े आयोजन एक नाम इन दिनों जानबूझकर गायब दिखता है। भाजपा कार्यालय के नए भवन का भूमिपूजन के निमंत्रण पत्र से नेताजी को ऐसे गायब किया गया कि लोग चौंक गए।

जब सोशल मीडिया पर बवाल हुआ तो सफाई आई कि सम्मान तो पूरा दिया गया है। मगर अंदरखाने में कुछ और चर्चा है। कोई कह रहा है कि चेला अब खेला कर रहा है। यानि गुरु गुड़ रहे गए और चेला शक्कर हो गया। सब समय का फेर है। सत्ता के दौर में अपनों को आगे बढ़ाने के बजाय गैरों पर भरोसा नेताजी को भारी पड़ गया।

 

 

होइहि सोइ जो राम रचि राखा…

 

 

तुलसीदास कृत रामचरितमानस के बालकांड की एक प्रसिद्ध चौपाई है…होइहि सोइ जो राम रचि राखा । छत्तीसगढ़ में कांग्रेस का हाल कुछ ऐसा ही दिखाई देता है। पिछले गुरुवार को दिल्ली स्थित कांग्रेस मुख्यालय से जो तस्वीर सामने आई, उसमें भी कुछ ऐसा ही नजर आया।

दिल्ली में खरगे–राहुल की प्रदेश के नेताओं के साथ बैठक हुई, जिसमें प्रदेश प्रभारी सचिन पायलट और दीपक बैज भी मौजूद थे।

बैठक के लिए नेता प्रतिपक्ष चरणदास महंत, पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल, ताम्रध्वज साहू, पूर्व उपमुख्यमंत्री टीएस सिंहदेव और फूलोदेवी नेताम को विशेष रूप से बुलाया गया था। छत्तीसगढ़ के नेताओं को उम्मीद थी कि बैठक में प्रदेश संगठन को लेकर कोई ठोस चर्चा होगी, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। उलटे नेताओं को मिल-जुलकर काम करने और एक साथ दौरे करने की नसीहत जरूर दी गई।

हालांकि बैठक में प्रदेश पदाधिकारियों के कई खाली पदों को भरने के संकेत दिए गए हैं। बैठक में जिस तरह राहुल गांधी की प्रतिक्रिया ठंडी रही, उससे कांग्रेस का कोई विशेष लाभ होता नहीं दिख रहा। उलटे महिला कांग्रेस और संगठन के खाली पदों को भरने को लेकर नेताओं में खींचतान मच गई है।

इसी महीने 23 फरवरी से विधानसभा सत्र शुरू होगा और मार्च-अप्रैल में राज्यसभा की खाली होने वाली दो सीटों के लिए चुनाव होना है। ऐसे में नेताओं की यह खींचतान कांग्रेस को भारी न पड़ जाए। वैसे भी होना तो वही है जो राम रचि राखा… अब देखना यह है कि खरगे-राहुल की नसीहत से कांग्रेस को कितना लाभ होता है।

 

 

 

झंडा..डंडा और जलेबी

 

बात पिछले सप्ताह की है..26 जनवरी को डंडा गाडकर गांव में झंडा वंदन हुआ, छक कर जलेबी भी बंटी..। गांव की पंचायत में चार दिन तो सरपंच की ​दरियादिली की चर्चा होती रही। जलेबी की मिठास और कार्यक्रम स्थल में लगाए गए पंडाल की सभी जगह तारीफ हो रही थी। सरपंच बता रहे थे कि बजट आने वाला है…अगली बार इससे ज्यादा जलेबी बांटने की तैयारी है।

मगर जब बजट आया तब जलेबी की मिठास बासी पड़ गई। पंडाल लगाने वाले और जलेबी तैयार करने वाले सभी सरपंच को घेरकर बैठ गए….भइया पेमेंट तो करवा दो…। गांव के कुछ नेतानुमा लोग सूचना के अधिकार की अर्जी लेकर आए थे। जिसमें दो सवाल थे…। पंडाल लगाने में कितना खर्च हुआ, ​​निविदा बुलाई की नहीं…जलेबी कहां से मंगाई।

सरपंच की तो बोलती ही बंद थी, एक सवाल हो तो जवाब दें…बजट में कुछ हाथ नहीं लगा, ऊपर से बहीखाता का हिसाब मांग रहे हैं। कभी कोतवाल ने सरपंच को बताया काहे कि चिंता करते हो….सभी परेशानी का हल शर्माजी का घर…चलो वहीं चलते हैं।

वैसे भी गांव में जब भी कोई विवाद होता है तो उसका समाधान शर्माजी ही करते हैं। गांव वाले उनकी बात नहीं काटते। चलो चलो बोलते हुए सरपंच पंचों के साथ सीधे वहीं पहुंचे जहां सभी सवालों का हल मिलने वाला था। सरपंच के पीछे भीड़ देखते ही शर्माजी को अंदाजा हो गया था कि मामला गंभीर है।

बिना दुआ सलाम के सीधे पूछा…क्या बात है सरपंच जी भीड़ लेकर क्यों आयो हो..। और मुंह लटकाये सरपंच ने सीधे सूचना के अधिकार की अर्जी शर्माजी के हाथ पर रख दी। मामला साफ था..बहीखाता दिखाओ।

पहले तो शर्माजी मुस्कुराए फिर बोले भाई ये कोई सरकारी आयोजन तो नहीं था…और न ”जंबूरी” या ” राजिम कुंभ मेला” का मामला जहां हजारों करोड़ का हिसाब किताब हो, गांव की बात थी तो मैंने ही सरपंच को सलाह दी थी, 26 जनवरी में कोई कमी नहीं होनी चाहिए।

और भाई जब जलेबी उड़ाई तब तो हिसाब नहीं मांगा। सरपंच से क्या पूछते हो मैं ही बता देता हूं। पंडाल ”रामलीला” वाले लेकर आये थे…और जलेबी मंहगू भाई की गुठमी से आई थी। मंहगू भी यही बैठा है उसी से पूछा लो। वो तो गुठमी में ठलहागिरी करने वाले हम जैसे दो चार लोग आपस में चंदा करके जलेबी बंटवा दी थी।

भीड़ से आवाज आई अरे हिसाब किताब छोड़ो…मंहगू भाई सुबह से हांक लगा रहे हैं बड़े जोर की भूख लगी है। 26 जनवरी वाली जलेबी बची हो तो वही बंटवा दो। अब हमको सरकारी आयोजन और गांव में मनने वाली 26 जनवरी का अंतर समझ में आ गया।

 

 

      ✍️अनिल द्विवेदी , ईश्वर चंद्रा

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