रायपुर

Famous Liquor Scam : शराब घोटाला मामले में जेल में बंद पूर्व मंत्री कवासी लखमा को सुप्रीम कोर्ट से मिली जमानत

कमीशन से बेटे का घर और कांग्रेस भवन निर्माण का दावा

रायपुर, 03 फरवरी। Famous Liquor Scam : छत्तीसगढ़ के बहुचर्चित शराब घोटाला मामले में पूर्व मंत्री कवासी लखमा को सुप्रीम कोर्ट से जमानत मिल गई है। मंगलवार को मामले की सुनवाई के बाद शीर्ष अदालत ने उन्हें राहत देते हुए सशर्त जमानत को मंजूरी दे दी है। प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने कवासी लखमा को 15 जनवरी 2025 को गिरफ्तार किया था।

बता दें कि गिरफ्तारी के बाद ED ने लखमा से सात दिन की रिमांड पर पूछताछ की थी। इसके बाद 21 जनवरी से 4 फरवरी तक उन्हें न्यायिक रिमांड पर जेल भेजा गया। तब से वे रायपुर सेंट्रल जेल में बंद थे। बता दें कि जमानत देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने शर्तें भी लगाई हैं। इन शर्तों में उन्हें राज्य से बाहर रहना होगा, कोर्ट पेशी पर छत्तीसगढ़ आना होगा, पासपोर्ट जमा करना होगा और पता व मोबाइल नंबर पुलिस थाने में दर्ज कराना होगा।

क्यों हुई थी गिरफ्तारी

ED का आरोप है कि पूर्व मंत्री और मौजूदा विधायक कवासी लखमा शराब सिंडिकेट के अहम सदस्य थे और उनके निर्देश पर ही पूरा नेटवर्क संचालित होता था। एजेंसी का दावा है कि शराब नीति में बदलाव और FL-10 लाइसेंस की शुरुआत में लखमा की भूमिका अहम रही। ED के अनुसार, आबकारी विभाग में चल रही गड़बड़ियों की जानकारी होने के बावजूद उन्होंने इन्हें रोकने के लिए कोई कदम नहीं उठाया।

कमीशन से बेटे का घर और कांग्रेस भवन निर्माण का दावा

ED की ओर से पेश वकील सौरभ पांडेय ने कोर्ट में बताया था कि शराब घोटाला करीब तीन साल तक चला। इस दौरान लखमा को हर महीने करीब दो करोड़ रुपये मिलने का आरोप है। ED के मुताबिक, 36 महीनों में कुल 72 करोड़ रुपये की रकम मिली, जिसका इस्तेमाल बेटे हरीश कवासी के मकान और सुकमा में कांग्रेस भवन के निर्माण में किया गया। एजेंसी का यह भी दावा है शराब घोटाले से राज्य के सरकारी खजाने को भारी नुकसान हुआ और सिंडिकेट से जुड़े लोगों ने 2,100 करोड़ रुपये से अधिक की अवैध कमाई की।

जानें क्या है छत्तीसगढ़ शराब घोटाला

छत्तीसगढ़ शराब घोटाले की जांच फिलहाल ED कर रही है। इस मामले में ACB में FIR दर्ज कराई गई है, जिसमें 2,000 करोड़ रुपये से अधिक के घोटाले का जिक्र है। जांच में सामने आया है कि तत्कालीन भूपेश सरकार के कार्यकाल में IAS अधिकारी अनिल टुटेजा, आबकारी विभाग के तत्कालीन एमडी एपी त्रिपाठी और कारोबारी अनवर ढेबर के कथित सिंडिकेट के जरिए इस घोटाले को अंजाम दिया गया।

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