
Breaking बिलासपुर | 3 फरवरी 2026 छत्तीसगढ़ में सरकारी भर्तियों की पारदर्शिता पर लगा एक पुराना दाग आखिरकार हाईकोर्ट के फैसले से साफ हो गया। वर्ष 2011 में पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग द्वारा की गई सब-इंजीनियर (सिविल) भर्ती को लेकर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने बड़ा और सख्त फैसला सुनाया है। अदालत ने 14 वर्षों से बिना निर्धारित शैक्षणिक योग्यता के नौकरी कर रहे 67 सब-इंजीनियरों की नियुक्ति को अवैध घोषित करते हुए रद्द करने का आदेश दिया है। फैसले के बाद प्रशासनिक गलियारों में हड़कंप मच गया है।
यह ऐतिहासिक निर्णय मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रवींद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने सुनाया। कोर्ट ने दो टूक कहा कि जिन अभ्यर्थियों के पास आवेदन की अंतिम तिथि तक आवश्यक शैक्षणिक योग्यता नहीं थी, उनकी नियुक्ति शुरू से ही शून्य (Void ab initio) मानी जाएगी। ऐसे मामलों में वर्षों की सेवा भी अवैध नियुक्ति को वैध नहीं बना सकती।
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि किसी भी सरकारी भर्ती में विज्ञापन में तय पात्रता शर्तें महज औपचारिकता नहीं होतीं, बल्कि वे कानून का हिस्सा होती हैं। इन शर्तों में ढील देना न सिर्फ नियमों का उल्लंघन है, बल्कि उन योग्य उम्मीदवारों के अधिकारों पर भी सीधा प्रहार है, जो सभी मापदंड पूरे करने के बावजूद चयन से वंचित रह गए।
सुनवाई के दौरान यह तथ्य सामने आया कि 2011 की भर्ती प्रक्रिया में कई ऐसे अभ्यर्थियों को नियुक्त कर लिया गया, जिनके पास निर्धारित समयसीमा तक जरूरी डिग्री नहीं थी। इसके बावजूद उन्हें सेवा में बनाए रखा गया और वर्षों तक सरकारी वेतन और पद का लाभ मिलता रहा। कोर्ट ने इस पूरे मामले को प्रशासनिक मनमानी और नियमों की खुली अवहेलना करार दिया। हाईकोर्ट का यह फैसला न सिर्फ इस भर्ती प्रक्रिया पर अंतिम मुहर है, बल्कि यह आने वाले समय में सरकारी भर्तियों में नियमों के सख्त पालन और जवाबदेही के लिए एक मजबूत नजीर भी माना जा रहा है।



