कोरबा। Korba private hospitals controversy कहते हैं अति का भी एक अंत होता है। मरीजों की मजबूरी को अवसर समझकर धंधा चलाने वालों पर यह कहावत इन दिनों खूब फिट बैठती दिख रही है। शहर में नया हॉस्पिटल क्या खुला , पुराने और नए सफेद सूट वालों के बीच ऐसा द्वंद्व शुरू हो गया है मानो इलाज नहीं, इज्जत और इलाका दांव पर लगा हो। सभी डाक्टर अब एक से बढ़कर एक स्कीम लेकर मरीजों को नेताओं की तर्ज पर लोक लुभावन वादे दे रहे है।
Korba private hospitals दुनिया भर में लोग इन दिनों मिडिल ईस्ट के युद्ध की चर्चा कर रहे हैं, लेकिन कोरबा के बुद्धिजीवी वर्ग की अपनी अलग ही बहस चल रही है। यहां चर्चा बम और मिसाइल की नहीं, बल्कि सफेद कोट और सफेद सूट के बीच चल रहे एक अदृश्य युद्ध की है। यहां बम नहीं फूट रहे, लेकिन आरोप जरूर फूट रहे हैं। यहां मिसाइल नहीं चल रहीं, लेकिन गुगल इंजन में ताबड़तोड़ पोस्ट सर्च हो रही है।
असल कहानी पुरानी है। धंधे की दुनिया में एक कहावत खूब चलती है कि अंधेरे का डर दिखाओ और फिर टॉर्च बेचो। कोरबा में भी यह कला वर्षों से चलती रही। मरीजों को डर, जांच, पैकेज और सलाह के अंधेरे में घुमाकर इलाज की टॉर्च बेची जाती रही। लेकिन कहानी में ट्विस्ट तब आया जब इसी बाजार में एक नया खिलाड़ी उतर आया। और जैसे ही पुराने कारोबार की रोशनी पर हल्की सी सेंध लगी, अचानक सोशल मीडिया पर नियम-कानून की किताबें खुलने लगीं। दिलचस्प बात यह है कि शहर में शायद ही कोई ऐसा अस्पताल हो जो हर नियम और हर मानक पर पूरी तरह खरा उतरता हो। फिर भी कुछ लोगों को अचानक नियमों की इतनी तीव्र याद क्यों आने लगी, यह सवाल अब चाय की मेज से लेकर व्हाट्सऐप ग्रुप तक घूम रहा है।
लोग मुस्कुराकर बस इतना कहते हैं कि असली दर्द मरीजों का नहीं, मुनाफे का है। जब टॉर्च बेचने का पुराना बाजार खतरे में पड़ता है, तब नियमों की याद अचानक बहुत तेज हो जाती है। यहां असली बीमारी नियमों की नहीं, मुनाफे की है। और जब मुनाफे को हल्का सा बुखार आता है तो नियमों का थर्मामीटर तुरंत बाहर निकाल लिया जाता है। इसी बहस के बीच किसी ने मजाक में एक पुराना गीत भी याद दिला दिया। राजेश खन्ना की फिल्म रोटी का वह मशहूर गीत… “यार हमारी बात सुनो, ऐसा एक इंसान चुनो, जिसने पाप ना किया हो…” गीत की पंक्ति जैसे ही चर्चा में आई, कई लोग हल्की मुस्कान के साथ चुप हो गए। क्योंकि शहर में सफेद सूट के इस द्वंद्व में शायद ही कोई ऐसा योद्धा होगा जो पूरी तरह बेदाग हो। फिलहाल कोरबा में यह लड़ाई इलाज की कम और इल्जामों की ज्यादा लग रही है। मरीज अब भी अस्पतालों में लाइन में हैं, लेकिन सफेद सूट वाले अपने-अपने मोर्चे पर डटे हुए हैं। और शहर के लोग दूर खड़े होकर बस यही देख रहे हैं कि इस “द्वंद्व युद्ध” में आखिर किसकी टॉर्च ज्यादा तेज रोशनी देती है।


